बड़े जो घर के सलीक़े से बात करने लगे
थे जितने बच्चे तरीक़े से बात करने लगे
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छोड़ कर बूढ़े शजर को घर अधूरे रह गये
परवतों से जब कटे पत्थर अधूरे रह गये
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इसी चमन में कई फूल देख आया हूं
मैं अपने बच्चों का स्कूल देख आया हूं
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दुखों का बैठ के कैसे कोई बदल निकले
जो चल सकें तो किसी मसअले का हल निकले
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पढ़ी लिखी तो नहीं थी मगर सलीक़े में
वो सबसे आगे थी हर तौर में तरीक़े में
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डराया था मगरमच्छों ने घर से मत निकलना तुम
मगर हम मछलियां फिर भी इसी पानी में रहती हैं
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हर गली चलने को सुनसान नहीं होती है
ज़िन्दगी इतनी भी आसान नहीं होती है
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अब कहां दर्द की भाषा वो समझते होंगे
अपना रोना भी तमाशा वो समझते होंगे
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कोई भी चेहरा नहीं यों कि ऐसा- वैसा था
तुम्हारे शहर में हर शख्स चाँद जैसा था
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उसे लगता है वो गाकर मोहब्बत उससे करते हैं
नए पौधों को भौरों का पता कुछ भी नहीं होता
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वो जब तलक रहे दोनों जहां के जैसे थे
पिता ज़मीन पे उस आसमां के जैसे थे
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अपने लबों को अपने लिए खोलना पड़ा
जब वक्त आ गया तो हमें बोलना पड़ा
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वो जिंदगी में कहां मुश्किलें तलाशेंगे
जो हम मरेंगे सभी फाइलें तलाशेंगे
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ये और बात कोई मुश्किलें नहीं आईं
सफ़र सफ़र ही रहा मंज़िलें नहीं आईं
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मुस्तकिल है ना ठिकाना किसी बंदे की तरह
जिंदगी हमने गुजारी है परिंदे की तरह






