आलेख
उपन्यासों में धार्मिक एवं जातीय परिवर्तन
– डॉ. मोहनसिंह यादव
प्रगति एवं परिवर्तन प्रत्येक समाज की निरन्तरता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। धर्म में आवश्यक परिवर्तनों के महत्व को स्वीकार कर, उनके लिए स्थान रखा जाना चाहिए। संस्थाए समय विशेष की उपज होती हैं और समय के साथ-साथ परिवर्तित तथा नष्ट भी हो जाती हैं। धर्म तथा इन संस्थाओं को अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ नहीं माना जा सकता। एक युग विशेष के विश्वासों, रूढ़ियों, प्रथाओं और संस्थाओं को उसी रूप में दूसरे युगों के लिए स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार इनमें परिवर्तन लाना आवश्यक होगा अन्यथा ये समाज की प्रगति में बाधक बन जायेंगी।
हमें धर्म तथा रूढ़ियों को आँख बंद कर स्वीकार नहीं करना है। हिन्दी उपन्यासों के प्रमुख पात्र आधुनिक शिक्षा एवं विज्ञान से दीक्षित हैं। वे सभी धर्म तथा ईश्वर के सम्बन्ध में नई मान्यताएँ प्रस्तुत करते हैं। “लेनिन का धर्म को अफीम कहते हुए परम्परागत धर्म के अस्तित्व को आमान्य घोषित करना, नीत्शे द्वारा “ईश्वर मर चुका है” की घोषणा करना, ने आदि के द्वारा धार्मिक अन्धश्रद्धा को बहुत सीमा तक अंत कर दिया गया है। धर्म की आड़ में पनपते भ्रष्टाचार एवं व्याभिचार का पर्दाफाश करते हुए इन समाजवादी उपन्यासकारों ने अनेक नये मूल्य प्रकट किये हैं।”1 धर्म सम्बन्धी परम्परागत विचारों को अर्थहीन मानते हुए नियति के सम्बन्ध में मार्क्सवादी उपन्यासकारों का मत है कि मनुष्य स्वयं ही अपनी नियति का मूल नियंता है।
“स्वर्ग-नरक की परंपरागत धारणाओं को असत्य बताते हुए मार्क्सवादी उपन्यासकारों ने इनके अस्तित्व को ही नकार दिया है। आत्मा, मोक्ष आदि विषयों पर सोचना उनकी दृष्टि में व्यर्थ है। जन्म-मृत्यु, सुख-दु:ख, जगत-माया के संबंध में नये विचार प्रकट हुए हैं। पाप-पुण्य की परम्परागत धारणाओं को तर्क की दृष्टि से परखा गया है।”2 परिस्थितियों के अनुसार धार्मिक धारणाओं के परिवर्तन में विश्वास रखते हुए इन उपन्यासों में धर्म संबंधी नवीन चेतना को प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार धर्म के आडम्बरों का जमकर विरोध हिन्दी उपन्यासों में हुआ है। जिसके परिणामस्वरूप धर्म के प्रति जनता का विश्वास कम होने लगा है। प्रेमचंद एवं प्रेमचंदोत्तर युग के उपन्यासों में धार्मिक चेतना का बदलता स्वरूप दिखाई देता है। धर्म के नाम पर रूढ़ियों, आडम्बरों, अंधविश्वासों तथा अधर्म का जो विकास हुआ था, उसका बीसवीं शताब्दी में धीरे-धीरे ह्रास होने लगा।” नवयुग की चेतना की सबसे महत्वपूर्ण बात धार्मिक दृष्टिकोण में परिवर्तन है। इस युग में मध्यकालीन धार्मिक भावना का बड़ा परिमार्जित रूप मिलता है। अन्य धर्मों की सहिष्णुता इस युग की धार्मिक परिस्थितियों की विशेषता है।”3 महात्मा गांधी, रविन्द्रनाथ टैगोर तथा मोहम्मद इकबाल आदि महापुरुषों ने धर्म विशेष से ऊपर उठकर व्यक्ति का सम्बन्ध समस्त विश्व से जोड़ने का प्रयास किया।
प्रेमचंदोत्तर हिन्दी उपन्यासों में धार्मिक चेतना धीरे-धीरे शिथिल होती जा रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, औद्योगिकरण और शिक्षा के प्रसार ने आधुनिकता को जन्म दिया है। आज धर्म, ईश्वर, पाप-पुण्य आदि में विश्वास नहीं दिखायी देता है।” आज जबकि चिंतन में व्याप्त वैज्ञानिकता के कारण धर्म का रूप बदल रहा है, ईश्वर एक भ्रम सिद्ध होता जा रहा है, भौतिकवादियों ने उसे समाज के लिए अफीम सिद्ध कर दिया है तब धर्म के नाम पर अब तक बने मूल्य जर्जर हो गये हैं।”4 नि:संदेह यह सत्य है कि धर्म की चेतना निर्बल होती जा रही है। ‘कुल्लीभाट’ उपन्यास का पात्र कुल्ली जब मुसलमान स्त्री को अपनी पत्नी बनाता है तब समाज उसका विरोध करता है। लेकिन कुल्ली निर्भीकता से कहता है– “अब आप शुद्ध की हुई मुसलमानिन को नहीं ग्रहण कर सकते तब आप गुरु नहीं ढोंगी हैं। हिंदुओं ने बराबर समाज को धोखा दिया है लेकिन यह कबीर की बहिन है। इसे कोई धोखा नहीं दे सकता। इसमें श्रद्धा न होती तो मेरे पास न आती।”5 कुल्ली के माध्यम से लेखक ने धार्मिक रूढ़ियों के प्रति आक्रोश व्यक्त किया है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है और कोई भी वस्तु परिवर्तन से परे नहीं है। समय के साथ-साथ जाति व्यवस्था में भी अनेक परिवर्तन हुए हैं। इसका वर्तमान स्वरूप पुरातन से भिन्न है। ब्रिटिश काल के प्रारम्भ से ही जाति व्यवस्था के स्वरूप में बदलाव आना शुरू हो गया था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा महात्मा गांधी आदि ने अनुसूचित जातियों एवं पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर प्रयास किये। इस युग में जाति तथा पेशे का सम्बन्ध टूटा। जाति अंतर-वैवाहिकी के नियमों को भी तोड़ने का प्रयास हुआ, जिससे अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन मिला। तत्कालीन उपन्यासकारों ने जाति व्यवस्था का विरोध किया। परिणामस्वरूप उपन्यासों के पात्र अन्तर्जातीय विवाह एवं प्रेमविवाह आदि का समर्थन करते हुए, जाति व्यवस्था को तोड़ने के लिए संघर्षरत दिखाई दिये।
अँग्रेजी शासन काल में ऐसी प्रक्रियाएँ अस्तित्व में आयीं, जिनके कारण जाति व्यवस्था की जड़ें हिल गयीं। जाति व्यवस्था को लोकतन्त्र का विरोधी मानकर इसे समाप्त करने के लिए कानूनी प्रयास किये गये। संविधान में जातीय भेदभाव को समाप्त कर दिया गया है। धार्मिक क्रियाओं एवं पूजा-पाठ का महत्व घटने के कारण भी ब्राह्मणों की परम्परागत प्रभुता को ठेस पहुँची है। परम्परागत जाति व्यवस्था में प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था, जिसे बदला नहीं जा सकता था। किन्तु अब व्यक्ति अपनी क्षमता एवं योग्यता के अनुसार व्यवसाय चुनने लगा है। “आज हमें शर्मा शू सेन्टर, अग्रवाल पान भंडार, वर्मा टेलरिंग हाउस देखने को मिलेंगे। इसके अतिरिक्त वर्तमान में कई नये व्यवसाय जैसे– डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, वकालत एवं सरकार के विभिन्न विभागों में सेवा-कार्य आदि खुले हैं, जिसमें सभी जातियों के व्यक्ति साथ-साथ कार्य करते हैं। इस प्रकार आज एक जाति अनेक व्यवसायों में तथा एक व्यवसाय में अनेक जातियाँ लगी हुई हैं।”6
‘जल टूटता हुआ’ उपन्यास में लेखक ने जाति का विरोध करते हुए एक नवीन चेतना जागृत करने का प्रयत्न पात्र कुंजू के द्वारा किया है। कुंजू ब्राह्मण होते हुए भी कहार जाति की लड़की बदमी से प्यार करता है और उसके होने वाले बच्चे का पिता बनता है। गाँव के रूढ़िवादी लोग उस पर व्यंग्य करते हैं तब कुंजू कहता है– मैं कहार बन जाऊँ या चमार बन जाऊँ या धरिकार बन जाऊँ या डोम बन जाऊँ, इससे आप लोगों का क्या बनता-बिगड़ता है? ये चमार बहुत अच्छे हैं, मैं इनमें मिलकर रह सकता हूँ लेकिन तुम्हारे बाभनों के गाँव में नहीं।”7
परम्परगत जाति व्यवस्था में खान-पान संबंधी अनेक निषेध थे। ब्राह्मण एवं अन्य उच्च जातियाँ, निम्न या छोटी जातियों के घर भोजन ग्रहण नहीं करती थीं। शाकाहारी, माँसाहारी, कच्चे एवं पक्के भोजन के विषय में पहले पवित्रता तथा अपवित्रता की धारणा प्रचलित थी किन्तु जातीय चेतना के बदलते स्वरूप के कारण अब कुछ ब्राह्मण भी माँसाहारी भोजन करने लगे हैं। पूर्व में यह मान्यता थी कि कच्चा भोजन ब्राह्मण छोटी जातियों के घर नहीं करता था लेकिन अब यह भेद समाप्त हुआ है। परिवर्तन की धारा आगे बढ़ी है। अब होटल, रेस्टोरेन्ट एवं क्लब में सभी जातियों के व्यक्ति साथ-साथ खाने-पीने लगे हैं। धातु एवं मिट्टी के बर्तनों को लेकर पवित्रता तथा अपवित्रता की जो धारणा थी, वह भी समाप्त हुई है। आज का सुशिक्षित व्यक्ति भोजन एवं बर्तन के भेद को अस्वीकार करता है। वह मानवता व स्वच्छता के आधार पर सभी जातियों को गले लगाते हुए आगे बढ़ रहा है। जातीय चेतना के परिवर्तन की आँधी अब रुकने वाली नहीं है। जातीय महापरिवर्तन का सूत्रपात हुआ है, जिससे उच्च जातियाँ, निम्न जातियों के यहाँ भोजन एवं पानी ग्रहण करने लगी हैं।
‘कुल्लीभाट’ के पात्र प्रगतिशील विचारों के हैं। जाति-पाँति का विरोध वे सदैव करते हैं। अछूतों द्वारा सम्मान के साथ फूल मिलने पर वे कहते हैं–”मारे डर के वे हाथ पर नहीं दे रहे थे कि कहीं छू जाने पर मुझे नहाना होगा। इतने नत। इतना अधम बनाया है मेरे समाज ने उन्हें। आप लोग अपना दोना मेरे हाथ में दीजिए और मुझे उसी तरह भेंटिये, जैसे मेरे भाई भेंटते हैं।”8 उपन्यास में जातीय चेतना के बदलते रूप का सशक्त चित्रांकन किया गया है।
जाति व्यवस्था में जन्म का अधिक महत्व था। आज योग्य, कुशल एवं साहसी व्यक्ति को श्रेष्ठ माना जाता है चाहे वह निम्न जाति का ही क्यों न हो। प्रेमचंदयुग तथा प्रेमचंद परवर्ती युग के उपन्यासों में जातीय चेतना में हुए परिवर्तन ने जाति के रूढ़िग्रस्त बंधन पर कुठाराघात किया है। परम्परागत जाति व्यवस्था में शूद्र तथा अस्पृश्य जातियों को अनेक राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक आदि अधिकारों से वंचित किया गया था। लेकिन अब जातीय चेतना के नवीन समीकरण उत्पन्न हुए हैं। सत्ता ऊँची जातियों के हाथ से निकलकर निम्न एवं बहुसंख्यक जातियों के हाथ में आयी है। यह बात पंचायतों के चुनावो से स्पष्ट है। वर्तमान भारतीय परिवेश में जातीय चेतना में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है। इसका चित्रण समकालीन उपन्यासों में किया गया है।
संदर्भ ग्रंथ सूची-
1- हिन्दी उपन्यासों में मार्क्सवादी चेतना– डॉ. वीरेंद्र कुमार, पृष्ठ– 232
2- यथोपरि, पृष्ठ– 233
3- हिन्दी साहित्य की प्रवृतियाँ– डॉ. जयकिसन प्रसाद खंडेलवाल, पृष्ठ- 292
4- हिन्दी उपन्यास और जीवन मूल्य– डॉ. मोहिनी शर्मा, पृष्ठ– 29
5- कुल्ली भाट– सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, पृष्ठ– 112
6- भारतीय समाज एवं सामाजिक संस्थाएँ– एम. एल. गुप्ता एवं डी. डी. शर्मा, पृष्ठ– 117
7- जल टूटता हुआ– रामदरश मिश्र, पृष्ठ– 533
8- कुल्ली भाट– सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, पृष्ठ- 107
– डॉ. मोहनसिंह यादव




