डॉo अलका तिवारी द्वारा संपादित पुस्तक “रेत समाधि आलोचना के घेरे में” पुस्तक पढ़ रही हूँ और श्रम साध्य लेखों को गुन रही हूँ | गीतान्जली श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि’ हिंदी साहित्य में काफ़ी चर्चित है। इसमें ग्रामीण जीवन, सामाजिक मुद्दों और मानवीय भावनाओं को बहुत ही गहराई से पेश किया गया हैं। इस उपन्यास की आलोचना अक्सर इसके पात्रों की गहराई, सामाजिक संदर्भों और लिखने की शैली पर होती है। अलका तिवारी का मानना है कि रेत – समाधि जितना शिल्प में अनूठा है, इसका कथानक उससे भी अधिक अनूठा है, यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान की सरहदों तक ही सिमटा नहीं है, बल्कि वास्तव में वैश्विक स्तर पर प्रेम, विछोह, पीड़ा, निर्वासन, वापसी और जिजीविषा की बात करता है। इसकी नायिका जीवन के अंतिम समय में जिस तरह से ‘नई सी उठती है और फिर देह, मन और देश की सरहदें लाँघकर अन्ततः जादुई लोक में जिस तरह विलीन हो जाती है और देश, सरहदें, समाज सब यहीं रह जाते हैं, कथानक में ऐसी मानवीय विविधता दुर्लभ ही देखने को मिलती है। रेत-समाधि का कैनवास बहुत बड़ा है, गीतांजलि श्री की लेखनी ने उसे मानवता, प्रेम और प्रकृति की बहुत सी ध्वनियों और शब्दों से संवारा है|
अलका जी ने पुस्तक में बीस श्रम साध्य लेखों का संकलन किया है| इन लेखों को पढ़कर रेत समाधि की कई परतें उभरकर सामने आती हैं| पुस्तक का पहला अध्याय प्रसिद्ध रंगकर्मी अशोक वाजपेयी जी के साक्षात्कार से प्रारम्भ होता है| एक प्रश्न के उत्तर में वो कहते है कि “यों तो संसार में भी पर हिन्दी में उपन्यास के कई रूप रहे हैं। प्रेमचन्दीय रूप से अज्ञेय और जैनेन्द्र के रूप अलग, उनसे निर्मल वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, कृष्ण बलदेव वैद और कृष्णा सोबती के, रेणु के उपन्यासों के रूप अलग रहे हैं। ‘रेत समाधि’ को अपनी कहानी में कृष्णा सोबती के कथ्य में और रूप-विधान और कथा- भाषा में कृष्ण बलदेव वैद के विस्तार के रूप में पढ़ा जा सकता है। पर यह भी कि गीतांजलि ने अपना औपन्यासिक रूप चुना और विकसित किया है।”
मृणाल पाण्डेय जी ने Tomb of Sand (अंग्रेजी अनुवाद) पर लेख लिखा है, जिसका शीर्षक है: ‘The world according to Geetanjali Shree’। मृणाल जी लिखती हैं कि उपन्यास सामान्यीकरण को चुनौती देता है और “बहुस्वर”, “अनिश्चित”, “छिद्रपूर्ण” मानव-जीवन की भय-उन्मुक्त धारा का एहसास कराता है। वे इस बात पर जोर देती हैं कि उपन्यास में समय-रेखा की बाधा टूट जाती है, भूमिकाएँ (पात्रों की आवाज़ें, भाषा, संबंध) एक पूर्ण रूप से तय नहीं-रही दुनिया का हिस्सा बन जाती हैं। वे इसकी भाषा को “fluid and many-tongued” कहती हैं| कहानी को रैखिक नहीं मानती है| वस्तुतः रेत समाधि साहित्य को सीमाओं से मुक्त करती है| यह उपन्यास स्वयं के पुनर्पार्टिशन की कहानी” है — अर्थात् व्यक्ति के भीतर उम्र, लिंग और इतिहास की सीमाओं को तोड़ने की प्रक्रिया। मृणाल जी का मानना है कि उपन्यास की ‘माँ’ केवल पात्र नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना का प्रतीक है। मृणाल इसे “re-partitioning of the self” कहती हैं| यहाँ स्त्री अपने समाज, परिवार और इतिहास से संवाद करती हुई खुद को पुनः गढ़ती है। वस्तुतः यह उपन्यास पाठक को यह सिखाता है कि पहचान कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि निरंतर बहती हुई प्रक्रिया है। मृणाल इस उपन्यास को “भारत की सांस्कृतिक बहुलता का उत्सव” कहती है।
प्रियदर्शन का लेख ‘रेत समाधि को कैसे पढ़ा जाए’ में वे यह बताते हैं कि इस उपन्यास को केवल कहानी की तरह नहीं, बल्कि एक अनुभव, एक विचार-यात्रा, और एक भाषिक प्रयोग की तरह पढ़ा जाना चाहिए। यह उपन्यास पाठक को सोचने, ठहरने और भाषा के साथ जीने के लिए मजबूर करता है। प्रियदर्शन कहते हैं कि रेत समाधि को पढ़ते समय हमें कहानी से अधिक भाषा को सुनना और महसूस करना चाहिए। यह उपन्यास स्त्री के मन, उसकी स्मृति और उसकी आत्मा की यात्रा है। प्रियदर्शन बताते हैं कि यहाँ नायिका सिर्फ व्यक्ति नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना का प्रतीक बन जाती है| ‘रेत’ यहाँ प्रतीक है जो कभी स्थायी नहीं, जो हाथ से फिसल जाती है| प्रियदर्शन के अनुसार, यह प्रतीक बताता है कि सीमाएँ मनुष्य की रचना हैं, और इन्हें पार करना आत्मा की आज़ादी है। प्रियदर्शन कहते हैं कि इस उपन्यास को समझने के लिए हमें धीरे, संवेदनशीलता के साथ पढ़ना चाहिए।
प्रत्यक्षा का लेख “विभाजन की क्रूर त्रासदी का मैजिकल रियलिज़्म है रेत समाधि” है। प्रत्यक्षा बताती हैं कि यह उपन्यास सीधी ऐतिहासिक कथा के रूप में नहीं, बल्कि मैजिकल रियलिज़्म (जादुई यथार्थवाद) की शैली में लिखा गया है। कभी भाषा उड़ती हुई प्रतीत होती है, कभी पात्र असंभव-सी बातें करते हैं, फिर भी सब कुछ गहरे यथार्थ में जड़ा हुआ लगता है। इस शैली को मैजिकल रियलिज़्म कहा जाता है जहाँ जादू और यथार्थ एक साथ चलते हैं और दोनों मिलकर एक गहरी सच्चाई उजागर करते हैं। यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि विभाजन केवल इतिहास नहीं, बल्कि हर पीढ़ी के भीतर जीती हुई एक अनकही वेदना है।
दिनेश श्रीनेत ने “रेत समाधि के बहाने हिंदी समाज के कुछ पूर्वाग्रह” लेख में उपन्यास रेत समाधि और उसके आसपास हुई प्रतिक्रियाओं के ज़रिए हिंदी समाज के मानसिक ढाँचे, सीमाओं और पूर्वाग्रहों पर प्रकाश डाला है। वह पूछते हैं कि “आख़िर हिंदी समाज में किसी नई, प्रयोगशील या स्त्री दृष्टि वाली रचना को स्वीकार करना इतना कठिन क्यों है?” दिनेश श्रीनेत इस लेख में यह कहना चाहते हैं कि रेत समाधि पर हुई प्रतिक्रियाएँ केवल साहित्यिक नहीं थीं बल्कि उन्होंने हिंदी समाज के गहरे बैठे पूर्वाग्रहों को उजागर कर दिया है जैसे स्त्री लेखन को हल्के में लेना, जटिल भाषा या प्रयोग को “अस्पष्ट” कहकर नकार देना, अंग्रेज़ी में अनुवाद या विदेशी पुरस्कार मिलने पर ही मान्यता देना, “साधारण पाठक” के नाम पर प्रयोगधर्मिता का विरोध करना आदि। हिंदी समाज में अब भी विचारों, स्त्री स्वतंत्रता और प्रयोगात्मक कला के प्रति एक बंद मानसिकता मौजूद है। रेत समाधि इस मानसिकता को चुनौती देती है। दिनेश श्रीनेत मानते हैं कि रेत समाधि हमें भाषा, स्त्री और समाज — तीनों स्तरों पर सोचने के लिए मजबूर करती है।
पद्मा मिश्रा का लेख “रेत समाधि का स्त्री पक्ष” स्त्री विमर्श की दृष्टि से किया है। वह यह बताती हैं कि यह उपन्यास केवल विभाजन या भाषा का प्रयोग नहीं, बल्कि स्त्री की आत्मा की मुक्ति, उसकी स्मृति, पहचान और स्वतंत्रता की कहानी है। उपन्यास तीन पीढ़ियों की स्त्री चेतना को जोड़ता है — परंपरा, संक्रमण और आधुनिकता।
पद्मा मिश्रा लिखती हैं कि गीतांजलि श्री की स्त्री केवल परिवार या समाज की भूमिका में बँधी नहीं है। वह अपने भीतर की दुनिया में उतरती है, सवाल करती है और अपनी देह, मन और भाषा पर अधिकार जताती है। पद्मा के अनुसार गीतांजलि श्री की भाषा भी स्त्री-संवेदना से भरी हुई है। वह परंपरागत पुरुषवादी भाषा से हटकर एक नई, प्रवाही, कभी-कभी टूटी हुई, परंतु बेहद आत्मीय भाषा रचती हैं जो स्त्री के भीतर के मौन, उसकी छटपटाहट और उसकी उड़ान को व्यक्त करती है।
रवींद्र त्रिपाठी का लेख “रेत-समाधि : सरहद-गाथा और औरत-कथा” रेत-समाधि को न केवल विभाजन/सरहद की गाथा मानता है बल्कि एक औरत-कथा (स्त्री अनुभव और स्मृति-कथा) भी मानता है| रवीन्द्र बताते हैं कि उपन्यास का भौगोलिक सरहद पार करना केवल राजनीतिक/ऐतिहासिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और आत्मिक पारगमन भी है| अर्थात् सीमाएँ बाहरी भी हैं और आंतरिक भी। औरत-कथा की केन्द्रीयता में वह मानते है कि नायिका/नायिकाएँ (विशेषकर माँ और बेटी का संबंध) उपन्यास की धुरी हैं, उनकी स्मृतियाँ, इच्छाएँ और टूटन उपन्यास को स्त्री-केंद्रित बनाती हैं। लेख में उपन्यास को ‘कविता में लिपटी सरहद-गाथा’ कहा गया है। रवीन्द्र ने उपन्यास के अनेक आयाम (राजनैतिक, सामाजिक, आत्मिक) को एक साथ जोड़ा है, जिससे पाठक रेत-समाधि को सिर्फ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है बल्कि बहुस्तरीय उपन्यास मानने को विवश हो जाता है। यह लेख समकालीन हिंदी आलोचना में एक पुल का काम करता है| वह उपन्यास की कलात्मकता और उसके सामाजिक-निहितार्थ दोनों को एक साथ जोड़ता हैं।
विपिन चौधरी अपने लेख में रेत-समाधि को एक प्रेम-समाधि या स्त्री-जीवन-फंतासी के रूप में पढ़ती हैं। विपिन चौधरी उपन्यास के उस पहलू पर ध्यान देती हैं जहाँ सीमाओं/विभाजन के ऐतिहासिक परिदृश्य में व्यक्तिगत प्रेम-कथाएँ और अंतरंग स्मृतियाँ उभरकर आती हैं अर्थात् राजनीतिक के बीच निजी प्रेम का पुट। नायिकाएँ सिर्फ ऐतिहासिक पीड़ित नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक दुनिया में फँसे हुए प्रेम, आकांक्षा और कल्पना-क्षेत्र की रहनेवाली स्त्रियाँ हैं इसलिए कथा में फंतासी तत्व भी आ गया हैं।
जहाँ हर्षबाला रेत समाधि के माध्यम से गीतांजलि श्री को कोरिलेटिव सब्जेक्टिव यथार्थ के नेरेटिव की भाषा रचने वाली लेखिका मानती हैं वहीँ अलका प्रकाश मानती हैं कि इस विलक्षण उपन्यास को लिखने वाली गीतांजलि श्री इन अर्थों में भी बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने स्त्री लेखन के ऊपर लगने वाले ‘देह-गाथा’ के अरोपों की कालिमा को धुल दिया है। पूरे उपन्यास में कोई उत्तेजक या मादक रति-प्रसंग नहीं है। बँटवारे की आपाधापी में बलात्कार के वीभत्स ब्यौरे नहीं है। स्त्री को उसकी देह को लेकर हीनता की ग्रंथि से नहीं भरा गया है। देह यहाँ शर्मिंदगी का कारण नहीं है। सब कुछ प्रतीकात्मक भाषा में कहा गया है।
रश्मि मालवीय रेत समाधि को अनुत्तरित सवालों का सफ़रमानते हुए कहती हैं कि हम देखते हैं कि सरहद को ‘पार करने’ के प्रयास में माँ का अंत होता है। इसका लेखिका एक पूरा प्रभा-मंडल भी रचती है। पर यह अंत, अंततः उपन्यास में सरहद के होते हुए भी, उसको ‘न मानने’ के माँ के हठ और आह्वान की विसंगति को ही दर्शाता है। सरहद के सारे सवाल सवाल ही बने रह जाते हैं।
सपना सिंह अपने लेख में पाठक से कहती हैं कि अभी मैं रेत समाधि के किसी पाठक की शिकायत पढ़ रही थी, उनका कहना है लगभग २५ पेज पढ़ने के बाद भी कुछ समझ नहीं आया। आखिर लेखक कहना क्या चाहती, किसके बारे में कह रहीं। भाषा बेहद दुरुह और संप्रेषण में अक्षम है। हाँ, साहित्य को मात्र मनोरंजन के लिए पढ़ने वालों को गीतांजलि श्री का गद्य हतोत्साहित करने वाला है। उन्हें पढ़ने और समझने के लिए आपको खास तरह की परिष्कृत रुचि की दरकार है। एक बार उनके गद्य का रसास्वादन करने आ गया तो आप उनके भाषा और शैली के मैनरिज्म के आनंद से बाहर आना नहीं चाहेंगे।
उपन्यास के सन्दर्भ में जहाँ रीतादास राम का मानना है कि उपन्यास मनमोहक शैली में पूर्ण होता है। मन की बात बुनती कथा जिसमें रसिकता है, सरसता है, लय है, अदा है, कसक है, जुड़ाव है, गहराई है और कई महत्वपूर्ण के हस्ताक्षरों के साथ पाठकों को सोचने के लिए छोड़ दिया गया है। वहीँ जनार्दन अपने लेख में उद्धृत करते हैं कि उपन्यास कला (आर्ट ऑफ द नॉवेल-1986) में मिलन कुंडेरा ने कहा है “हर प्रश्न के जवाब देने की प्रवृत्ति से लोगों में मूर्खता का कौशल विकास होता है। उपन्यास की उपलब्धि तो यह है कि वह हर जवाब को फिर से प्रश्नांकित कर दे। ‘रेत समाधि में आज की टूटी-फूटी दुनिया में जो कुछ भी है उसे देखा गया और उन्हें सवालों से घेरा गया है। उपन्यास ने बड़ी खामोशी से नफरत, निराशा और मिथकीय पहचान को सवालों से रंग दिया है। यह रचना बहुत प्रभावी रूप से साबित करती है कि घोर अविश्वास के युग में, कुछ लोग अभी भी मुहब्बत करते हैं और सबसे बड़ी बात की उस हद से ज्यादा यकीन भी करते हैं। इसी प्रकार मीनाक्षी कर्ण कहती हैं कि अपार बंदिशों, वर्जनाओं, यातनाओं में भी एक स्त्री के भीतर का चुलबुलापन, कौतुहल, रोमांच, उसकी जिजीविषा समाप्त नहीं होती है। माँ, परिवार के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी बन जाती है। पति के जीवित रहने तक वह अनथक प्रत्येक कार्य करती है परन्तु पति के देहान्त के साथ जैसे स्वयं भी मर जाती है। वह अवसाद में चली जाती है, परिवार से पीठ कर लेती है। जैसे अब जीने की कोई उमंग नहीं।
आजाद सिंह, बिंदु ए० मेहता, मैनाज, अल्पेश और स्निग्धा के लेख में रेत समाधि के स्त्री पक्ष, भाषा और पठनीयता पर विचार किया गया है| इन बीस लेखों को पढ़कर कोई भी साधारण पाठक रेत समाधि उपन्यास के विविध पक्षों से अवगत हो सकता है जिसे सामान्यत: पाठक आलोचकीय दृष्टिकोण से वंचित रहता है| ब्लर्ब में सुधा अरोड़ा जी ने सत्य ही कहा है कि किताब के माध्यम से गीतांजलि श्री के बहुचर्चित उपन्यास के बारे में समग्रता से जानने का साहित्य प्रेमियों को अवसर मिलेगा और पुस्तक का स्वागत होगा|






