उभरते-स्वर
कविता- देखो, कैसी चली हवा
नहीं दिखाई देती, फिर भी
सन-सन करती चली हवा,
फर-फर करती चली हवा।
नहीं दिखाई देती फिर भी,
देखो, कैसी चली हवा।
हवा झूम जब आती है,
फूलों को महकाती है।
तब कुछ भौंरे आते हैं,
फूलों पर मँडराते हैं।
फूल बहुत शरमाते हैं,
बादल भी घिर आते हैं।
टिप-टिप बूँदें गिरती हैं,
कड़-कड़ बिजली करती है।
बिजली जब गुस्साती है,
सबको ख़ूब डराती है।
हवा चली तो बरसा पानी,
खेतों में छाई हरियाली।
कितनी प्यारी चली हवा,
हर मन को भा चली हवा।
नहीं दिखाई देती फिर भी,
देखो, कैसी चली हवा।।
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कविता- मेरे साथ गगन तक जाए
बिना डोर मैं उड़ ना पाऊँ,
उड़ पाऊँ तो मज़े दिलाऊँ।
डोरी में मैं जब बँध जाऊँ,
उसके साथ गगन तक जाऊँ।
बच्चों को मैं नाच नचाऊँ,
लेकिन उनके हाथ न आऊँ।
उनके हाथ तभी मैं आऊँ,
जब डोरी से मैं कट जाऊँ।
जो भी मेरा नाम बताए,
मेरे साथ गगन तक जाए।।
– नूरेनिशाॅं




