हाइकू
हायकू
उदास हवा
खिड़की से झाँकती
सब्ज़ दीवारें।
मन का पंछी
चाहे खुला आसमां
ख़्वाबों का जहां।
दिल की ज़मीं
स्नेह बूँद तरसी
वृद्ध आश्रम।
रश्मि के टेसू
पत्तियों से झाँकते
भोर की बेला।
चातक प्यासा
आँखें मूँद के रोता
झड़ते पत्ते।
नदी किनारे
कभी मिलते नहीं
रेल पटरी।
ढूँढ़ें ज़िन्दगी
फुरसत के लम्हे
सायों के पीछे।
कटी पतंग
गिरी डगमगाती
मुर्दों के घाट।
भावों की नौका
ढूँढ़ें काव्य किनारा
साहित्य ताल।
ज़मीं बाँटते
सरहदों में लोग
चाँद निराला।
भुगते ज़मीं
इंसान की गलती
नंगे पर्वत।
ज़ुल्फ़ें खोलतीं
मदमस्त बरखा
अँधेरी रात।
शाख से टूटी
सूखकर पत्तियाँ
बेज़ान रिश्ते।
– प्रदीप शर्मा दीप
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