आतङ्कवाद (Terrorism) एक अत्यन्त ज्वलन्त एवं वैश्विक समस्या है, जो केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए संकट बन चुकी है । यह हिंसा, भय और विनाश का एक ऐसा रूप है, जिसमें निर्दोष नागरिकों, बच्चों, महिलाओं और आम जनजीवन को लक्ष्य बनाया जाता है । इसके माध्यम से कुछ विशेष वैचारिक, धार्मिक, राजनीतिक या क्षेत्रीय उद्देश्य साधने का प्रयास किया जाता है ।
आतङ्कवाद का उद्देश्य केवल शारीरिक क्षति नहीं होता, बल्कि मानसिक भय फैलाकर समाज की स्थिरता, लोकतन्त्र और विकास को बाधित करना होता है । आधुनिक युग में आतङ्कवाद के विविध रूप सामने आए हैं– जैसे धार्मिक आतङ्कवाद, क्षेत्रीय उग्रवाद, नक्सलवाद, और साइबर आतङ्कवाद आदि ।
‘आतङ्कवादशतकम्’ काव्य संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान् आचार्य डॉ.भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश शास्त्री’ द्वारा प्रणीत है । यह सन् 1992 ई. में संस्कृत भारती वाग्योगचेतना पीठ वाराणसी से प्रकाशित है । इसका अंकित मूल्य 60 रूपया तथा पृष्ठों की संख्या 148 है ।
समाश्वासयन् वाक्प्रजालैः प्रजाः स
कृपालुः सभातो बहिर्भाषते ताः ।
सुदीर्घोऽस्ति कालो गतो याति याता
प्रजा-दुःख- सन्तान कूटस्थता सा ।। श्लोक संख्या 10
वह भला नेता शब्दाडम्बरों से जनता को खूब आश्वासन देता है । कृपालु बनकर उससे सभा के बाहर बातचीत करता है । बहुत लम्बा समय बीत गया; बीत रहा है और भविष्य में बीतेगा भी । किन्तु जनता के दुःखों का वह सिलसिला ज्यों-का-त्यों बना हुआ है ।
चलच्चित्र- बस् यान हट्टादि-भागाः
प्रजा-संकुलाः सन्ति नो लक्ष्यभूताः ।
स्व-संचालितास्त्राण्युताऽप्पित्त-गोलान् ।
यथेच्छं प्रयुञ्ज्मो निहन्मोऽतिभूरीन् ।। श्लोक संख्या 32
सिनेमा, बस-यान, ( जहाज ), बाजार इत्यादि स्थान जो जनता से भरे रहते हैं, वे हमारे (आतङ्ककारी क्रिया-कलापों के) लक्ष्य बनते हैं । वहाँ हम स्वचालित हथियारों और बमों को अपने इच्छानुसार चलाते हैं और जितनी अधिक संख्या में हो सकता है, लोगों को मार डालते हैं ।
मताऽऽवेदने जाति भाषाप्रचारा
मतोपार्जने प्रान्तता-भाव-धारा ।
कुतो नो तदाधारतो राज्यवर्गः
स्वतश्चोर्जनं तन्निरास- प्रयासः ।। श्लोक संख्या 19
वोट माँगते समय जाति और भाषाओं के मुद्दे को प्रचार का विषय बनाया जाता है । वोट बटोरने के समय प्रान्तीय भावनाओं की धारा बहाई जाती है तो फिर उनके आधार पर राज्यों के वर्ग का घटन क्यों न किया जाए । पहले इनको स्वयम् उभाड़ा जाता है, और फिर बाद में उन्हें दबाने की कोशिश भी चलती है ।
बहिर्भारताद् भारतीया मुसिल्मा
अरब्बादि-देशेषु हिन्दुत्व भाजः ।
भवन्तीति शब्दो महाव्यापकोऽसा-
वतिक्रान्त-वर्गादि-जातिविभाति ।। श्लोक संख्या 105
भारत के मुसलमान जब भारत से बाहर अरब इत्यादि देशों में जाते हैं, तब वहाँ के लोग उन्हें ‘हिन्दू’ ( अर्थात् हिन्दुस्तान का निवासी ) कहते हैं । इसलिए यह ‘हिन्दु’ शब्द वर्ग, प्रान्त, जाति इत्यादि सबका अतिक्रमण कर बहुत व्यापक बन कर सुशोभित हो रहा है ।
क्वचिन्मातरो भ्रातरः सोदराश्च
क्वचिच्चात्मजाः स्निग्धभावा रमण्यः ।
समायान्ति वीरा इति प्रेक्षमाणाः
प्रतोलीं क्रुधा शङ्कया विह्वलन्ति ।। श्लोक संख्या 96
कहीं पर माताएँ और सगे भाई, कहीं पर पुत्र और स्नेह- स्निग्ध सुन्दरियाँ बड़ी बेताबी से प्रतीक्षा करती हुई राह में टकटकी लगाये रहती हैं कि हमारे ‘वीर’ आ रहे हैं । देर लगाने के कारण उन्हें अपने पुत्रों, भाइयों और पतियों पर क्रोध भी आ रहा होता है । किन्तु ज्यों-ही अनिष्ट की आशंका होती है, तो उससे विह्वल हो जाती हैं ।
यह शतक केवल आतङ्कवाद की आलोचना तक सीमित नहीं, बल्कि यह शांति, सहअस्तित्व और वैश्विक बन्धुत्व का संदेश भी देता है । यह काव्य एक प्रकार से चेतना का शंखनाद है कि अब भी समय है, हम मानवता की ओर लौटें ।





