ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
बदला है सदा मौसम, बदली न कहानी है
हर बार मुहब्बत ने कुछ करने की ठानी है
दौलत की अदालत में इन्साफ़ भला कैसा?
उल्फ़त के परिन्दों को बस जान गँवानी है
चाहे तो कोई देखे हर चाँद के माथे पर
बेदर्द ज़माने की ठोकर की निशानी है
तेवर ये समंदर के क्या देखेगा वो जिनकी
तूफ़ां से उलझने की आदत ही पुरानी है
उम्मीदों के पंखों से नभ नापने वालों की
हर शाम नशीली है, हर सुब्ह सुहानी है
कुछ और सितम दुनिया करती है, तो करने दो
हमको तो मोहब्बत की, बस जोत जलानी है
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ग़ज़ल-
भला क्यों बोझ ढोएँ हम दिमागों में तनावों के
हमें तो ख़ूब आता है बदलना रुख़ हवाओं के
लबों पर फूल की ख़ुशबू और आँखों में है मस्ती-सी
अजब हालात देखे हैं जहां में पारसाओं के
उमर गुज़री है लेकिन लक्ष्य हासिल कर नहीं पाए
न जाने किस तरह के तीर रहते हैं शुजाओं के
बदलते ही नहीं, हमने पिघलते जाम देखे हैं
कभी कुछ इस तरह के भी असर होते अदाओं के
सँभलकर पाँव तुम रखना, कभी धोखे में मत आना
बड़े पेचीदा रस्ते हैं सियासत की गुफ़ाओं के
समय की आँधियों ने अब हमें ऐसा बना डाला
कभी युवराज हम भी थे ज़माने की कथाओं के
किसी चिलमन से होकर एक पुरवा आके कहती है
‘विशद’ तैयार हो जाओ, इशारे हैं घटाओं के
– डॉ. रंजन विशद




