हसनैन आक़िब की ग़ज़लों में जिंदगी का हर रंग नुमायां है। लेकिन इन रंगों में सबसे चटक रंग खान जात का है। आपने समाज, सियासत, रिश्ते-नाते, इश्क-मुहब्बत, ज़िंदगी और ज़रूरत आदि सभी विषयों पर अपनी कलम चलायी है। इसके साथ ही आपने अपने अशआर में तमाम नेक सलाहें भी दी हैं जो कि ज़िंदगी के गहन तजुर्बात को बयां करते हैं। आपकी ख़ासियत यह भी है, कि विभिन्न जटिल विषयों पर गज़लें कहते हुए आपने उसमें ग़ज़लियत को बरकरार रखा है। वैसे तो आपकी ग़ज़लों में हिंदी और उर्दू ज़बान का मिश्रित रूप मिलता है। लेकिन कहीं-कहीं पर विशुद्ध हिंदी के खूबसूरत अशआर देखने को मिलते हैं। जिनके कलेवर एकदम अलहदा हैं। प्रतीक और बिम्बों को भी बहुत ही दिलकश अंदाज में आपने रूपायित किया है। इसी का एक उदाहरण देखें-
एक पत्ता निराशा का, एक आस का।
जिन्दगी वृक्ष जैसे अमलतास का।
क्या करें लेके सन्देह की एक सदी,
एक क्षण ही बहोत तेरे विश्वास का।
कभी-कभी आपने अपनी ग़ज़लों में एकदम अलग और कठिन तरह की रदीफ लेकर बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण शेर कहे हैं। और उस रदीफ को मुकम्मल ढंग से निभाया भी है। ऐसे ही कुछ अशआर देखें-
ताजिर अजब हूं बाबा, मैं चांद बेचता हूं।
दो रोटियों में पूरा मैं चांद बेचता हूं।
मेला लगा हुआ है हर शै के ताजिरों का
बाज़ार में अकेला मैं चांद बेचता हूं।
ग़ज़ल एक ऐसी छंदबद्ध विधा है, जो आज पूरे जहां को अपनी ओर खींच रही है और अपना मुरीद बना रही है। इसकी लयात्मकता व गेयता के कारण ही पाठक और श्रोता पढ़कर या सुनकर आनंदित होते हैं। इस हिसाब से हसनैन आक़िब की ग़ज़लों में सार्थकता के साथ जो रवानी है, वो एकदम नदी की धार की तरह पूरे वेग में बहती है। देखें-
कभी आधा नहीं खुलता कभी पूरा नहीं खुलता।
अगर चाबी गलत हो तो कोई ताला नहीं खुलता।
हमारी जामा ज़ेबी पर ज़माना रश्क करता है,
तुम्हारे जिस्म पर लेकिन ये पहनावा नहीं खुलता।
समाज का सच कहना हर कवि का दायित्व होता है। सामाजिक हलचल और सियासी दांवपेच ने साहित्य को हमेशा ही प्रभावित किया है। ज़माने के सच को कहने की ताकत आक़िब साहब की ग़ज़लों में बखूबी देखने को मिलती है। वर्तमान न्याय व्यवस्था की पोल खोलती हई सच्ची तस्वीर को आपने अपने शेर में कुछ इस तरह उकेरा है-
हाकिम जो कहेगा वही मुनसिफ भी कहेगा,
ये सोच के जनता भी अदालत नहीं जाती।
इसी प्रकार आम आवाम के दर्द और पीड़ा की आवाज़ कैसे अनसुनी हो रही है और हुकूमत कानों में तेल डाल कर सो रही है। एक इशारे पर किस प्रकार दंगे होते हैं। सियासत के इस दांवपेच को यथार्थ रूप में आक़िब जी अपने शेरों के जरिए सबके सामने लाते हैं। देखें-
बस एक चुटकी पे है मौकूफ दंगा,
सियासत तो बहाना चाहती है।
बस अब ज़िल्ले-इलाही जाग जाएं,
रिआया दुख सुनाना चाहती है।
मानवीय विसंगतियों के वर्तमान परिदृश्य को हसनैन साहब अपने अशआर में जगह-जगह पर सामने लाते हैं। आपका तजुर्बा इस क्षेत्र में काफ़ी गहन है। आज ज़िंदगी की ज़रूरत ने इंसानियत को किस दर्जा कमतर किया है। इसे इस शेर के ज़रिये महसूस किया जा सकता है-
ज़रूरत खूब महंगी हो गई है,
मगर इन्सां की कीमत घट रही है।
आक़िब साहब ज़िंदगी की हर टेढ़ी-मेड़ी गली से गुज़रे हैं। हर रास्ते के ऊंच-नीच से वाक़िफ़ हैं। जीवन संघर्षों के हर रूप से मुखातिब हुए हैं। इसलिए ज़ीस्त के हर ताप और उतार-चढ़ाव का अनुभव उनकी शायरी में साफ़ झलकता है। आपने अपने अशआर में जो सलाह और नसीहत दी है, उसे जौहरी की भांति जांचा और परखा है। तब उस हकीक़त और नफ़ा-नुक़सान को दुनिया के सामने पेश किया है। आप भी देखें-
गिरती दीवारें दोबारा भी तो उठ सकती हैं,
मसलेहत यह है कि बुनियाद संभाली जाए।
एक चिंगारी भी शोलों में बदल सकती है,
आग काबू में अगर हो तो बुझा ली जाए।
ख़ान हसनैन की रचना संसार में जो रंग सबसे चटक, अलहदा और अनोखा है, वह है मोहब्बत का रंग। यह एक ऐसा रंग है, जो इंसान को ही नहीं बल्कि मुकम्मल जहां को भी सुंदर बनाने का माद्दा रखता है। मोहब्बत एक ऐसी शै है, जिससे घर को घर का दर्जा दिया जाता है। केवल दीवारों से घर नहीं बना करता। इस बात की तस्दीक स्वयं आक़िब साहब ने अपने शेरों में कई जगह किया है। कुछ उदाहरण देखें-
आंगन में जिसके शमा-ए-मोहब्बत का नूर हो,
महलों से कम नहीं है वह खस्ता मकान भी।
घर की तामीर में होती है मोहब्बत पिनहां,
कौन कहता है कि दीवारों से घर बनता है।
प्रेम के उपर्युक्त रूप के अतिरिक्त आपकी शायरी में प्रेम के बिरह की अनुभूति, बेचैनी और छटपटाहट भी देखने को मिलती है। मोहब्बत जब आदत से नशा बन जाती है और रग-रग में समा जाती है, तो उससे छुटकारा पाना असंभव-सा हो जाता है। प्रेम का संयोग पक्ष जितना सुहावना होता है, उसका वियोग पक्ष उतना
ही पीड़ादायक। इसी हिज्र के कुछ अशआर देखें, जो हर मोहब्बत करने वाले के दिल में एक बेचैनी पैदा करते हैं।
अब तुमसे मोहब्बत की ये आदत नहीं जाती।
सुनता हूं कि आसानी से ये लत नहीं जाती।
आज के दौर में कवि सम्मेलन और मुशायरे भी तमाशा बन चुके हैं, इसलिए मुशायरे आदि में जाना आपको कम रास आता है। बाहरी दिखावा, आत्ममुग्धता और वाहवाही से दूर रहना आपको बेहद पसंद है। इस बात को आपने एक शेर में भी नुमायां किया है-
मुशायरों के तमाशे हमें न रास आए,
बहुत सुकून से रहते हैं वाह वाह से दूर।
शे’र में लहजे का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। शे’र में शेरियत न हो तो पाठक या श्रोता आनंदित नहीं होता है। कई बार एक ही विषय पर बहुत लोग शेर कहते हैं, लेकिन कमाल वहीं होता है, जहां कहने का ढंग अलहदा और अनोखा होता है। आक़िब साहब का भी इस संदर्भ में कहना है-
फर्क लहजों का है जनाब आक़िब,
शेर कोई नया नहीं होता।
हसनैन साहब की ग़ज़ल की भाषा में उर्दू और हिंदी का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है, जिसे आम पाठक भी आसानी से समझ सकता है। कहीं-कहीं पर उर्दू की कठिन शब्दावली की अधिकता भी देखने को मिलती है, लेकिन इसके उलट कहीं पर शुद्ध हिंदी का रूप भी दिखाई पड़ता है। सरल, सहज एवं लयात्मक शैली का प्रयोग आपने सुंदर ढंग से किया है। भाषा में कहीं-कहीं पर भाषिक अशुद्धियां भी दिखाई पड़ती हैं, जिस पर ध्यान आकृष्ट करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। मैं आपके उत्कृष्ट लेखन हेतु हार्दिक शुभकामनाओं सहित आपको बधाई प्रेषित करता हूँ।





