प्रिय समय,
आज बहुत दिनों बाद तुम्हें लिखने का मन हुआ है। ज़िंदगी के हर पड़ाव पर तुम मेरे साथ थे, पर हम दोनों ने शायद कभी सीधी बातचीत नहीं की। आज सोच रही हूँ, अगर तुम सामने होते तो क्या कहती।
सबसे पहले, तुम्हारा शुक्रिया। तुमने मुझे सिखाया कि कुछ भी स्थायी नहीं है। अच्छे पल हों या कठिनाई, सब तुम्हारी रफ़्तार में बह जाते हैं। जब मैं छोटी थी तो तुम बहुत धीमे लगते थे—छुट्टियाँ खत्म ही नहीं होती थीं, एक साल इतना लंबा लगता था जैसे सदियाँ हों। पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, तुमने अपनी चाल तेज़ कर दी। अब तो लगता है कि महीने पंख लगाकर उड़ते हैं। तुम्हारी यही बदलती चाल सबसे बड़ा सबक है कि हमें हर पल को पकड़कर जीना चाहिए, क्योंकि कोई पल दोबारा नहीं आता।
तुम्हारे साथ चलते-चलते मैंने जाना कि धैर्य ही सबसे बड़ा धन है। जब कोई सपना तुरंत पूरा नहीं होता, तो लोग अक्सर तुम्हें दोष देते हैं। कहते हैं—समय ठीक नहीं था। पर सच तो ये है कि तुम सिर्फ़ एक बहाव हो; बीज बोना हमारा काम है, मौसम की तैयारी करना हमारा काम है। तुम तो बस परिणाम दिखाने का अवसर लाते हो।
कभी-कभी तुमने बहुत दर्द भी दिया। किसी अपने को खोने का खालीपन, किसी रिश्ते का टूटना, या किसी योजना का असफल होना—ये सब तुम्हारी ही झोली में हुआ। पर इन्हीं पलों ने मुझे मजबूत बनाया। मैंने सीखा कि दुख को भी जीना पड़ता है, दबाना नहीं। और जब समय अपना चक्र पूरा करता है, तो वही दर्द किसी और समझ में बदल जाता है।
तुम्हारे साथ चलकर मैंने ये भी देखा कि इंसान बदलता है। जिस नीरजा ने बीस साल पहले सपने देखे थे, वो अब अलग है। पसंद-नापसंद, रिश्तों की परिभाषा, ज़रूरतें—सब बदल गया। और ये बदलाव डर नहीं, बल्कि सहज यात्रा है। तुमने मुझे सिखाया कि बदलाव ही जीवन का असली स्थायित्व है।
कभी मैं चाहती हूँ कि तुम थोड़ा रुक जाओ। जैसे जब बच्चे छोटे थे, उनकी मासूम हँसी को बस थोड़ी देर और सुन सकूँ। या वो शामें जब पूरा परिवार बिना किसी जल्दी के साथ बैठा करता था। पर फिर समझ आती है कि अगर तुम रुक जाओ तो ज़िंदगी आगे कैसे बढ़ेगी? नई यादें कैसे बनेंगी?
आज तुम्हें लिखते हुए मन में बस एक इच्छा है—कि तुम जैसे भी बहो, मैं हर पल का स्वागत करना न भूलूँ। भविष्य की चिंता कम करूँ, अतीत का बोझ हल्का करूँ और वर्तमान को पूरे दिल से जियूँ। क्योंकि सच तो ये है कि तुम न अच्छे हो न बुरे—तुम तो बस बहते हो, और हमें जीना सिखाते हो।
तुम्हारी अनगिनत सीखों के साथ,
नीरजा






