नासिक की ओर जाती गाड़ी जब गोदावरी के समानांतर कुछ क्षण ठहरती-सी प्रतीत होती है, तब भीतर कहीं कुछ स्थिर होने लगता है। खिड़की से दिखते श्यामल तट, दूर से झलकते मंदिर-शिखर और हवा में घुली अगरबत्ती की सी गंध यह केवल दृश्य नहीं बल्कि यह तो इतिहास और आस्था का एक-दूसरे में विलीन होने का क्रम है। जब पंचवटी पहुँचा, तब यह स्पष्ट होने लगा कि यह यात्रा किसी स्थान तक पहुँचने की नहीं बल्कि अपने भीतर थोड़ा और उतरने की यात्रा है। पंचवटी में प्रवेश करते ही समय की गति बदली सी नजर आने लगी। महसूस हुआ जैसे यहाँ घड़ियाँ चलती तो हैं, पर मन उनके अधीन नहीं रहता। यही वह क्षण होता है जब मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ अनुभूत होने लगती हैं-
सांसारिकता में मिलती है, यहाँ निराली निस्पृहता,
अत्रि और अनसूया की-सी होगी कहाँ पुण्य-गृहता!
मानो है यह भुवन भिन्न ही, कृत्रिमता का काम नहीं;
प्रकृति अधिष्ठात्री है इसकी, कहीं विकृति का नाम नहीं॥
इन पंक्तियों को मन में दुहराते हुए जब मैं गोदावरी के तट पर पहुँचा, तब लगा मानो कवि का भाव स्वयं भूमि पर उतर आया हो। कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहाँ पहुँचकर मन स्वयं से मौन माँगने लगता है। पंचवटी भी ठीक वैसी ही भूमि है जहाँ प्रकृति कृत्रिम नहीं, साधना-सिद्ध है; जहाँ वृक्ष केवल हरित नहीं, साक्षी हैं और जहाँ नदी केवल जलधारा नहीं, स्मृति का प्रवाह है। यह भूमि किसी तीर्थ-पर्यटन की नहीं बल्कि संस्कृति के भीतर उतरने की यात्रा है। लेकिन अफ़सोस भी उतना ही हुआ इन्हें देखते हुए कि इंसान किस नीचता पर उतर चुका है बल्कि उसने तो हदें ही पार कर दी हैं। जगह-जगह कूड़े के ढेर और गोदावरी के भीतर फैली गंदगी हदें पार करती हुई। आपके भीर इस स्थान की सारी आस्तिकता को धूमिल कर देती है लेकिन आप फिर आगे बढ़ जाते हैं अपनी आस्था औ एतिहासिकता को समेट कर मन के कोने में।
महाराष्ट्र का प्राचीन नगर नासिक गोदावरी के तट पर बसा हुआ, भारत के उन दुर्लभ नगरों में है जिनका उल्लेख वैदिक, पौराणिक और उत्तरकालीन साहित्य तीनों में मिलता है। पुष्कर और नैमिषारण्य की भाँति नासिक भी अत्यंत प्राचीन तीर्थ-परंपरा का केंद्र रहा है। गोदावरी यहाँ से दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है, इसीलिए उसे दक्षिण की गंगा कहा गया। नासिक में बारह वर्षों में लगने वाला कुंभ मेला, त्र्यंबकेश्वर का ज्योतिर्लिंग, असंख्य प्राचीन घाट और मंदिर इसे केवल नगर नहीं अपितु एक जीवंत धार्मिक भूगोल बनाते हैं। घाटों पर बैठे पंडे, तांबे के लोटे में जल भरते वृद्ध और दूर बैठी स्त्रियाँ सब अपने-अपने कर्म में लीन। मैंने एक वृद्ध ब्राह्मण से पूछा, “पंडित जी, यहाँ लोग रोज़ आते हैं या केवल पर्वों पर?” वे मुस्कराए, गोदावरी की ओर देखते हुए बोले- “बेटा, यहाँ आने वाला हर दिन पर्व होता है, फर्क बस इतना है कि कुछ लोग उसे पहचान लेते हैं, कुछ नहीं।”
“पंचवटी” नाम अपने आप में संकेत है। पाँच वटवृक्षों से आच्छादित वह वनभूमि, जहाँ श्रीराम-सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास का एक महत्वपूर्ण काल व्यतीत किया। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में पंचवटी का वर्णन केवल निवास-स्थल के रूप में नहीं बल्कि साधना और निर्णायक घटनाओं की भूमि के रूप में आता है। यह वही स्थान है जहाँ पर्णकुटी बनी, जहाँ राम योगी की भाँति जीवन जीते हैं और जहाँ आगे चलकर रामकथा की दिशा बदलने वाली घटनाएँ घटित होती हैं।
आज के पंचवटी में वे पाँच वटवृक्ष भौतिक रूप में भी खड़े हैं साथ ही खड़ा है उनका भावात्मक वानस्पतिक अस्तित्व, जो आज तलक वैसे ही विद्यमान है। रामायण की एक अत्यंत निर्णायक घटना शूर्पणखा की नासिकाच्छेदन भी इसी भूमि से जुड़ी है। राम और लक्ष्मण के समक्ष अनुचित विवाह-प्रस्ताव, माता सीता पर आक्रमण का प्रयास और लक्ष्मण द्वारा नासिकाच्छेदन ये केवल कथानक नहीं बल्कि आगे के समूचे रामायण-युद्ध की भूमिका हैं। संस्कृत के “नासिका” शब्द से नासिक नाम की व्युत्पत्ति को न केवल जनश्रुति बल्कि प्राचीन व्याकरणिक परंपराएँ भी स्वीकार करती हैं। यह कथा किसी एक ग्रंथ तक सीमित नहीं बल्कि बहु-साहित्यिक परंपरा में प्रसारित होती दिखाई देती है।
वहीं पंचवटी में गोदावरी के तट पर स्थित रामकुंड केवल स्नान-स्थल नहीं बल्कि पिंडदान और तर्पण की परंपरा का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि प्रभु श्रीराम यहाँ स्नान किया करते थे पास ही सीताकुंड और लक्ष्मणकुंड भी स्थित हैं, जो इस परिवारिक-सांस्कृतिक स्मृति को और गहरा करते हैं। नदी के मध्य बने छोटे-छोटे कुंड, घाटों की शृंखला और प्राचीन मंदिर यह सब मिलकर पंचवटी को केवल धार्मिक नहीं बल्कि सभ्यतागत स्थल भी बनाते हैं। इस संदर्भ में एक वाक्या यह भी याद रहा कि- रामकुंड पर बैठा एक युवक अपने पिता के लिए पिंडदान कर रहा था। उसका मौन, उसकी झुकी आँखें और पुजारी का धीमा स्वर। उस क्षण मैंने जाना कि परंपरा किताबों में नहीं, जीवन में जीवित रहती है।
सीता गुफा- संकीर्ण, शांत और गहन उस स्त्री-साहस की प्रतीक है, जिसे भारतीय परंपरा ने देवी कहा। यहीं से सीता-हरण की कथा जुड़ी मानी जाती है। भीतर प्रवेश करते ही श्वास अपने आप धीमी हो जाती है, जैसे स्थान स्वयं मौन का अभ्यास करवा रहा हो। पास ही पर्णकुटी का स्थल है, जहाँ राम-सीता-लक्ष्मण ने तपस्वी जीवन जिया। राजसी वैभव से दूर, प्रकृति के सान्निध्य में। पंचवटी का सुंदर-नारायण मंदिर भारतीय प्राचीन खगोल-ज्ञान का प्रमाण है जहाँ हर वर्ष 20–21 मार्च को सूर्यकिरणें गर्भगृह में स्थित नारायण के चरणों पर पड़ती हैं किन्तु अभी इसका पूरी तरह से नव-निर्माण कार्य जारी है। वहीं कालाराम मंदिर अपनी शिल्प-सौंदर्य और काले पत्थर की मूर्तियों के कारण पश्चिम भारत के श्रेष्ठ मंदिरों में गिना जाता है।
आधुनिक काल में कुछ विचारधाराएँ विशेषतः वामपंथी या अति-आधुनिक दृष्टिकोण राम और रामायण को केवल काल्पनिक मानने का आग्रह करती हैं। किंतु पंचवटी जैसे स्थल इस प्रश्न को केवल आस्था का नहीं, पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक बनाते हैं।
यहाँ की निरंतर तीर्थ-परंपरा, मध्यकालीन और प्राचीन ग्रंथों में निरंतर उल्लेख, स्थापत्य-साक्ष्य, नदी-घाटों की प्राचीन संरचनाएँ और जन-स्मृति ये सभी किसी एक समय में गढ़ी गई कल्पना नहीं हो सकतीं। रामायण को ऐतिहासिक महाकाव्य मानने या न मानने का विवाद आधुनिक हो सकता है किंतु पंचवटी जैसे स्थल यह सिद्ध करते हैं कि रामकथा भारतीय सभ्यता की जड़ों में रची-बसी जीवनकथा है, न कि केवल काव्य-कल्पना।
आज पंचवटी कोई संग्रहालय नहीं बल्कि जीवित स्थान है जहाँ साधु, यात्री, शोधार्थी और सामान्य जन समान रूप से आते हैं। यहाँ राम केवल पूज्य नहीं, अनुकरणीय जीवन-मूल्य हैं त्याग, मर्यादा और करुणा के प्रतीक। संध्या के समय जब गोदावरी की आरती आरंभ हुई, दीपों की पंक्ति जल पर उतरी और घंटियों की ध्वनि हवा में तिरने लगी, तब लगा कि मैं पंचवटी से लौट नहीं रहा बल्कि पंचवटी मुझे अपने साथ लौटा रही है और तभी मैथिलीशरण गुप्त की अंतिम पंक्तियाँ मन में स्वयं उतर आईं-
पंचवटी की छाया में है, सुंदर पर्ण-कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना।
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥






