कथम् आगतो रे समयो विचित्रः।
खलो मन्यते बहु समाजे विशिष्टः।।
धनं यस्य पार्श्वे जनस्तत्कुलीन:।
भ्रष्टोऽपि नितरां ज्ञायते प्रवीण:।
आदर्शभूतः धिक् कर्मनिष्ठ:।।
कथम्………………।।
भ्राता स्वभ्रात्रे भवति प्रक्रुद्ध:।
पितरौ सपुत्रौ मार्गे भ्रमन्तौ।
हा रोदितीह नितरां मनुजता।।
कथम्…………..।
चाकचिक्यपाशे बद्धो मनुष्यः।
विस्मारितस्तेन परिचयस्स्वकीय:।
स्वार्थाय क्रियन्ते नियमा निकृष्टा:।।
कथम्………………..।
निजसंस्कृतौ नायं गर्वं हि कुरुते।
परसंस्कृतिं खलु बहुनाभिमनुते।
निन्दति सदा सत्यलग्नान् मनुष्य:।।
कथम्……………..।
देशस्य श्रेष्ठे पदे राजतेऽयम्।
सेवां विहाय किं कुरुतेऽयम्।
वाचा न किं किं ब्रूते मनुष्य:।।
कथम्……………।
धेनुं विहाय हा श्वानं बिभर्ति।
शाकं विहाय हा मांसं भुनक्ति।
सुरापानलीनो भ्रमति मनुष्य:।।
कथम्…………………।







