मुकरी दिवस (4 जुलाई) पर विशिष्ट प्रस्तुति
मुकरी हिन्दी साहित्य की अनूठी और मनभावन काव्य विधा है। अमीर खुसरो ने जनसामान्य का मनोरंजन करने और लोकभाषा को समृद्ध करने के उद्देश्य से पहेलियों और मुकरियों की रचना की। आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चन्द्र और नागार्जुन ने कुछ मुकरियाॅं लिखकर इस विधा को आगे बढ़ाने का कार्य किया। समकालीन साहित्यकारों में त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने मुकरी का संवर्धन करने के लिए ‘आनन्द मंजरी’ नामक मुकरी संग्रह की रचना की। उन्होंने अन्य रचनाकारों को प्रेरित करते हुए ‘समकालीन मुकरियाॅं’ नामक मुकरी संकलन का सम्पादन किया। त्रिलोक सिंह ठकुरेला उन साहित्यकारों में से एक हैं, जो प्राचीन साहित्यिक विधाओं को समकालीन संदर्भों में ढ़ालने के पक्षधर हैं। आज अनेक रचनाकार इस विधा में सृजन कर रहे हैं। डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’ मुकरी को जनप्रिय बनाने के उद्देश्य से मुकरी विधा पर उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। उन्होंने ‘इक्कीसवीं सदी के मुकरीकार’ तथा ‘मुकरी सप्तशती’ का सम्पादन करके मुकरी को विस्तार देने का महती कार्य किया है। मुकरी को और अधिक लोकप्रिय और चर्चित करने के उद्देश्य से साहित्यकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला के सुझाव पर के.बी. हिन्दी सेवा न्यास, बिसौली (बदायूॅं) के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’ और अन्य साहित्यकारों द्वारा प्रति वर्ष 4 जुलाई को मुकरी दिवस मनाने का निश्चय किया गया है। प्रथम मुकरी दिवस (4 जुलाई 2026) के अवसर पर विशेष प्रस्तुति के रूप में यहाँ कुछ रचनाकारों की मुकरियाॅं दी जा रही हैं।
शोभा सदा बढ़ावन हारा।
आँखिन से छिन होत न न्यारा।
आठ पहर मेरो मनरंजन।
क्यों सखि साजन? ना सखि अंजन।
— अमीर खुसरो
भीतर भीतर सब रस चूसै ।
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै ।
जाहिर बातन में अति तेज ।
क्यों सखि साजन ? नहिं अँगरेज ।
— भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
बात की फुलझड़ियाॅं छोड़े।
बखत पड़े तो चट मुँह मोड़े।
छन में शेर, छन में गीदड़।
क्या सखि, साजन? ना सखि, लीडर।
— नागार्जुन
करता हरित, लुटा खुशहाली।
भरता मन की गागर खाली।
मेरे लिए बहुत मनभावन।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सावन।
— त्रिलोक सिंह ठकुरेला
कुछ तो इसको ईश बताते।
कुछ ईश्वर से कुछ कम पाते।
चमत्कार इस युग का ऐसा,
क्या सखि,साजन?ना सखि,पैसा।
— डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’
वीरों में वह वीर बड़ा है ।
अपना सीना तान खड़ा है ।
लगता है फिर भी मनमौजी ।
क्या सखि,साजन? ना सखि फौजी ।
— राजपाल सिंह गुलिया
गोल मोल पर लगता प्यारा ।
रंग रूप में सबसे न्यारा।
नेह सूत में उसे पिरोती।
क्या सखि, साजन?ना सखि मोती।
— कुसुम कोठारी ‘प्रज्ञा’
गहन निशा में हमें सुलाता।
नरम नरम अहसास कराता।
स्वप्न दिखाता सुन्दर कल का।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पलका।
— सुभाष सिंघई
घर में होता रौनक करता,
मेरे मन में खुशियाँ भरता।
स्वागत करता रहता हँसता,
हे सखि साजन? ना गुलदस्ता।
— मधु राजेन्द्र सिंघी
मेरे आगे पीछे बोले।
गाना गाए होले होले।
चैन न लेने दे यह पल भर।
ए सखि, साजन? ना सखि, मच्छर।
— लक्ष्मी नितिन डबराल







