असम की बोडो जनजाति को अन्य कई नामों से भी संबोधित किया जाता है। ऊपरी असम में इसे सोनोवाल व थेंगल कछारी कहा जाता है जबकि पश्चिमी असम में बोडो अथवा बोडो कछारी कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इन्हें दिमासा या बर्मन के नाम से भी संबोधित किया जाता है, लेकिन विशेष रूप से ध्यान देने की बात यह है कि बोडो, दिमासा, सोनोवाल और बर्मन एक ही वृहत प्रजाति समूह के सदस्य होते हुए भी किंचित भिन्न हैं। कोकराझार जिले में बोडो समुदाय की अधिकांश आबादी निवास करती है। कामरूप एवं दरांग जिलों में भी इनके निवास हैं। इस समुदाय के पारंपरिक नियमों के अनुसार परिवार की संपत्ति पर सभी पुरुष सदस्यों का संयुक्त उत्तराधिकार होता है। पिता की मृत्यु के बाद उसके सबसे बड़े पुत्र अथवा परिवार के अन्य वरिष्ठतम सदस्य संपत्ति के उत्तराधिकारी बनते हैं। उत्तराधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार के सभी दायित्वों का निर्वाह करेगा। दायित्वों का निर्वाह करने के लिए उन्हें पैतृक संपत्ति का अपेक्षाकृत अधिक हिस्सा दिया जाता है। गाँव के पुजारी को ‘ओजा’ अथवा ‘ओझा’ कहा जाता है जिसका चुनाव सर्वसम्मति से किया जाता है। ओजा सामाजिक–धार्मिक कार्यों में गाँव के लोगों का मार्गदर्शन करता है। बोडो गांवों में ग्राम परिषद होती है जिसका निर्णय मानना सभी के लिए बाध्यकारी होता है। ग्राम प्रधान को गाँव बूढ़ा कहा जाता है और उसके सहायक को ‘हलमाजी’ कहते हैं। वे दोनों गाँव के सभी सामाजिक कार्यों को संपन्न कराते हैं। इस समाज में गोत्र को ‘अरी’ कहा जाता है।
बोडो समाज कुल 23 अरी (गोत्र) में विभक्त है जिनके निम्नलिखित नाम हैं-
स्वर्गियारी, बसुमतारी, मोछारी, खंगखलारी, दोइमारी, नर्जरी, गयारी, महिलारी, अउरी, जोजोआरी, इसारी, कहारी, सिबियूगारी, सिबीजियारी, बियुग–बियुगारी, गउजलेरारी, फदनगारी, सफरंगारी, रामसारी, खेरकतारी,थालेतारी, बोडोगावरी।
बोडो समाज में अपने गोत्र से बाहर विवाह करने का विधान है, पर धीरे–धीरे यह परंपरा शिथिल हो रही है। इस समाज में एकविवाह प्रथा प्रचलित है। विधवा विवाह सामाजिक रूप से मान्य है। अविवाहित छोटा भाई अपने बड़े भाई की विधवा से शादी कर सकता है, लेकिन किसी भी स्थिति में बड़ा भाई छोटे भाई की विधवा से शादी नहीं कर सकता। वर और कन्या दोनों पक्षों के बीच बातचीत (हथचुनी) द्वारा अधिकांश विवाह तय होते हैं। सर्वप्रथम वर पक्ष के बुजुर्ग अथवा माता–पिता लड़की को देखने उसके घर जाते हैं। यदि उन्हें लड़की पसंद आ जाती है तो उपहार के रूप में चांदी की चूड़ियाँ, अंगूठी, मदिरा इत्यादि देते हैं। यदि उपहारों को स्वीकार कर लिया जाता है तो विवाह के लिए स्वीकृति समझी जाती है। शादी के पहले लड़का लड़की के घर जाता है, दोनों एक–दूसरे को देखते-समझते हैं। लड़की लड़के को रुमाल, तौलिया आदि भेंट करती है, साथ-साथ अपनी सहमति के संकेत भी देती है। यदि लड़की ऐसा नहीं करती है तो यह माना जाता है कि उसने लड़के को पसंद नहीं किया है। बोडो समाज में विवाह का एक अन्य रूप भी प्रचलित है जिसे ‘खर चनई विवाह’ कहते हैं। इस प्रकार के विवाह में लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ भाग जाती है। बाद में विवाह के कुछ संस्कार संपन्न किए जाते हैं और इस विवाह को सामाजिक मान्यता मिल जाती है। इस समाज में वधू–मूल्य की परंपरा विद्यमान है, पर सुशिक्षित परिवारों में वधू–मूल्य एक रस्म भर रह गया है। पारंपरिक बोडो समुदाय एवं हिन्दू धर्म को माननेवाले बोडो समुदाय की विवाह पद्धतियों में थोड़ा अंतर है। हिन्दू धर्मावलम्बी बोडो जनजाति में पुजारी द्वारा वैदिक संस्कार एवं हवन आदि कराए जाते हैं जबकि परंपरागत बोडो परिवारों में आदिवासी रीति–रिवाजों से विवाह होते हैं।
बोडो समाज में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। वे लोग सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति को ‘बाथो बरई’ अथवा ‘खोरिया बरई महाराजा’ के नाम से संबोधित करते हैं। यह शिव का ही एक नाम है। ‘मैनाव’ धन की देवी हैं जिन्हें ‘बुली बुरी’ भी कहा जाता है। इनके अतिरिक्त इस समाज में अन्य अनेक देवी–देवता हैं जिनकी पूजा की जाती है। कुछ देवी–देवताओं के नाम हैं– अगराउग, खोइला, खाजी, राजखंद्र, राजपुतुर, बुरा अली, असी मैनाव, साली मैनाव, बगराजा, बसुमती इत्यादि। इन असंख्य देवी–देवताओं में से कुछ हितकारी एवं कुछ अनिष्टकारी माने जाते हैं। इन्हें पशु–पक्षियों की बलि देकर तथा चावल से बनी मदिरा अर्पित कर प्रसन्न किया जाता है। बोडो समाज में अनेक पर्व–त्योहार मनाए जाते हैं। बैशाख महीने में ‘बैशागु’ मनाया जाता है। इसे बिशु अथवा बिहू के नाम से भी जानते हैं। दो अन्य बिहू भी मनाए जाते हैं जिसे दोमासी (भोगाली बिहू) और कात्रिगाचा (कंगाली बिहू) कहते हैं। चैत्र मास के अंतिम दिन नव वर्ष का उत्सव मनाया जाता है। यह इस समाज का वसंतोत्सव है। इस दिन गाय की पूजा की जाती है। इसके दूसरे दिन बच्चे अपने माता–पिता एवं अन्य सभी बुजुर्गों से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। बुजुर्ग अपने बच्चों को आरोग्य व सुख–समृद्धि का आशीर्वचन देते हैं। इस अवसर पर ‘बथोउ’ की पूजा–अर्चना की जाती है तथा उन्हें मुर्गे की बलि दी जाती है। चावल से बनी मदिरा अर्पित करना इस पूजा का अभिन्न अंग है। अगले सात दिनों तक यह उत्सव चलता है। सभी लोग नृत्य–गीत के द्वारा अपना हर्ष प्रकट करते हैं। सामूहिक स्तर पर प्रतिवर्ष खेरई पर्व मनाया जाता है। इस त्योहार में बथाव अथवा शिबराई और मैनाव की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि बथाव पंचभूतों (पृथ्वी, पवन, जल, अग्नि, आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन पाँच तत्वों से ही मानव शरीर निर्मित हुआ है। यह त्योहार कार्तिक माह में मनाया जाता है। त्योहार के समापन के समय सामुदायिक स्तर पर पितरों की पूजा की जाती है। बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत बागुरूंबा नृत्य इस त्योहार का प्रमुख आकर्षण है। बागुरुम्बा असम की बोडो जनजाति का प्रमुख लोक नृत्य है। पारंपरिक वस्त्र पहनकर महिलाएं बागुरुम्बा नृत्य करती हैं। यह नृत्य असम के उदालगुड़ी, कोकराझार, बक्सा, चिरांग, बोंगाईगांव, नलबारी, दरांग और शोणितपुर जिलों के बोडो बहुल क्षेत्रों में किया जाता है। इस नृत्य में प्रकृति की विभिन्न मुद्राओं को रेखांकित किया जाता है।
बोडो समाज की आर्थिकी कृषि पर निर्भर है। वे ‘अहू’ और ‘साली’ दोनों प्रकार के धान की खेती करते हैं। इनके पास बीजों को परिरक्षित करने तथा खेतों की सिंचाई करने की उन्नत पारंपरिक विधि विद्यमान है। नदियों से पानी लाकर खेतों की सिंचाई करने का इनका कौशल अनुकरणीय है। अधिक वर्षा होने पर जब खेतों में लगी फसलों को नुकसान होने की आशंका होती है तो वे जलधारा को दूसरी दिशा में मोड़ देने का कौशल भी जानते हैं। बोडो कछारी समुदाय में मृत्यु के उपरांत शवों को जलाने एवं दफनाने की दोनों परंपरा विद्यमान है, पर आजकल सामान्य रूप से शवों को जलाने की विधि अधिक प्रचलित है। कुछ सुदूर गांवों में शवों को खुले मैदान में फेंक दिया जाता है। खुले मैदान में शवों को फेंकने के पीछे यह धारणा है कि जंगली पशु–पक्षी इसे खाकर संतुष्ट होंगे तो मृतक द्वारा जीवनकाल में किए गए बुरे कर्म माफ़ हो जायेंगे। अंत्येष्टि में शामिल सभी लोग स्नान करने के बाद शांति जल का पान करते हैं। इसके बाद अल्प मात्रा में कड़वे स्वाद के सूखे पत्ते सोकोता चबाते हैं। इसके बाद मृतात्मा के सम्मान में मदिरा पान किया जाता है। मृत्यु के दसवें दिन संस्कार किया जाता है तथा बारहवें या तेरहवें दिन अंतिम श्राद्ध किया जाता है। पुनर्जन्म में इस समुदाय का अटूट विश्वास है और माना जाता है कि जीवन काल में किए गए कर्मों के अनुसार आत्मा नया शरीर धारण करती है।







