“यदि किसी राष्ट्र को नष्ट करना हो, तो उसके जंगल काट दीजिए। वह कुछ वर्षों तक विकास का उत्सव मनाएगा, फिर आने वाली पीढ़ियाँ उसके विनाश का शोक मनाएँगी।”
भारत आज एक विचित्र विरोधाभास के बीच खड़ा है। एक ओर हर नई परियोजना के साथ विकास का उत्सव मनाया जा रहा है—नई एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, खनन परियोजनाएँ, स्मार्ट सिटी, बंदरगाह, हवाई अड्डे और विशाल आवासीय टाउनशिप। दूसरी ओर, उसी भारत को वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक 2026 में 177 देशों में 176वाँ स्थान मिलता है। वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (ईपीआई) 2026 में भारत का 177 देशों में 176वाँ स्थान केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि हमारी पर्यावरणीय नीतियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा तैयार यह सूचकांक वायु गुणवत्ता, जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण और जलवायु प्रयासों के आधार पर देशों का आकलन करता है।
भारत की खराब रैंकिंग के लिए वायु प्रदूषण, कोयले पर निर्भर ऊर्जा व्यवस्था और कमजोर जैव विविधता संरक्षण को प्रमुख कारण बताया गया है। यद्यपि भारत सरकार इस सूचकांक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और विकसित देशों के ऐतिहासिक कार्बन दायित्वों की अनदेखी का तर्क देती है, फिर भी मूल प्रश्न बना हुआ है कि क्या सूचकांक पक्षपाती है, या हम अपने पर्यावरणीय संकट को स्वीकार करने से बच रहे हैं?
यह संयोग नहीं हो सकता। यह केवल किसी विदेशी संस्थान का निर्णय भी नहीं हो सकता। यह उस विकास-दृष्टि पर प्रश्नचिह्न है, जिसमें पेड़ सबसे पहले काटे जाते हैं और पर्यावरण सबसे अंत में याद आता है।
आज भारत में विकास का सबसे आसान सूत्र मानो यही बन गया है—”जहाँ जंगल हैं, वहीं परियोजना बनेगी।” सड़क चाहिए तो जंगल काटो। खदान चाहिए तो जंगल काटो। उद्योग चाहिए तो जंगल काटो। शहर बढ़ाना है तो जंगल काटो। रेलवे लाइन बिछानी है तो जंगल काटो। ऐसा लगता है कि विकास की प्रत्येक फ़ाइल की पहली शर्त ही वृक्षों की बलि है।
विडंबना यह है कि हम पेड़ों को विकास की बाधा मान बैठे हैं, जबकि पर्यावरण विकास की पहली शर्त है, उसकी बाधा नहीं। कोई भी अर्थव्यवस्था स्वच्छ जल, उपजाऊ मिट्टी, स्थिर जलवायु और स्वस्थ मानव संसाधन के बिना टिक नहीं सकती। जंगल केवल लकड़ी का भंडार नहीं हैं; वे वर्षा के निर्माता हैं, नदियों के संरक्षक हैं, भूजल के पुनर्भरणकर्ता हैं, तापमान के नियंत्रक हैं और करोड़ों जीवों के जीवन का आधार हैं। जंगलों को काटकर बनाई गई सड़कें कुछ वर्षों तक प्रगति का प्रतीक लग सकती हैं, लेकिन वही सड़कें बाद में बाढ़, भूस्खलन, जल संकट और भीषण गर्मी के बीच विकास की विडंबना बन जाती हैं।
पिछले एक दशक में भारत में अनेक ऐसी परियोजनाएँ सामने आईं, जहाँ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बजाय पर्यावरण को पीछे धकेल दिया गया। हिमालयी राज्यों में चारधाम सड़क परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई हुई। चौड़ी सड़कों के साथ पर्वतीय ढलानों का असंतुलित कटाव हुआ और इसके बाद उत्तराखंड में भूस्खलनों तथा भू-धंसाव की घटनाएँ बढ़ती गईं। जोशीमठ की त्रासदी ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या हिमालय को उसकी भौगोलिक क्षमता से अधिक बोझ उठाने के लिए विवश किया जा रहा है?
अरावली पर्वतमाला, जिसे उत्तर भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच कहा जाता है, अवैध खनन, रियल एस्टेट और शहरी विस्तार के दबाव में लगातार सिकुड़ रही है। परिणामस्वरूप दिल्ली-एनसीआर में धूल, तापमान और वायु प्रदूषण की समस्या और गंभीर हुई है।
भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस अब केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई है। यह देश के जंगलों, नदियों, पहाड़ों और जैव विविधता के भविष्य का प्रश्न बन चुकी है। विडंबना यह है कि जिस पर्यावरण को किसी भी राष्ट्र के सतत विकास की पहली शर्त होना चाहिए था, वही आज विकास परियोजनाओं की सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है। सड़क, रेल, बंदरगाह, खनन, औद्योगिक कॉरिडोर और शहरी विस्तार जैसी लगभग हर बड़ी परियोजना की शुरुआत अक्सर जंगलों की कटाई से होती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो विकास का पहला नियम ही यह बन गया हो—”पहले जंगल हटाओ, फिर विकास लाओ।”
पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक हिस्से इस विकास मॉडल की कीमत चुका रहे हैं। छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य, जिसे मध्य भारत के सबसे समृद्ध और घने वनों में गिना जाता है, कोयला खनन और ताप विद्युत परियोजनाओं के कारण लगातार दबाव में है। यह केवल पेड़ों का प्रश्न नहीं है; यह हाथियों के प्राकृतिक गलियारों, आदिवासी समुदायों की आजीविका और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व का प्रश्न है। इसी प्रकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित मेगा पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, हवाई अड्डे और शहरी विकास परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र, अर्थात लगभग 9.6 लाख पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई है। यह क्षेत्र विश्व के सबसे संवेदनशील जैव-विविधता क्षेत्रों में से एक माना जाता है।
उत्तराखंड के शिवालिक और हिमालयी क्षेत्र भी विकास के दबाव से अछूते नहीं रहे हैं। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, राजमार्गों के चौड़ीकरण और अन्य अवसंरचना परियोजनाओं के लिए हजारों पेड़ों की कटाई हुई है। हाल के वर्षों में केवल एक परियोजना में ही 4,300 से अधिक पेड़ों को काटने की अनुमति ने व्यापक बहस को जन्म दिया। हिमालय जैसे अत्यंत संवेदनशील भूभाग में इस प्रकार का हस्तक्षेप केवल वृक्षों की संख्या का प्रश्न नहीं है; इसका सीधा संबंध भूस्खलन, भू-धंसाव, जल स्रोतों के क्षरण और जलवायु अस्थिरता से है।
मुंबई की आरे कॉलोनी इसका एक और प्रतीकात्मक उदाहरण है। मेट्रो कार शेड परियोजना के लिए सैकड़ों पेड़ों की कटाई ने पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास के बीच संतुलन पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी थी। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में सड़क निर्माण, नहरों, कोयला तथा हीरा खनन परियोजनाओं के लिए पिछले पाँच वर्षों में 60,000 एकड़ से अधिक वन भूमि प्रभावित हुई है। पूर्वोत्तर भारत—विशेषकर असम, मिजोरम और नागालैंड—में सीमा सड़क परियोजनाओं, राजमार्गों और कृषि विस्तार के कारण वनों पर अभूतपूर्व दबाव बढ़ा है। इन क्षेत्रों की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को देखते हुए यह चिंता और भी गंभीर हो जाती है।
इन परियोजनाओं को वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अंतर्गत केंद्र सरकार की स्वीकृति प्राप्त होती है और परिवेश पोर्टल के माध्यम से पर्यावरणीय एवं वन संबंधी मंजूरी दी जाती है। सरकार का तर्क है कि देश के आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के लिए ऐसी परियोजनाएँ आवश्यक हैं। किंतु पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि विकास की यह गति यदि प्राकृतिक संसाधनों की वहन क्षमता की उपेक्षा करती रही, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।
इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं संसद में प्रस्तुत आधिकारिक आँकड़े। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार 2014 से 2024 के बीच देशभर में लगभग 1.73 लाख हेक्टेयर वन भूमि को खनन, औद्योगिक परियोजनाओं, सड़क, रेल तथा अन्य गैर-वानिकी उपयोगों के लिए स्वीकृति दी गई। यह क्षेत्रफल दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु—तीनों महानगरों के संयुक्त क्षेत्रफल के बराबर है। यह केवल भूमि का हस्तांतरण नहीं है; यह भारत के प्राकृतिक भविष्य का क्रमिक संकुचन है।
देश के अनेक शहरों में भी यही तस्वीर दिखाई देती है। मेट्रो, फ्लाईओवर, सड़क चौड़ीकरण और रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए हजारों पुराने पेड़ काट दिए जाते हैं। बाद में औपचारिकता निभाने के लिए कहीं दूर छोटे पौधे लगा दिए जाते हैं और उसे “क्षतिपूरक वृक्षारोपण” का नाम दे दिया जाता है। लेकिन एक सौ वर्ष पुराने बरगद या पीपल की पारिस्थितिक भूमिका कोई पाँच फुट का पौधा अगले कई दशकों तक नहीं निभा सकता।
भारत में पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने वृक्ष और पौधे को एक ही चीज़ मान लिया है। सरकारें लाखों पौधे लगाने के आँकड़े प्रस्तुत करती हैं, लेकिन यह नहीं बतातीं कि उनमें से कितने अगले पाँच वर्षों तक जीवित रहते हैं।
एक परिपक्व वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं देता; वह तापमान नियंत्रित करता है, भूजल बढ़ाता है, पक्षियों और जीवों का आवास बनता है, कार्बन अवशोषित करता है और पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को जीवित रखता है। उसकी तुलना किसी नए पौधे से करना वैज्ञानिक और नैतिक—दोनों दृष्टियों से अनुचित है।
दुनिया के विकसित देशों ने भी अब यह स्वीकार कर लिया है कि आर्थिक वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं हैं। हरित ऊर्जा, शहरी वन, जल संरक्षण, जैव विविधता और टिकाऊ अवसंरचना भविष्य की अर्थव्यवस्था की आधारशिला बन चुके हैं।
सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि भारत किसी सूचकांक में 176वें स्थान पर है। सबसे बड़ा संकट तब होगा जब हम इस रैंकिंग पर बहस तो करेंगे, लेकिन उन कारणों पर नहीं जो इस स्थिति तक हमें लेकर आए। पर्यावरण में 176वाँ स्थान केवल एक रैंकिंग नहीं है; यह भारत के भविष्य के नाम लिखा गया एक चेतावनी-पत्र है। किसी अंतरराष्ट्रीय सूचकांक में नीचे आ जाना अपने आप में सबसे बड़ा संकट नहीं होता। वास्तविक संकट तब होता है, जब कोई राष्ट्र उन संकेतों को भी नकारने लगे जो उसके भविष्य की ओर इशारा कर रहे हों। आँकड़े गलत हो सकते हैं, पद्धतियाँ विवादास्पद हो सकती हैं और रैंकिंग पर बहस हो सकती है, लेकिन हवा की विषाक्तता, नदियों का दम घुटना, सिकुड़ते जंगल, घटती जैव विविधता और लगातार बढ़ता तापमान किसी सूचकांक की कल्पना नहीं, बल्कि धरातल की वास्तविकता हैं। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि भारत 176वें स्थान पर क्यों है। प्रश्न यह भी है कि क्या हम 176वें स्थान की चेतावनी को भी सुनने के लिए तैयार हैं?
“और काटो पेड़”—यह केवल एक व्यंग्यात्मक वाक्य नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे खतरनाक विकास-दृष्टि का घोषवाक्य बनता जा रहा है। हम जितनी तेजी से जंगलों को विकास की बाधा मानकर हटाते जा रहे हैं, उतनी ही तेजी से अपने भविष्य की नींव कमजोर कर रहे हैं। विडंबना यह है कि हम एक्सप्रेसवे की लंबाई तो माप रहे हैं, लेकिन सिकुड़ते जंगलों की गहराई नहीं; हम जीडीपी की वृद्धि का उत्सव मना रहे हैं, लेकिन घटती जैव विविधता, विषैली हवा और मरती नदियों का शोक मनाने का समय हमारे पास नहीं है।
सच यह है कि जंगल विकास के विरोधी नहीं, विकास की पहली शर्त हैं। पेड़ काटकर अर्थव्यवस्था कुछ वर्षों तक दौड़ सकती है, लेकिन समाज बहुत दूर तक नहीं चल सकता। प्रकृति कभी प्रतिशोध नहीं लेती, वह केवल संतुलन वापस स्थापित करती है—और उसकी कीमत मनुष्य बाढ़, सूखा, हीटवेव, जल संकट, प्रदूषण और असमय मृत्यु के रूप में चुकाता है।
इसलिए प्रश्न 176वें स्थान का नहीं, 176 करोड़ साँसों के भविष्य का है। इतिहास कल यह नहीं पूछेगा कि भारत की जीडीपी कितनी थी; वह यह पूछेगा कि जब जंगल कट रहे थे, नदियाँ मर रही थीं और धरती तप रही थी, तब हमने विकास का अर्थ बदला या केवल पेड़ों की गिनती कम की?
यदि आज भी हमारा उत्तर “और काटो पेड़” है, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद हमें सबसे विकसित नहीं, सबसे दूरदृष्टिहीन पीढ़ी के रूप में याद करेंगी, जिसने अपने बच्चों के लिए संपत्ति तो छोड़ी, पर साँस लेने लायक पृथ्वी नहीं।







