लता जो नाजुक तो है और
धरती से जुडे होना हुनर है इसका
तो आसमां की ऊचाईयों को छूने की चाह भी है इसमें
संबल मिल जाए तो स्वप्न जो देखे हैं इसने
कहाँ दूर हैं इसकी कल्पनाओं से
यह सुदृढ़ है
अपनी शाखों से
इरादों से,
मन से
और जीवन से
इसे आगे बढ़ना ही होगा,
अपनी कल्पनाओं को साकार करने के लिए
यह धरती का सीना चीरकर
निकली है
चली है निरंतर
फलते फूलते
आनंद दसों दिशाओं में फैलाते हुए
उस आसमान को छूने
जो था इसकी कल्पनाओं में
जो था इसकी आशाओं में,
जो था इसकी नींद भरी आहों में,
मीठे स्वप्न लिए इसके
विचलित होना जैसे सीखा ही नहीं इसने
और बढे जा रही है निरंतर
छूने उसी आसमान को






