बीते दिनों गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम से जुड़ी घटना बहुत चर्चित रही जिसमें हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार (आमंत्रित) को सार्वजनिक रूप से अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। उन्हें कार्यक्रम से बाहर जाने को भी कहा गया। निश्चित रूप से यह केवल एक व्यक्ति विशेष के साथ किया गया दुर्व्यवहार नहीं है बल्कि यह घटना साहित्य, विश्वविद्यालयी संस्कृति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तीनों के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आती है। अतः इसे किसी क्षणिक “प्रबंधनात्मक चूक” या “अनजाने में हुई भूल” कहकर टाल देना न तो तार्किक है, न ही नैतिक।
विश्वविद्यालय ज्ञान के वे स्थल होते हैं जहाँ विचारों की बहुलता, असहमति और प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाता है। साहित्यिक कार्यक्रम तो विशेष रूप से इसीलिए होते हैं कि वहाँ वैचारिक टकराव होते हुए भी रचनात्मक कार्य और संवेदनशील संवाद संभव हो सके। ऐसे में किसी आमंत्रित साहित्यकार को अपमानित करना न केवल अकादमिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि एक ओछी, असहिष्णु मानसिकता का परिचायक भी है।
मान भी लिया जाए कि वक्ता (कुलपति), कथाकार की उपस्थिति या विचारों से असहज हो गए थे, तो भी प्रश्न लेखक पर नहीं कुलपति जी के व्यवहार, मंशा और समझ पर उठता है। साहित्य को केवल शोभा या औपचारिकता मानने की प्रवृत्ति और लेखक को ‘सुविधाजनक सीमा’ में बाँधने का प्रयास यह अपने आप में साहित्य के मूल स्वभाव का निषेध है।
इस पूरे घटनाक्रम में श्रोताओं की भूमिका भी विचारणीय है। साहित्यिक सभाओं में उपस्थित श्रोता केवल दर्शक नहीं होते; वे साहित्यिक मूल्यों के साक्षी और सहभागी होते हैं। ऐसे क्षणों में उनकी चुप्पी भी प्रश्न बनकर खड़ी होती है। जब मंच पर शब्दों का अपमान होता है और सभागार मौन रह जाता है, तो यह मौन भी इतिहास को शर्मिंदा ही करता है।
साहित्यकार का कद केवल उसकी रचनाओं से नहीं, बल्कि ऐसे मौकों पर उसके नैतिक हस्तक्षेप से तय होता है। इसलिए मंचासीन साहित्यकारों की जिम्मेदारी और भी अधिक थी। यदि मंच पर बैठे लोग तटस्थता या औपचारिक चुप्पी को ही सुरक्षित विकल्प मानते हैं, तो यह साहित्यिक समाज के गहन आत्ममंथन का समय है। आज यदि एक लेखक अपमानित होता है और बाकी चुप्पी ओढ़ लें; तो कल यह सुरक्षा कोरा भ्रम ही साबित होगी। भविष्य में जब कभी आपका नंबर आएगा, तब फिर आपके साथ कोई क्यों खड़ा होगा?
आयोजकों के संदर्भ में यह कहना आवश्यक है कि साहित्यिक कार्यक्रम कोई प्रबंधकीय या कॉर्पोरेट इवेंट नहीं होते, जहाँ अरुचिकर आवाज़ों को ‘मैनेज’ कर लिया जाए। असहमति, तीखापन और प्रश्न तो साहित्य की अनिवार्य शर्तें हैं। जो संस्थाएँ लेखक से डरने लगती हैं, वे ज्ञान से नहीं, अपने तथाकथित अनुशासन के खोखले ढाँचे से ही प्रेम करती हैं।
इस घटना पर तार्किक और जिम्मेदार प्रतिक्रिया के रूप में आयोजकों, मंचासीन साहित्यकारों और साहित्यिक संस्थाओं को स्पष्ट और निर्भीक वक्तव्य देना चाहिए। चुपचाप घर बैठ फोन करने या मेल भेजने से बात नहीं बन सकती! साथ ही श्रोताओं को भी यह समझना होगा कि साहित्य केवल सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि संरक्षित करने की जिम्मेदारी भी है।
यह घटना भूलने योग्य कदापि नहीं है। इसे याद रखना इसलिए ज़रूरी है ताकि भविष्य में जब किसी भी सार्वजनिक मंच पर या विश्वविद्यालय में किसी लेखक को आमंत्रित किया जाए, तो केवल कुर्सी और माइक ही नहीं, उसके सम्मान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित हो। अन्यथा शिक्षा सतही तौर पर तो जीवित दिखेगी पर उसकी उसकी आत्मा ढूँढे न मिलेगी।
चलते-चलते: वरिष्ठ कथाकार के साथ जो हुआ, उसने यह प्रश्न तीखे स्वर में अवश्य उठाया है कि साहित्य के नाम पर संचालित मंच वास्तव में किन मूल्यों के रक्षक हैं! एक बड़ा वर्ग आज उनके साथ खड़ा है, यह निस्संदेह स्वागतयोग्य है। लेकिन उतना ही ज़रूरी यह स्वीकार करना भी है कि कुछेक अपवादों को छोड़कर लेखक वर्ग भी स्वयं ऐसा ही समाज है जो तमाम तथाकथित ‘बड़े लेखकों’ की ‘भूलों’ के सामने अक्सर मौन साध लेता है। जिन महानुभावों की वाणी सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर मर्यादा की सारी हदें लांघती है, उन्हें क्षमा ही नहीं किया जाता, बल्कि बार-बार प्रतिष्ठित आयोजनों में सम्मानित भी किया जाता है।
यह विडंबना और भी गहरी तब हो जाती है जब नकल और कॉपी-पेस्ट सिद्ध होने के बावजूद कुछ अयोग्य नाम उनके रुतबे के कारण चमकते रहते हैं और पुरस्कारों की जगमगाहट में निर्लज्जता से मुस्कुराते हैं। स्थिति यह है कि किसी से कोई प्रलोभन /आर्थिक सहायता मिल जाए तो सुपात्र को भूल सब कुछ उस ‘दयावान’ पर न्योछावर करने को भीड़ तैयार हो जाती हैं। कुल मिलाकर गुटबाजी और लिफ़ाफ़ों के बीच प्रतिभा और सच्चाई प्रायः दम तोड़ती ही नज़र आती है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि आज हम किस लेखक के साथ खड़े हैं, प्रश्न यह भी है कि हम कब और किसके सामने सच बोलने का साहस जुटाते हैं? एक बार ठहरकर अपने गिरेबान में भी झाँकना होगा कि क्या हम लेखन जगत के युगपुरुषों/महिलाओं के अशिष्ट व्यवहार, अभद्र भाषा और अपराध का विरोध भी ऐसे ही डटकर करते आए हैं? क्या स्वार्थ ने एन मौके पर हमारा मुँह नहीं सिल दिया है?
इस चयनित नैतिकता, सुविधाजनक मौन और सत्ता-समीकरणों से संचालित समर्थन साहित्य को नहीं, केवल व्यक्तियों की महिमा को बचाता है। ऐसे में लेखक समाज की चुप्पी मात्र असहज ही नहीं करती, बल्कि यह संकेत भी देती है कि संकट में साहित्य और हमारा आत्मसम्मान दोनों हैं और एक अरसे से हैं। जहाँ सभी का बोलना आवश्यक होता है, वहाँ यही मौन भीतर तक सालता है और साहित्यिक नैतिकता के खोखलेपन, दोहरे चरित्र और हमारी सामूहिक असलियत का एक झटके में पर्दाफाश कर देता है।






