आजकल हर बच्चे को डॉक्टर – इंजीनियर ही बनना है। लेकिन कल एक ऐसे बच्चे से मुलाकात हो गई जो बड़े होकर नेता जी बनना चाहता था, सुनकर थोड़ी हैरानी हुई, शायद उसमें विशेष प्रतिभा हो, या उसे परीक्षाओं का मतलब पता हो!
अब बचपन में खेलकूद से मुँह मोड़ कर पढ़ना कठिन तप सा होता है, ये तपस्या करने वाला ही बता सकता है। पढ़ाई की सीढ़ी पर चढ़ कर ही सुनहरे भविष्य के सपने पूरे किये जा सकते हैं। उन सपनों की खातिर ‘जी तोड़’ मेहनत करना लक्ष्य बन जाता है। माता-पिता भी अपना चैन खो कर साथ देते हैं, मानो उनकी भी परीक्षा हो।
आज के युवा, लड़के – लड़कियों को परीक्षाओं को पास करने के लिए, उन्हें कई तरह के प्रोजेक्ट, टास्क पूरे करने होते हैं। ये सब माथापच्ची केवल इसलिए कि आने वाला जीवन सुखद हो सके। इसके लिए उन्हें कितनी बार गिरना, फिर उठकर नई शुरुआत करना, बार बार लगातार एक ही तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए खुद को तैयार करना, और उसमें प्रयास करते रहना।
कई बार सफलता मिल कर भी कुछ अधूरी सी रह जाती है; इस बार 1 नंबर से रह गए, ओह! नंबर ठीक ठाक हैं पर रैंकिंग अच्छी नहीं आई, मनचाहे कॉलेज में एडमीशन कैसे मिलेगा…आगे क्या करना है?
अच्छी नौकरी कैसे मिलेगी… वगैरा वगैरा
यदि सब कुछ अच्छा हो भी जाए, फिर भी आसानी से नौकरियाँ नहीं मिलती उसकी तलाश में भटकना …
किन्तु नेतागिरी एक ऐसा पेशा है,जिसके लिए ऐसा कुछ नहीं होता!
यूँ ही एक ख्याल दिमाग में बार बार चक्कर काट रहा है, मालूम है ‘खयाली पुलाव कभी पकता नहीं है, शेखचिल्ली के सपनों की तरह …’
खयाल; कि चुनावी वादों की तरह, पढ़ने वाले बच्चों के लिए कोई ऐसा नियम हो सकता है? –“मैं वादा करता हूँ, पास होने के बाद अपने विषय से संबंधित परीक्षा और प्रोजेक्ट पूरी निष्ठा से पूर्ण करके ईमानदारी के साथ जमा करूंगा!”
नहीं … पर क्यों?
दिमाग इस ‘क्यों’ पर अटका है।
सभी तरह की परीक्षा आम जनता के लिए क्यों?
गाँव के छोटे से ग्राम सेवक से लेकर, देश चलाने तक के शीर्ष नेताओं के चुनावों में किसी भी तरह की परीक्षाओं का विधान क्यों नहीं है। अब नहीं है तो नहीं है, क्योंकि नियम बनाने वाले कभी अपने लिए नियम थोड़े ही बनाते हैं।
नौकरी करने से लेकर रिटायर होने तक, पहले काम फिर दाम (प्रमोशन) मिलता है।
किन्तु नेताओं के लिए खास सुविधा है, न योग्यता, न परीक्षा, न कोई टास्क, एक बार जीतने के बाद हार भी जाएं तब भी निश्चित वेतन भत्ता, पेंशन के नाम से मिलता ही रहता है।
उनके क्षेत्र के सुधार – विकास कार्य सिर्फ वादों की गाड़ी पर ही चलते रहते हैं।
वैसे तो हर मौसम की अपनी अलग समस्याएं होती हैं। पर बारिश का एक अपना ही स्वैग है; उसके कारण पूरे देश में हाहाकार मच जाता है, सड़कें उखड़ रहीं, पुल टूट रहे, कहीं जल भराव तो कहीं बाढ़ जैसे हालातों के समाचार लगातार मिलते हैं। ये केवल समाचार तक सीमित नहीं है, इससे जान माल का भी बहुत नुकसान होता है। इन समस्याओं से जूझते हुए बड़े हो या बच्चे सभी को स्कूल, ऑफिस, या अन्य काम पर जाना आम बात है।
क्योंकि उनके लिए कोई ऐसी सुविधा थोड़े ही है, जो कोई आए और “बांह पड़कर कीचड़ से ऊपर उठा कर चल दे, जिससे कपड़ों पर एक छींटा भी ना आए और रास्ता पार करा दे।”
बारिश में बाढ़ जैसी समस्याएं प्रतिवर्ष आती हैं, यदि चाहें तो पूरे साल में सफाई, मरम्मत और जरूरी निर्माण कार्य करके सुधारा जा सकता है। किन्तु; नहीं! करें भी तो क्या! बारिश ही ऐसी है कि काम के बीच आ जाती है। काम जब तक झमाझम बारिश में छतरी लेकर ना किया जाए तब तक जनता को सक्रियता ही नहीं दिखती, क्या करें! करना पड़ता है।
दूसरे देशों में तो बेकार में ही सड़कें आदि बनने के बाद मजबूती की जांच होती है, हमारे यहाँ तो इतना विश्वास है, कि बोल दिया मजबूत बनी है, तो बनी है; अब जबान की भी तो कोई कीमत होती है!
काश! छात्रों की तरह नेता बनने के लिए भी कोई टास्क या प्रोजेक्ट देने का प्रावधान होता!
यदि क्षेत्र के नेता को अपने क्षेत्र की समस्या का समाधान करने का टास्क दिया जाए, जो टास्क पूरा करके समाधान खोज ले, उसी को अगला चुनाव लड़ने का अधिकार मिले।
इससे उस क्षेत्र में एक अच्छे नेता की छवि मजबूत हो सकती है, प्रचार में खर्च होने वाला पैसा विकास में काम आ सके, चीजों के साथ इंसानों की उत्कृष्टता की परख भी हो सकती है। मालूम है, ऐसा कुछ नही होता, पर खयाली पुलाव बनाने में क्या ही जाता है।
सिर्फ जनता के लिए परिणामों के पहले अपने टास्क पूरे करने का विधान है।
नेताओं के टास्क परिणामों के बाद क्यों? वो भी पूरे हों, या नहीं!
यदि पढ़ने लिखने में मन ना लगे, तो फिर नेता बन ही सकते हैं। दुनियाँ भर की परीक्षाओं से निजात मिलेगी, ना नौकरी ढूँढने की जिल्लत, ना ही रिटायरमेंट की चिंता …
हाँ, उनकी भी एक परीक्षा होती है, जिसमें उन सभी की फुर्ती व सक्रियता देखते ही बनती है। उसे इस कविता में पढ़ें;-
आई परीक्षा आई परीक्षा
लोकतंत्र की आई परीक्षा
मची हड़बड़ी चारों ओर
जल्दी में कोई फीता काटे
लगा बोर्ड वोटों को मांगे
कहीं अन्न संकल्प,
पानी-बिजली मुफ़त में बांटे
व्यंग वाण भी खूब चलें
टिकट! हाथ में गर ना आए
नेता जी फिर खूब ही भड़के
मची हड़बड़ी चारों ओर
बिन पेंदी का लोटा बनकर
इत-उत लुड़कें सारे नेता
सबसे मिलता एक जवाब!
करने आए हम जन सेवा
सेवा सेवा बोल बोल के
मेवा सारी वो खा जाएं
आई परीक्षा आई परीक्षा
लोकतंत्र की आई परीक्षा
कुर्सी की खातिर सब…
छवि अपनी ही माँज रहे
बिना पढे ही पाठ पुराना
दोहराते हैं जल्दी में
पार्टी बदल बदल कर आते
हाथ जोड़ कर;
बहना,मैया, भैया करते
वोट हमीं को देना तुम
बच्चों को गोद उठा, प्यार लुटाते
संग बैठ, भोजन कर लेते
एक अनोखा मौसम आता
पाँच साल में एक ही बार
जब नेता जी आते द्वार
वोट वोट बस वोट वोट
आई परीक्षा आई परीक्षा
लोकतंत्र की आई परीक्षा
चुनाव ही ऐसा समय है, जब सब बाहर निकल कर जनता के बीच आते, हाथ जोड़ना, मान मनुहार करना, मन लगाकर सेवा करेंगे, इस तरह के वादे, बस दिल खोल कर करते रहो!
चुनाव के बाद वैसे भी धन-दौलत की कमी नहीं होगी, साथ में रुतवा भी बढ़ेगा।
दिल में सेवा और सरलता का भाव दिखाना ही तो है!
ज्यादा नहीं सोचना… दिमाग को आराम देओ
फ्री का माल … मौज करो!
मस्त रहो, व्यस्त रहो
देश का नेता कैसा हो…. चलो चले सब रैली में।







