भारतीय संस्कृति में संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, वह जीवन का मंगलगान है। विवाह हो, धार्मिक अनुष्ठान हो या कोई राष्ट्रीय पर्व—हमारे यहाँ किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि से होती है। इन्हीं ध्वनियों को जनमानस ने “मंगलध्वनि” कहा।
मंगलध्वनि का अर्थ है शुभ ध्वनि या कल्याणकारी ध्वनि। यह वह स्वर है जो किसी भी शुभ अवसर पर वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बनाने के लिए किया जाता है, जिससे वातावरण में उल्लास, समृद्धि और शांति का संचार होता है। विवाह, यज्ञोपवीत, नामकरण, गृहप्रवेश जैसे संस्कारों में मंगलध्वनि अनिवार्य मानी जाती है। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि विश्वास है कि ध्वनि-तरंगों से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में नई शुरुआत का आशीर्वाद मिलता है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में मंगलध्वनि को शुभता और ईश्वर की कृपा का प्रतीक माना जाता है।
जब लालकिले की प्राचीर से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत का सूरज उग रहा था, तब उस ऐतिहासिक क्षण पर लाल किले की प्राचीर से पं. नेहरू “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” भाषण देने से पहले बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई गूँजी। उस क्षण उनकी ध्वनि केवल कला नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की मंगलध्वनि बन गई। यह वही क्षण था जिसने शहनाई को लोक वाद्य से राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बना दिया। यह केवल संगीत नहीं था, बल्कि नवजन्मे राष्ट्र की मंगलध्वनि थी। 26 जनवरी, 1950, भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर भी उन्होंने लाल किले से राग कैफी की प्रस्तुति दी थी।
बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई को लोक के संकरे दायरे से निकालकर शास्त्रीय संगीत के उच्चतम मंच तक पहुँचाया। शहनाई, जो पहले केवल विवाह या मंदिरों तक सीमित थी, उनके हाथों में आकर राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गई। जब उनकी उंगलियाँ रीड्स पर थिरकतीं और साँस सुरों में ढलती, तो ऐसा लगता मानो गंगा की लहरें बह रही हों। यही वजह है कि उन्हें सुनना केवल संगीत सुनना नहीं था, बल्कि एक पवित्र मंगलक्षण का अनुभव करना था।
बिस्मिल्ला खाँ ने संगीत के जरिए धार्मिक सीमाओं को तोड़ा। एक मुसलमान होकर उन्होंने काशी के मंदिरों में बैठकर साधना की, गंगाघाटों पर रियाज़ किया। उनका कहना था—“संगीत खुदा है, और शहनाई मेरी इबादत।” यही कारण है कि उनकी ध्वनि हिंदू-मुस्लिम दोनों परंपराओं की साझी विरासत बन गई। गंगा-जमुनी तहज़ीब की यह मिसाल उन्हें केवल महान कलाकार नहीं, बल्कि संस्कृति का सेतु बनाती है।
आज, जब किसी कलाकार को धर्म देखकर तौला जाता है, जब किसी साज़ को “मुस्लिम” या “हिंदू” ठहराया जाता है, तब बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई हमें आईना दिखाती है। उनकी शहनाई का हर सुर कहता था —यह देश तभी महान है, जब इसका हर स्वर मंगलमय हो। उस जमाने में एक कलाकार मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ सकता था, गंगा की धारा से प्रेरणा ले सकता था और उसकी ध्वनि पूरे राष्ट्र की पहचान बन सकती थी। आज, जब समाज में धर्म और जाति की दीवारें ऊँची की जा रही हैं, तब बिस्मिल्ला खाँ का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची कला सीमाएँ नहीं मानती।
बिस्मिल्लाह खाँ का जन्म 21 मार्च 1916 को डुमरांव, बिहार में हुआ था। उनके परिवार में पीढ़ियों से संगीत का वातावरण था। बिस्मिल्ला खाँ ने पहली बार डुमराँव के बिहारी जी मंदिर में शहनाई बजाई। पाँच वर्ष की उम्र में माँ का साया खोने के बाद पिता बचई मियाँ ने पूरे मन से उन्हें संगीत की ओर लगाया और फिर मामू अली बक्स खाँ के पास बनारस भेजा। अली बक्स खाँ काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे और उनके कठोर अनुशासन व रियाज़ ने बिस्मिल्ला खाँ को संगीतमयी साधना का मार्ग दिखाया।
बचपन में ही वे अपने मामा अली बख्श ‘विलायतु’ से संगीत की बारीकियाँ सीखने लगे। काशी पहुँचने के बाद उनका जीवन और कला दोनों गंगा, घाट और मंदिरों की आध्यात्मिकता से गहराई से जुड़ गए। काशी ने उन्हें केवल एक कलाकार नहीं बनाया, बल्कि वहाँ की संस्कृति का सशक्त प्रतिनिधि बना दिया। यही कारण है कि लोग कहते हैं—”बिस्मिल्लाह खाँ काशी की शान थे।”
पुण्यनगरी और संगीत नगरी वाराणसी स्थित बेनिया बाग मुहल्ले के एक साधारण सी गली में रहने वाले बिस्मिल्ला खाँ की रगों में बनारसी मिजाज खूब गहरायी तक रचा-बसा था। मलमल का कुर्ता और चौड़ी मोहरी की सफेद गाँधी टोपी, हल्की दाढ़ी और छोटे-छोटे बाल दाहिने कान में सुनहरे तार का छल्ला और चेहरे पर हल्की मुस्कान। यहीं थी बिस्मिल्लाह खां के व्यक्तिव्य की पहचान।
विश्व के लगभग हर बड़े शहरों में शहनाई वादन कर आए, जहां भी गए ठेठ हिन्दुस्तानी कुर्ता-पैजामा, खाना भी अपना (भारतीय व्यंजन) ही खाया और कोशिश की पानी भी अपना ही रहे। आधुनिक दुनिया की चकाचौंध में घूमते-फिरते हुए भी आधुनिकता, विलासिता इनके सोच को लेस मात्र भी प्रभावित नहीं कर सका था। यही कारण था कि इन्हें चालीस साल पहले अमेरिका में बसने का न्यौता मिला था। लेकिन अपने शहर और गंगा मइया न मिल पाने के कारण अमेरिका जैसे समृद्धशाली देश में बसने से इन्होंने इंकार कर दिया था।
उनकी शहनाई वादन में एक अद्भुत जादू था। सुरों में ऐसी गहराई, ऐसी मिठास और ऐसा भावनात्मक स्पर्श होता कि श्रोता सुनते-सुनते दूसरी दुनिया में पहुँच जाते। वे कहते थे—“मेरी शहनाई में गंगा-घाट की गूंज है।” सचमुच, उनकी धुनों में काशी की परंपराएँ, गंगा की लहरें, मंदिरों की घंटियाँ और बनारस की गलियों की आत्मा बसी रहती थी।
बिस्मिल्ला खाँ बी० रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, बड़ी मोती जैसी सुरों की मलिकाओं के अलावा उस्ताद अल्ला रक्खा, डॉ० एम० राजन, विलायत खाँ, पंडित रविशंकर, सोमा घोष आदि के साथ जुगलबंदी किया था। जिनमें पंडित वी० पी० जोग की वायलिन तथा हामीज जाफर के सितार तथा उनकी शहनाई की जुगलबंदी विशेष प्रसिद्ध हैं।
उनकी शहनाई वादन में एक अद्भुत जादू था। सुरों में ऐसी गहराई, ऐसी मिठास और ऐसा भावनात्मक स्पर्श होता कि श्रोता सुनते-सुनते दूसरी दुनिया में पहुँच जाते। वे कहते थे—“मेरी शहनाई में गंगा-घाट की गूंज है।” सचमुच, उनकी धुनों में काशी की परंपराएँ, गंगा की लहरें, मंदिरों की घंटियाँ और बनारस की गलियों की आत्मा बसी रहती थी।
उनके संगीत की सबसे बड़ी खूबी थी उसका आध्यात्मिक स्वरूप। चाहे मुहर्रम के मौके पर बजाई गई उनकी दर्द भरी शहनाई हो या फिर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में भोलेनाथ के चरणों में समर्पित उनकी श्रद्धा, हर जगह उनकी तान लोगों को भीतर तक भिगो देती। बिस्मिल्लाह खाँ बाबा विश्वनाथ के आंगन में शहनाई बजाते थे तो वहाँ का पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता था और बाबा के भक्तों के हर-हर महादेव के उद्घोष से सारा वातावरण गूंज उठता था। मानो शहनाई के मधुर संगीत से बाबा जाग गए हों। यह सांप्रदायिक सौहार्द और भारतीय संस्कृति की गहराई का सबसे सुंदर उदाहरण था कि एक मुस्लिम कलाकार हिंदू मंदिरों में भी शहनाई बजाता और देवत्व को समर्पित करता था।
उनकी कला की गूंज केवल काशी तक सीमित नहीं रही। वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुँचे। लंदन, न्यूयॉर्क, टोक्यो और पेरिस जैसे शहरों में भी उनकी शहनाई की प्रतिध्वनि सुनाई दी। लेकिन इसके बावजूद उनका दिल काशी में ही बसता था। वे कहते थे—“काशी ही मेरी जान है, अगर गंगा नहीं होगी तो मैं जिंदा नहीं रहूँगा।” यही वजह रही कि उन्होंने जीवन का अधिकांश समय बनारस की गलियों और घाटों में गुजारा और वहीं से अपनी कला को सींचा।
भारत की सांस्कृतिक विरासत में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का नाम एक ऐसे कलाकार के रूप में दर्ज है जिन्होंने शहनाई जैसे वाद्य को लोक और विवाह प्रसंगों से उठाकर शास्त्रीय संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँचाया। शहनाई को एकल वाद्य के रूप में प्रतिष्ठा दिलाना उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाता है।
उनके योगदान को राष्ट्र ने भी गौरव के साथ स्वीकार किया। उन्हें पद्मश्री (1961), पद्मभूषण (1968) और पद्मविभूषण (1980) से सम्मानित किया गया। अंततः, वर्ष 2001 में उन्हें भारत रत्न से अलंकृत किया गया, जो न केवल उनकी कला की पहचान थी बल्कि शहनाई जैसे परंपरागत वाद्य को मिली सर्वोच्च प्रतिष्ठा भी।
उनका जीवन इस बात का प्रतीक है कि सच्चा संगीत वही है जो मनुष्य को उसके भीतर के ईश्वर से जोड़ दे। बिस्मिल्ला खाँ ने यही कर दिखाया—उन्होंने शहनाई को मंदिर की चौखट से उठाकर राष्ट्र की पहचान बना दिया। सचमुच, वे संगीत के उस शिखर पुरुष हैं जिन्होंने भारत की आत्मा को सुरों में बाँध दिया।
सरकारें “संस्कृति” की रक्षा का दावा करती हैं, लेकिन कलाकार भूख और गुमनामी में मरते हैं। क्या यही स्वतंत्र भारत का सपना था, जहाँ शहनाई गूंजती तो है पर कलाकार के घर में चूल्हा नहीं जलता? बिस्मिल्ला खाँ की पीढ़ियाँ गरीबी से जूझती रहीं, और आज भी सैकड़ों लोक कलाकार केवल इसलिए गुमनाम हो जाते हैं क्योंकि सत्ता उनकी कला को वोटों की भाषा में नहीं माप पाती।
बिस्मिल्ला खाँ को “मंगलध्वनि का नायक” कहा जाता है—लेकिन यह उपाधि उनके संगीत से कहीं ज़्यादा इस बात के लिए है कि उन्होंने हमें दिखाया: राष्ट्र का मंगल केवल तब संभव है जब हर आवाज़, हर सुर और हर इंसान को बराबरी का हक़ मिले। आज भारत को फिर उसी शहनाई की ज़रूरत है—जो सत्ता के शोर को चीरकर कहे: “मेरा देश जब तक विभाजन के सुर में गाएगा, तब तक मंगलध्वनि नहीं, सिर्फ़ शोर होगा।”
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ का जीवन यह सिखाता है कि सच्ची कला सीमाओं से परे होती है। धर्म, जाति या भाषा की दीवारें उनके संगीत के सामने ध्वस्त हो जाती थीं। वे कहते थे—“संगीत इबादत है, और इबादत का कोई मजहब नहीं होता।” यही वजह है कि उनकी शहनाई केवल सुरों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा थी।
इतिहास में 21 अगस्त का दिन भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के निधन के दिन के तौर पर दर्ज है। आज बिस्मिल्लाह खाँ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शहनाई की तान आज भी काशी की हवाओं में गूंजती है। उनकी धुनें आज भी हमें याद दिलाती हैं कि सच्चा कलाकार वही है जो अपने समाज और संस्कृति को आत्मसात कर, उसे पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करे। बिस्मिल्लाह खाँ ने यही किया—वे केवल शहनाई के उस्ताद नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की आत्मा और काशी की अमर पहचान बन गए।






