आलेख
निश्छल आत्मावलोकन का प्रयास: टुकड़ा-टुकड़ा जीवन
– पुनीता जैन
एक सामान्य दलित स्त्री षिक्षा प्राप्त कर अपने ग्रामीण, अषिक्षित परिवेष से बाहर आ जब अपने संघर्ष को शब्द देती है तब भी उसके कथन और विचारों का केन्द्र वही पारिवारिक जिम्मेदारी और लैंगिक पहचान ही होता है, जिसे स्त्रीवादी नज़रिया बारंबार प्रष्नांकित करता रहा है। विमर्षगत आग्रह या वैचारिक प्रतिबद्धता के बिना भी एक सामान्य स्त्री का संघर्ष ‘रसोई और शयन कक्ष ’ पर केन्द्रित रहता आया है, इसमें संदेह नहीं है। स्त्री होने के अतिरिक्त कावेरी की पहचान का एक हिस्सा उनका दलित होना भी है। किन्तु अपनी आत्मकथा ‘टुकड़ा टुकड़ा जीवन’ (2017) में वे दो-तीन जगह ही दलित उत्पीड़न के केन्द्र में है अन्यथा उनका वास्तविक संघर्ष स्त्री होने का संघर्ष है। पितृसत्ता द्वारा नियत पारिवारिक उत्तरदायित्व और स्त्री देह के लिए निर्धारित मानदंड-ये दो धुरी है जिस पर स्त्री को सतत् स्वयं को प्रमाणित करना होता है। षिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता को इस जड़ता से मुक्ति के साधन के रूप में अवष्य देखा जाता है। किन्तु वास्तव में भारतीय समाज, परिवार और पितृसत्ता द्वारा संचालित मानसिकता (जिसको स्वयं स्त्री भी वहन करते हुए अप्रत्यक्षतः शोषकों के साथ खड़ी हो जाती है) षिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन को भी अतिक्रमित कर अपना प्रभाव बनाए हुए हैं। इस तरह स्त्री चेतना वस्तुत दलित चेतना का ही वह रूप है जहां स्त्री जातिगत ही नहीं लिंगगत पहचान के रूप में भी अपने दलन, दमन का विरोध करती है। कावेरी अपनी आत्मकथा में इसी जातिगत और लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न, शोषण को रेखांकित कर विरोध व्यक्त करती है। ‘‘इस देष की सामाजिक व्यवस्था में ‘स्त्री’ प्रत्येक स्थान पर नकारी गयी है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ये चार पुरूषार्थ माने गए । दूसरे शब्दों में इन चार क्षेत्रों में स्त्री का प्रवेष निषिद्ध था। ऐसी व्यवस्था के प्रति जिस किसी भी स्त्री के मन में आक्रोष तथा संघर्ष की चेतना होगी, वह भी दलित चेतना के अन्तर्गत आयेगी। स्त्री के जितने भी रूप है (पत्नी, माँ, बहन, रखैल, वेष्या, नर्तकी, कामकाजी) उनमें से जहाँ कहीं अन्याय, अत्याचार, शोषण होगा और उन सबके प्रति जहाँ आक्रोष होगा, अथवा उन सब स्थितियों से उबरने की कोषिष होगी वहाँ ‘दलित चेतना’ होगी।’’1 कावेरी की आत्मकथा जाति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के शोषण के विरूद्ध संघर्ष की कथा है। जाति दंष यदि एक दलित को प्राथमिक विद्यालय में ही भेदभाव का बोध करा देता है तो स्त्री असुरक्षा का दंष भी बचपन से ही प्रारंभ हो जाता है जिसे ट्रेन में, दादी द्वारा सुरक्षित बर्थ पर किसी व्यक्ति के पास बिठाने से लेकर घर में सगे -संबंधियों की कुदृष्टि जो लेखिका ही नहीं उनकी बेटी तक पर में देखा जा सकता है जिसे कावेरी बेबाक रूप से रेखांकित करती है।
‘‘टुकड़ा-टुकड़ा जीवन’ दलित स्त्री द्वारा लिखी गयी चैथी आत्मकथा है। ईषा ज्ञानदीप प्रकाषन से 2017 में प्रकाषित इस आत्मकथा में वर्ण, शब्द और वाक्य संरचनागत अषुद्धियाँ बहुतायत में मिलेंगी । भाषिक व मुद्रणगत त्रुटियांे के कारण इसे पढ़ना कष्ट साध्य व श्रम साध्य है। लेखिका बिहार निवासी है अतएव स्थानीय लहजे में संरचित वाक्य व्यवस्था व अन्य अषुद्धियाँ कथा प्रवाह को खंडित करते हैं। प्रकाषक और लेखक दोनों को इस ओर ध्यान देने की सख्त आवष्यकता है। ‘सब दिन अकेले रहकर मनचाहा खान-पान किए थे’ जैसे वाक्यों के साथ-साथ अप्रयाष्चित आत्मसाथ, खुदखुषी, क्षुब्द, ईषारा, टिऊसन जैसे अषुद्ध शब्द पूरी रचना में कई जगह प्रयुक्त हुए हैं।
कावेरी के जीवन का पूर्वार्द्ध ग्रामीण जीवन से संबद्ध रहा है। अतः ग्रामीण जीवन में व्याप्त अषिक्षा, दरिद्रता, जातिगत भेदभाव तथा भूतप्रेत- व अंधविष्वास की आड़ में होने वाले व्यभिचार के दृष्य इस आत्मकथा के भी अभिन्न अंग है। ग्रामीण जीवन में दलित व संवर्ण का पारिवारिक सम्पर्क सामान्यतः दिखाई नहीं देता, किन्तु स्वयं दलित परिवारो में भी यह भेदभाव परिलक्षित होता है। कावेरी उल्लेख करती है कि ‘‘कहार-कान्दू, नाई, कुर्मी में भी अपने को मेरी जाति से ऊंचा मानते थे। (त्रुटिपूर्व वाक्य संरचना) । पढ़ने जाते समय यदि कोई कहारिन पानी लाते समय रास्ता में मिलती तो हम लोग से नहीं छुआती । उस समय मन में लगता – ये गंदे लोग क्यों ऐसा करते है। हम लोग सम्पन्न साफ-सुथरे और उनसे सलीके वाले थे। उनके घर का खाना यदि खाना होता तो हम लोग कभी नहीं खाते।’’2 आंतरिक जातिवाद के ऐसे उद्धरण अनेक दलित आत्मकथाओं में दोहराए गए हैं। जबकि समाज में जातिभेद का अनुभव उन्हें प्राथमिक विद्यालय में ही हो गया था। आगे चलकर हाॅस्टल में सरस्वती पूजन, भोजन परोसने, पूजा-पाठ में उनसे भेदभावपूर्ण व्यवहार हुआ, जिसका उन्होंने विरोध भी दर्ज कराया। जहां षिक्षिका बनने का प्रषिक्षण दिया जा रहा हो वहाँ इस तरह के जाति आधारित भेदभाव पर वे प्रष्न उठाती हैं । किन्तु यह सच है कि भारतीय समाज का षिक्षित वर्ग तक इस भेदभावपूर्ण व्यवहार से परे नहीं है। स्कूल में नौकरी लगने पर ब्राह्मण सेक्रेटरी द्वारा सभी को घर पर आमंत्रित किया जाना तथा कावेरी को जातिगत कारणों से अलग कप में चाय दिया जाना, इसका अपमानजनक उदाहरण है। अन्य दलित चिंतकों की तरह कावेरी भी आंबेडकर के तीन मूलमंत्र – षिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो – को दलित उत्थान हेतु आवष्यक मानती हैं। विवाह पष्चात् भी षिक्षा हेतु सतत प्रयास, जातिगत भेदभाव व अपमान का विरोध कर इस मंत्र को वे व्यवहार में उतारती भी हैं।
हिन्दी में दलित स्त्री रचनाकारों की अब तक प्रकाषित चारों आत्मकथाओं के विष्लेषण से यह तथ्य स्पष्ट रूप से निकल कर आता है कि दलित लेखिकाओं की पीड़ा में जातिदंष से अधिक हिस्सा स्त्री उत्पीड़न का रहा है। पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रस्त स्त्री जगत भी पारिवारिक कलह में प्रमुख भूमिका निभाता है। सुषिक्षित , साहित्यकार पति भी अन्ततः इसी स्त्री विरोधी पितृसत्तात्मक मानसिकता से इस कदर ग्रस्त है कि पत्नी के चरित्र के प्रति तो वह शंकालु है किन्तु पत्नी व बेटी पर डाली जा रही निकट संबंधी की कुदृष्टि की षिकायत को लेकर वह लापरवाह है। आत्मकथा के केन्द्र में भी पारिवारिक मसले, ससुराल की कलह, पति की अवज्ञा व प्रताड़ना है। एक दलित लेखक का पति की भूमिका में शोषक होना यह भी दर्षाता है कि शोषण विरोध की यह विचारधारा अपनी सामाजिक, पारिवारिक भूमिका को लेकर गंभीर नहीं है। परिवार के स्त्री समूह की ईष्र्या, द्वेष, डाह या संकीर्ण मनोवृत्ति की आड़ में पुरूष सत्ता अपना स्वार्थ साधती आई है। पत्नी की देह, श्रम, अस्तित्व से लेकर वेतन तक पर उसका वर्चस्व कायम है। संभवतः इसीलिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कावेरी महिला सषक्तिकरण को प्रवंचना कहती हैं। जातिदंष की तुलना में स्त्री षोषण की अधिक षिकार रही लेखिका की वेदना, आत्मस्वीकृतियों को यहाँ अधिक स्थान मिला है। फिर भी यह कथा पारिवारिक उठा-पटक का मसला अधिक है। स्त्री द्वारा स्त्री का दोहन, पति-देवर द्वारा स्त्री देह व आत्मा का सतत् अपमान यहाँ मुखर रूप से अभिव्यक्त है। दरअसल पितृसत्तात्मक व्यवस्था के साथ स्त्री जाति का मानसिक अनुकूलन स्वयं उसे स्त्री अस्मिता, सम्मान के विरूद्ध खड़ा कर देता है। परिवार – विवाह को बचाए रखने हेतु समझौतावादी प्रवृत्ति से लेकर स्त्री अस्मिता को विविध अनुषासनों, बंधनों में जकड़े रखने की प्रवृत्ति के पीछे इसी पितृसत्ता की हितैषी मानसिकता कार्य करती है।
प्रस्तुत आत्मकथा में कावेरी एक संघर्षषील महिला के रूप में सम्मुख आती है जो देर से ही सही ग्रामीण जड़ता, पारिवारिक कलह को पीछे छोड़ षिक्षा प्राप्त कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती है, तत्पष्चात् संघर्ष यात्रा को लिपिबद्ध करने हेतु कलम भी उठाती है। किन्तु जातिगत भेदभाव के प्रति समाज में मुखर विरोध दर्ज कराने वाली कावेरी परिवार के भीतर मूक समझौतावादी ही अधिक रहीं हैं। समझौतों को उन्होंने विवाह और परिवार को बचाने का अंतिम हथियार माना। उल्लेखनीय है कि दलित समाज के शोषितों में भी शोषक वृति नेे मजबूती से जड़ें जमा रखी हैं। शक्ति के केन्द्र पुरूष सत्ता ने स्त्री पर पूर्ण वर्चस्व कायम रखा है। यहाँ भी त्याग, समर्पण, समझौतों का दायित्व निर्वाह स्त्री द्वारा ही सम्पन्न होता है। कावेरी का असुरक्षाबोध भी उसे पति की छत्रछाया में रहने हेतु विद्रोही नहीं होने देता । किन्तु इसके परिणामस्वरूप एक चिर अकुलाहट, बेचैनी उनमें स्थायी रूप से घर कर जाती है जो उन्हें अन्ततः जीवन के उत्तरार्द्ध में लेखनी उठाने को विवष कर देती है। कावेरी के लेखन में स्पष्टवादिता और मुखर आत्मस्वीकृतियाँ भी दिखती है। वे स्वीकार करती हैं कि विद्रोह, निडरता और आत्मसम्मान के अभाव ने उन्हें भीरू स्वभाव का बना दिया। जिस तरह वे सास का विरोध नहीं कर सकी उसी तरह बहू का भी और यहाँ तक कि कई स्थान पर वे विद्यार्थियों तक से भय खाने लगती है। उनकी यह आत्मस्वीकृति यह सिद्ध करती है कि अति सहनषीलता व्यक्ति को दमन सहने का आदी बनाकर जड़ कर देती है। यहाँ हम गांधी जी का स्मरण कर सकते हैं जिन्होंने अन्याय को सहने वाले को भी दोषी माना है क्योंकि यह समाज में दमन, दलन, शोषण की परम्परा का बीजारोपण करती है। पति की छत्रछाया को सुरक्षित कवच के रूप में अंगीकार करने की प्रवृत्ति स्त्री को दुर्बल बना उसकी विद्रोह चेतना को कुंद कर देती है। जीवन के उत्तरार्द्ध में लेखनी द्वारा आत्माभिव्यक्ति को अपनाने वाली यह प्रवृत्ति कौसल्या बैसंत्री, सुषीला टाकभोरे से लेकर कावेरी तक में है। किन्तु यहाँ उल्लेखनीय है कि इन लेखिकाओं में सुषीला टाकभोरे और रजनी तिलक अधिक साहसी और मुखर रही हैं। कावेरी की जीवन यात्रा यह स्पष्ट करती है कि पारिवारिक, सामाजिक जड़ मान्यताएँ स्त्री जीवन को सर्वाधिक कष्टकारी बनाती है। पति का असहयोग इसे और दुष्कर बनाता है। प्रायः स्त्री के पैतृक पक्ष द्वारा भी समझौते और त्याग की षिक्षा दी जाती है। षिक्षा और आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री का साहस और विद्रोह ही उसकी मुक्ति का रास्ता प्रषस्त करने में सक्षम है। कावेरी का अनुभव कहता है कि समाज में स्त्री का सम्मान उसके प्रत्येक स्थिति में गूँगी बहरी रहने में है।
ग्रामीण व पिछड़े रूढि़बद्ध समाज में आज भी स्त्री का षिक्षा प्राप्त कर पैरों पर खड़े होना कठिन है । यहाँ उसका कार्यक्षेत्र आज भी पािरवार तक सीमित है। ग्रामीण समाज स्त्री के विषय में ही रूढि़बद्ध नहीं है, बल्कि भूतप्रेत, झाड़-फूँक आदि अंधविष्वासों का भी केन्द्र है। लेखिका की बीस वर्ष पूर्व मृत लड़की का नाम आज भी गाँव के ओझा टोने टोटके, भूत-प्रेत से जोड़ते है। ये अंधविष्वास ग्राम जगत के कई लोगों के प्राण ले लेता है किन्तु ये अंध श्रद्धाएँ आज भी जीवित है । यह आष्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि आदिमयुगीन अंध विष्वास, कृषि युग, औद्योगिक युग से होते हुए आज सूचना प्रौद्योगिकी के युग के कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिषियल इंटेलीजेंस) तक पहुँच जाने के बावजूद समाज में क्रियाषील हैं। षिक्षित व्यक्तियों के भीतर भी अनंत रहस्य के प्रति भय और जिज्ञासा न केवल बनी हुई है, वरन् उसे टोने-टोटकों, रत्नों, काले-लाल धागों की ओर ले जाती है। यही कारण है कि पीलिया , डायरिया, साँप काटने का इलाज अषिक्षित ग्रामीण समाज झाड़-फूँक में ढूँढता ही है, षिक्षित समाज भी ‘इन झाँसों में आकर घर के सदस्यों को खो देता है।
कावेरी की आत्मकथा हिन्दी दलित आत्मकथा के परिदृष्य में आगामी कड़ी है तथा जातिगत पीड़ा से अधिक स्त्री के प्रति अन्याय, शोषण, दोहन को अधिक विस्तारपूर्वक अभिव्यक्ति देती है। दलित आत्मकथाओं ने सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रताड़नाओं की पीड़ा को पर्याप्त रूप से कह और दुहरा दिया है। ऐसे में किसी भी नवप्रकाषित आत्मकथा में कुछ नया ढूँढना गलत नहीं होगा। कावेरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के भीतर अकुलाती विवषताओं, समझौतों और व्यथा को अभिव्यक्ति देती है। हालांकि यह बार बार कहना होगा कि टंकण-मुद्रण और प्रूफ की त्रुटियाँ, वर्ण, शब्द, वाक्य संरचनागत अषुद्धियाँ की आवृत्तियाँ रचना को पढ़ने में अत्यधिक अवरोध उपस्थित कर इसके अध्ययन को कष्ट साध्य बनाती हैं। इस ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाना अति आवष्यक है। बहरहाल ग्रामीण और पिछड़े समाज में संघर्षपूर्वक षिक्षा ग्रहण कर आत्मनिर्भर होना आज भी कठिन है, कावेरी की कथा यह स्पष्ट करती है । पिछड़े समाज में स्त्री का कार्य -क्षेत्र आज भी परिवार तक सीमित है ।
वर्तमान परिदृष्य पर दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ राष्ट्रवादी संकीर्णतावाद भी षिक्षित समाज में जड़े जमा रहा है। ग्रामीण अषिक्षित समाज में जातिव्यवस्था और पितृसत्तात्मक मानसिकता के अनुसार स्त्री के प्रति पूर्वाग्रह मौजूद हैं किन्तु नवोदित संकीर्णतावादी प्रवृत्ति में स्त्री और दलितों के प्रति हिंसक और क्रूरतम व्यवहार दिखाई देता है। गाँवों में ऊँंच-नीच की भावना तो है ही, किन्तु जातिगत भेदभाव के उन्मूलन के प्रयासों की जगह प्रत्येक जाति स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने हेतु प्रयासरत है। कावेरी बताती है -‘‘जातिवाद से जल रहे हैं हमारे गाँव घर। अभी भी यह भेदभाव खुल्लम-खुल्ला दिखाई देता है। हर जाति ने अपने नीचे एक जाति बना ली है, जिससे वह खुद को ऊंँचा समझ आत्मसंतोष करती है।’’3 यह वर्चस्ववादी और शक्ति केन्द्र बनने की प्रवृत्ति है। यही नहीं जाति समाप्त करने के स्थान पर स्वयं को ऊंची जाति का सिद्ध करना जातिवादी संरचना को जीवंत बनाए रखने का अप्रत्यक्ष तरीका है।
जातिवादी दृष्टि शहरी षिक्षित समाज में भी गहरे तक पैठी है। गाँव में यदि एक दलित को रामलीला में ‘लक्ष्मण’ की भूमिका इसलिए नहीं दी जाती कि अन्य भूमिका के सवर्ण एक दलित की रोज आरती उतारने के लिए तैयार नहीं है तो दूसरी ओर शहर में एक दलित द्वारा कार खरीदना और रोज उससे कार्यालय आना उच्च जातियों को नागवार गुुजरता है, तथा दलित को चोरी के जुर्म में पकड़वा दिया जाता है। वस्तुतः जातिगत भेदभाव को समाप्त करने की जिम्मेदारी प्रत्येक समता, स्वतंत्रता प्रिय नागरिक की है। षिक्षित दलितों की जवाबदेही पर कावेरी टिप्पणी करती है- ‘‘ये पढ़े लिखे अपने जाति-समाज से दूर सवर्णों के हेठी से दूर स्वयं में सिमट गए हैं। घर में बंद अपने बाल-बच्चों के साथ ही समय गुजरता है। ऐसे में नए भारत की कल्पना करना मूर्खता है।’’4 इस दायित्व बोध की आवष्कयता को महसूस किया जाना निष्चित ही आवष्यक है। किन्तु कावेरी यह भी उल्लेख करना नहीं भूलती कि नौकरी में प्रोन्नति, पोस्टिंग में वे सवर्णों ही नहीं दलितों की ईष्र्या द्वेष का भी पात्र बनी तथा उनके विरूद्ध गोपनीय रूप से पत्र लिखे गए । किन्तु यहाँ वे साहसपूर्वक संघर्ष कर अपना अधिकार प्राप्त करती रहीं।
कावेरी की आत्मकथा यह स्पष्ट संकेत करती है कि संघर्षपूर्वक षिक्षा, आजीविका प्राप्त करने वाली सामाजिक रूप से सजग स्त्री का पारिवारिक जीवन में ओहदा दोयम दर्जे का ही रहा । बाहरी जीवन में साहसी कावेरी घर में समझौतावादी, भीरू प्रकृति की रहीं। यहाँ तक कि स्वअर्जित धन का इच्छानुसार उपयोग नहीं कर सकी। इस आत्मकथा में कई स्थान पर वे तटस्थ आत्मविष्लेषण करती हैं। स्त्री का अवचेतन उसकी वास्तविक स्थिति को उजागर करने में सहयोग देता है। वे अपनी स्थिति का खुलासा करते हुए कहती है- ‘‘अक्सर हाँ मैंने सपने में अपने को नाटक करते देखा । मुझे गाय का रोल मिलता। एक बार स्क्रिप्ट देख लेती। फिर मुझे पढ़ने का मौका कहाँ मिलता। मंचन के दिन संवाद लेखक के पीछे – दौड़ती रहती । अरे, मुझे कब क्या बोलना है। संवाद लेखक खीजकर मेरे सर पर लगे दोनों सींग उतार देता । तुम जर्सी गाय की तरह कम बोलना। सिर्फ मंच पर अपना चेहरा दिखा देना।’’5 पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था की विवाह और परिवार संस्था में अथक श्रमरत, समर्पित स्त्री के भीतर छटपटाती विद्रोह चेतना को ‘सींग रहित चेहरा’ बना देने का पूरा प्रयास किया जाता है। स्त्री के अवचेतन मन का यह स्वप्न उसकी वास्तविक स्थिति का उद्बोधन है। विद्रोहरहित, वाणीरहित स्त्री चेहरा ही कथित शोषण विरोधी, समतावादी दलित समर्थकों को मान्य होना उनके दोहरेपन का उदाहरण है। असमानता, अन्याय के विरोधी का यह वर्चस्वषाली रूप प्रष्न खड़े करता है। वस्तुतः पितृसत्ता और जाति सत्ता की प्रकृति भिन्न नहीं है । सांस्कृतिक, सामाजिक मान्यताएँ गढ़कर स्त्री और दलित दोनों को अधीन रखने की लंबी परम्परा रही है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री भी इनके द्वारा गढ़ी मान्यताओं से अनुकूलन कर दबीं सहमी रहकर पति व परिवार के शोषण को स्वीकार करती है। त्याग, समर्पण, संयम के अनुषासन स्त्री के लिए नियत है। परिवार और पति के प्रति समर्पण का अभाव उसे अपराध बोध से भर देता है। गाँव-देहात ही नहीं षिक्षित शहरी समुदाय की स्त्री भी कई सींकचों, खाँचों में बद्ध है। समाज द्वारा प्रदत्त भूमिकाओं में बद्ध स्त्री को मुक्ति की लंबी यात्रा तय करनी है । अभी तो वह भारतीय परिवार के भीतर भी सास-बहू रूप से मुक्त न होकर स्त्रियों की परस्पर ईष्र्या-द्वेष, क्रोध, प्रतिद्वन्द्विता से घिरी स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान से दूर है। कावेरी स्वयं को पत्नी, बहू, सास सभी रूप मंे शोषित व अवहेलित बताती है। दरअसल स्त्री की सामाजिक, पारिवारिक भूमिका के नीचे उसकी वास्तविक इयत्ता स्त्री और मनुष्य होने का भाव दबा सहमा रह जाता है। वह परिवार के भीतर पुत्री की मृत्यु, पुत्र की असफलताओं का दोष वहन करती है तो सामाजिक रूप से किरण बेदी, मदर टेरेसा न बन पाने, गरीबों, वंचितों के लिए कुछ न कर पाने के अपराध बोध से भी ग्रस्त है। इस विचलन पूर्ण अन्तद्र्वन्द्व का कारण वे पारिवारिक, सामाजिक भूमिकाएँ हैं जो उससे अपेक्षित हैं। यह आष्चर्यजनक है कि एक स्त्री ‘स्व’ को त्याग कई -कई भूमिकाओं, रूपों में स्वयं को स्थापित, सफल करना चाहती हैं ताकि उसे परिवार, समाज की स्वीकृति मिले अन्यथा आत्मग्लानि उसे अंदर तक कुरेदती, विकल करती रहती है। एक स्त्री का इस तरह पितृसत्तात्मक समाज द्वारा प्रदत्त भूमिकाओं, कथित महान, त्यागपूर्ण रूपों में स्वयं को स्थापित करने का प्रयास क्या दर्षाता है? यही कि दलित चेतना के भीतर संघर्षषील स्त्री को स्त्री चेतना के वास्तविक धरातल पर आरूढ़ होने में अभी बहुत समय लगेगा। एक षिक्षित स्त्री का प्रदत्त पारिवारिक भूमिकाओं में स्वयं को सफल बनाने का प्रयास दर्षाता है कि स्त्री का ‘स्व’ अभी इतना दबा, कुचला, सहमा है । वह स्थापित मानदंडो, खाँचों का अतिक्रमण करने की स्थिति में नहीं है।
एक निष्पक्ष आत्मकथा में आत्मालोचन की पर्याप्त गुंजाइष होती है। रचनाकार बेबाक व साहसपूर्ण आत्मावलोकन प्रस्तुत करे, यह अपेक्षा उससे की जाती है। कावेरी की आत्मकथा में इसके पर्याप्त संकेत मिलते हैं। अपने भीरू स्वभाव, क्रोध, उग्रता व अन्य दुर्बलताओं को वे उद्घाटित करती हैं। ‘‘मेरे अंदर भी अवगुणों की खान है। सोचने समझने में गंभीरता नहीं । सही निर्णय लेना नहीं। इसके कारण मैंनें जीवन में असफलता पाई है।’’6 उन्हें आभास है कि उनका शोषण, हो रहा है। परिवार, रिष्ते, नाते, विद्यालय मे ंउनके समर्पण का दोहन किया गया है। वे स्वीकार करती हैं कि ‘‘बचपन में भैया का दमन चक्र, जवानी में पति का अब बुढ़ापे में पुत्रों का चल रहा है।’’7 यहाँ यह भी स्पष्ट है कि उक्त पंक्ति सिद्ध करती है कि ग्रंथों – शास्त्रों द्वारा स्त्री को नियंत्रित करने की योजना सतत् रूप से संचालित है और जब वे यह भी उद्धृत करती हैं कि ‘त्याग, सेवा और साधना’ ही स्त्री के हिस्से में आया है तथा पुरूष वर्चस्व की विरोधी को कुलटा कहा गया है, तब वे एक षिक्षित स्त्री की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के साथ मानसिक अनुकूलन का उदाहरण बन कर उपस्थित हो जाती हैं। इस प्रकार कावेरी की आत्मकथा अकुलाहट, विद्रोहचेतना और अनुकूलन का एक ऐसा स्वरूप उपस्थित करती है जो वर्तमान स्त्री की वास्तविक स्थिति का अहसास करा देती है। उल्लेखनीय है कि लेखिका ईमानदारी पूर्वक आत्मावलोकन तो करती ही है, साथ ही पति की आक्रामकता, दुर्बलता के साथ उनके सहयोगी रूप को भी रेखांकित करती है।
वैचारिक रूप से कावेरी बाबा आंबेडकर को स्वीकार करती है किन्तु हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में जड़ें जमाए बैठे संस्कार उनमें भी दृष्टिगोचर होते है। भाग्यवाद, कर्मफल, नरक आदि शब्द उनके धार्मिक विष्वासों की ताकीद करते हैं। बहरहाल, अपनी जीवनयात्रा को प्रस्तुत करने के बहाने वे जातिवाद, स्त्री चेतना ही नहीं, गाँव में सांस्कृतिक पतन, मानवमूल्यों के पतन, शहरी परिवेष में बढ़ती आत्मलिप्तता, विज्ञान, अंधविष्वास, आरक्षण आदि पर भी विचार रखती है। मुद्रण, व्याकरणिक अषुद्धियों को नजर अंदाज कर दिया जाए तो कावेरी की यह सहज और निष्कपट प्रस्तुति भारतीय सामाजिक संरचना में स्त्री शोषण के बाह्य कारकों के साथ स्वयं स्त्री के इस व्यवस्था में मानसिक अनुकूलन का भी स्पष्ट उदाहरण बनकर सम्मुख उपस्थित है।
संदर्भ
(1) दलित साहित्यः स्वरूप और सवेदना (2009) – सूर्यनारायण रणसुभे,
अमित प्रकाषन, गाजियाबाद , पृष्ठ 36
(2) टुकड़ा-टुकड़ा जीवन, (2017) कावेरी, ईषा ज्ञानदीप प्रकाषन, पृष्ठ 11
(3) वही, पृष्ठ – 86
(4) वही, पृष्ठ – 86
(5) वही, पृष्ठ – 90
(6) वही, पृष्ठ – 127
(7) वही, पृष्ठ – 105
– पुनीता जैन






