भारतीय संस्कृति में कुछ लोग केवल जन्म नहीं लेते, वे एक परंपरा का पुनर्जन्म बनकर आते हैं। वे किसी महाकाव्य को लिखते नहीं, उसे अपनी साँसों में बसाकर अगली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं। जब वे इस संसार से विदा होते हैं, तो ऐसा नहीं लगता कि केवल एक कलाकार चला गया है; ऐसा लगता है कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का एक जीवंत अध्याय स्वयं इतिहास में विलीन हो गया है।
तीजन बाई ऐसी ही विरल लोकसाधिका थीं। उन्हें केवल पांडवानी की महान गायिका कहना उनके व्यक्तित्व का अधूरा परिचय होगा। वे सचमुच महाभारत की बेटी थीं। उन्होंने महाभारत को शास्त्र की ऊँची अलमारियों से उतारकर गाँव की चौपालों, खेतों की मेड़ों, जनजातीय अंचलों और अंततः विश्व के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों तक पहुँचा दिया। उनके लिए महाभारत कोई प्राचीन ग्रंथ नहीं था; वह मनुष्य के साहस, करुणा, धर्म, अन्याय और आत्मसंघर्ष का जीवंत अनुभव था।
जब वे हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर उतरती थीं, तो लगता था मानो स्वयं व्यास की वाणी लोक की भाषा में बोल उठी हो। उनके स्वर में भीम का पराक्रम था, द्रौपदी का आर्तनाद था, अर्जुन का द्वंद्व था, कृष्ण की प्रज्ञा थी और विदुर का विवेक था। वे पात्रों का अभिनय नहीं करती थीं, उन्हें अपने भीतर जीती थीं। इसलिए उनकी पांडवानी केवल एक लोकगायन शैली नहीं, भारतीय सभ्यता की धड़कनों का सजीव स्वर बन जाती थी। आज उनके निधन के साथ एक कलाकार का नहीं, उस लोकपरंपरा के सबसे प्रखर कंठ का अवसान हुआ है, जिसने सिद्ध किया कि इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, लोक की स्मृति और कलाकार की आत्मा में भी अमर रहता है।
लोककला की दुनिया में कुछ यात्राएँ केवल प्रतिभा की नहीं, बल्कि अदम्य साहस की भी होती हैं। तीजन बाई का जीवन ऐसी ही एक असाधारण गाथा है। 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के भिलाई के निकट गनियारी गाँव के एक अत्यंत साधारण परिवार में जन्मी तीजन बचपन से ही अपने नाना ब्रजलाल परधा के कंठ से महाभारत की कथाएँ सुनते-सुनते स्वयं उन कथाओं की जीवंत वाहक बन गईं। वे चोरी-छिपे पांडवानी का अभ्यास करती थीं, क्योंकि उस समय समाज में महिलाओं का इस लोककला का मंचीय गायन वर्जित माना जाता था।
उनकी असाधारण प्रतिभा को लोकगुरु उमेद सिंह देशमुख ने पहचाना और उन्हें अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया। मात्र 13 वर्ष की आयु में दुर्ग ज़िले के चंद्रखुरी गाँव में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया। उनकी ओजस्वी प्रस्तुति ने शीघ्र ही उन्हें लोकमंच की नई पहचान बना दिया। किंतु सफलता का यह मार्ग आसान नहीं था। बाल्यावस्था में उनका विवाह कर दिया गया, पर ससुराल ने उनके गाने का विरोध किया। सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक अस्वीकृति के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। पति से अलग होकर एक छोटी-सी झोंपड़ी में रहते हुए उन्होंने अपनी साधना जारी रखी।
उनकी विलक्षण कला ने प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर का ध्यान आकर्षित किया। उनके प्रयासों से तीजन बाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष प्रस्तुति का अवसर मिला। वही क्षण उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर पांडवानी की गूँज पहुँचाई और सिद्ध कर दिया कि सामाजिक बंधनों से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है साधना, साहस और अपनी कला के प्रति अटूट समर्पण। वह मंच पर आती थीं तो उनके हाथ में केवल एक तंबूरा होता था। वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुर्योधन का अहंकार और कभी द्रौपदी के खुले केश। उनके पास न भव्य मंच सज्जा होती थी, न आधुनिक प्रकाश व्यवस्था। फिर भी दर्शकों की आँखों के सामने पूरा कुरुक्षेत्र साकार हो उठता था। यही लोककला का चमत्कार था और यही तीजन बाई की साधना।
लोककलाएँ तभी अमर होती हैं, जब कोई साधक उन्हें केवल प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि स्वयं उनका पर्याय बन जाता है। तीजन बाई ऐसी ही विरल लोकसाधिका थीं। उन्होंने पांडवानी का गायन भर नहीं किया; उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक स्मृति को अपनी आवाज़ दे दी। उनके कंठ में महाभारत केवल एक ग्रंथ नहीं था, बल्कि मनुष्य की शाश्वत चेतना, उसके नैतिक द्वंद्व, उसके साहस, उसकी करुणा और उसके आत्मसंघर्ष का जीवंत इतिहास था। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुति सुनना किसी लोकगायिका का कार्यक्रम देखना नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के स्पंदन को अनुभव करना था।
मंच पर उनके हाथ में थामा हुआ साधारण-सा तंबूरा किसी वाद्य से अधिक एक प्रतीक बन जाता था। उसकी तारों में कभी भीम की अदम्य शक्ति गूँजती, कभी अर्जुन की दुविधा, कभी द्रौपदी की अस्मिता की पुकार और कभी कृष्ण की दूरदर्शी चेतना। वे पात्रों का अभिनय नहीं करती थीं; वे उन पात्रों के भीतर प्रविष्ट होकर उन्हें अपने स्वर में पुनर्जन्म देती थीं। उनके सामने मंच और श्रोता के बीच की दूरी मिट जाती थी और पूरा वातावरण कुरुक्षेत्र की नैतिक बेचैनी से भर उठता था।
उनकी गायकी की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि उसमें वीर रस की प्रखरता और करुण रस की गहनता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनकर प्रवाहित होती थी। एक ही क्षण में उनका स्वर अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की गर्जना बन जाता, तो अगले ही पल वही स्वर अपमान, वियोग और मानवीय वेदना की ऐसी सघन अनुभूति जगा देता कि श्रोताओं का हृदय भीतर तक भीग उठता। शायद इसी कारण तीजन बाई ने केवल महाभारत का गायन नहीं किया—उन्होंने उसे लोकजीवन की साँसों में बसाकर इतिहास को संस्कृति और संस्कृति को जनस्मृति का शाश्वत हिस्सा बना दिया।
लोकमंच से आरंभ हुई तीजन बाई की स्वर-यात्रा शीघ्र ही विश्व के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों तक पहुँच गई। उन्होंने फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन सहित अनेक देशों में पांडवानी का ऐसा प्रभावशाली प्रदर्शन किया कि छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के रूप में पहचानी जाने लगी। वर्ष 1988 में दूरदर्शन के चर्चित कार्यक्रम ‘भारत एक खोज’ में उनकी प्रस्तुति ने उन्हें घर-घर तक पहुँचाया और पांडवानी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
उनकी कला ने यह सिद्ध किया कि महान अभिनय के लिए साधनों की नहीं, साधना की आवश्यकता होती है। तीजन बाई का जीवन स्वयं किसी लोकमहाकाव्य से कम नहीं था। एक साधारण परिवार में जन्मी इस बालिका ने सामाजिक वर्जनाओं को चुनौती देकर उस कला को अपनाया जिसे लंबे समय तक पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। उन्हें विरोध सहना पड़ा, तिरस्कार झेलना पड़ा, सामाजिक बहिष्कार तक का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने अपने स्वर को मौन नहीं होने दिया।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने दुनिया के अनेक देशों में पांडवानी का प्रदर्शन किया। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने लोककला को हीन नहीं, गौरवपूर्ण बनाया। उन्होंने यह भ्रम तोड़ा कि महान कला केवल शास्त्रीय मंचों पर जन्म लेती है। उन्होंने सिद्ध किया कि मिट्टी की खुशबू भी विश्व संस्कृति की पहचान बन सकती है।
इस कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कलाकार केवल गाता नहीं, बल्कि अपने स्वर, हाव-भाव, संवाद और अभिनय के माध्यम से संपूर्ण महाभारत को सजीव कर देता है। हाथ में रखा तंबूरा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुर्योधन का राजदंड और कभी द्रौपदी की व्यथा का प्रतीक बन जाता है। सीमित साधनों के बावजूद दर्शकों के सामने पूरा कुरुक्षेत्र साकार हो उठता है।
उनकी साधना को देश और दुनिया ने समान आदर दिया। भारत सरकार ने उन्हें क्रमशः 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक कलाकार के लिए नहीं, बल्कि उस भारतीय लोकपरंपरा के लिए भी था, जिसे उन्होंने अपने कंठ से विश्व-पटल पर प्रतिष्ठित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें जापान के प्रतिष्ठित फुकुओका कला एवं संस्कृति पुरस्कार से भी अलंकृत किया गया, जो उनकी कला को मिली पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता थी। यह सम्मान उनके व्यक्तित्व का नहीं, उस अमर सांस्कृतिक विरासत का अभिनंदन था, जिसने एक साधारण ग्रामीण स्त्री के स्वर के माध्यम से महाभारत को विश्व की सांस्कृतिक चेतना तक पहुँचा दिया।
कहा जाता है कि महान कलाकार शब्दों से अधिक मौन बोलते हैं। तीजन बाई की कला भी वैसी ही थी। जहाँ शब्द समाप्त हो जाते थे, वहाँ उनकी आत्मा महाभारत सुनाने लगती थी। यही कारण है कि उनके श्रोता केवल कथा सुनकर नहीं लौटते थे, वे अपने भीतर एक नए नैतिक प्रश्न, नई संवेदना और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरे गर्व की अनुभूति लेकर लौटते थे। यही किसी लोकसाधक की सबसे बड़ी उपलब्धि और अमरता है।
तीजन बाई को केवल पांडवानी गायिका कहना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे सच्चे अर्थों में महाभारत की बेटी थीं। उन्होंने महाभारत को पढ़ा भर नहीं, उसे जिया; उसे गाया भर नहीं, उसे अपनी आत्मा में उतार लिया। जब वे मंच पर तंबूरा लेकर खड़ी होती थीं, तब लगता था कि वे कोई प्रस्तुति नहीं दे रहीं, बल्कि सदियों पुरानी स्मृतियों को पुनर्जीवित कर रही हैं। उनके कंठ से निकला प्रत्येक स्वर किसी पात्र का संवाद नहीं, उसके अंतर्मन की धड़कन बन जाता था।
कुछ कलाकार अपनी कला के कारण अमर नहीं होते; वे इसलिए अमर होते हैं क्योंकि उनके भीतर पूरी एक सभ्यता बोलती है। तीजन बाई ऐसी ही लोकसाधिका थीं। उन्होंने हमें यह विश्वास दिलाया कि भारत की सांस्कृतिक चेतना केवल ग्रंथों, विश्वविद्यालयों या राजदरबारों में नहीं बसती; उसका वास्तविक निवास गाँव की चौपालों, लोकगीतों, जनजातीय स्मृतियों और उन अनाम कंठों में है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी विरासत को जीवित रखते आए हैं।
तीजन बाई ने पांडवानी का गायन भर नहीं किया, उन्होंने भारतीय लोकपरंपरा के आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि महाभारत केवल पढ़े-लिखे समाज का बौद्धिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत के साधारण जन का जीवंत सांस्कृतिक अनुभव भी है। उनके कंठ ने शास्त्र को लोक का स्वर दिया और लोक को विश्व के सांस्कृतिक मंचों तक पहुँचा दिया। उनके माध्यम से महाभारत मंदिरों, पुस्तकालयों और शोधग्रंथों की सीमाएँ पार कर मिट्टी की गंध, खेतों की हवा और आम जन की संवेदनाओं का हिस्सा बन गया।
आज उनके निधन पर शोक केवल एक महान कलाकार के बिछुड़ने का नहीं है। यह उस पीढ़ी के विरल होते जाने का भी शोक है, जिसके लिए कला व्यवसाय नहीं, तपस्या थी; प्रसिद्धि लक्ष्य नहीं, साधना का स्वाभाविक परिणाम थी। ऐसे कलाकार समय से पुरस्कार नहीं माँगते, बल्कि समय स्वयं उन्हें अपनी स्मृति में सुरक्षित कर लेता है।
तकनीक के इस युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता शब्दों, चित्रों और आवाज़ों की अनगिनत प्रतिकृतियाँ बना सकती है, किंतु वह किसी कलाकार की साधना, उसकी लोकस्मृति और उसकी आत्मा का निर्माण नहीं कर सकती। तीजन बाई हमें याद दिलाती हैं कि संस्कृति तकनीक से नहीं, परंपरा से चलती है; और परंपरा केवल उन्हीं लोगों के कारण जीवित रहती है, जो अपने जीवन को उसके संरक्षण के लिए समर्पित कर देते हैं।
इसलिए तीजन बाई का जाना अंत नहीं, एक उत्तरदायित्व है। अब यह हमारी पीढ़ी पर है कि हम पांडवानी को केवल एक लोककला के रूप में न देखें, बल्कि उसे भारतीय आत्मा की धड़कन की तरह सहेजें। जब तक किसी चौपाल में महाभारत लोकस्वर में गाई जाती रहेगी, जब तक किसी बालक के हाथ में तंबूरा लेकर भीम की हुंकार और द्रौपदी की वेदना जीवित होती रहेगी, तब तक तीजन बाई भी जीवित रहेंगी। क्योंकि कुछ लोग इतिहास में दर्ज नहीं होते बल्कि वे स्वयं इतिहास की आवाज़ बन जाते हैं। तीजन बाई ऐसी ही एक अमर आवाज़ थीं, हैं और रहेंगी।







