“आत्म जगत को सुख पहुँचाने का भावार्थ – ‘ सेवा अस्माकं धर्म: ..’ के सिद्धांत एवं व्यवहार को प्रतिपादित करता है तथा व्यक्ति पारमार्थिक अहिंसा के प्रति संवेदनशील संचेतना से भर उठता है और वह – ‘ अहिंसा परमो धर्म: ……’ की मूलभूत सृष्टि को अपने भीतर सदा के लिए सृजित करके आत्म उत्कर्ष की ओर बढ़ जाता है । दृष्टि बदलने से सृष्टि बदलने का विचार जहां – ‘ दिव्य दृष्टि से समृद्ध सृष्टि…… ’ की अनादि परंपरा सृजित करता है वहीं मानव हृदय में भावनात्मक संतुष्टि को भी रेखांकित कर देता है जिससे आत्मिक शक्ति की अनुभूति – मन , बुद्धि एवं संस्कार परिवर्तन से – कर्म , पुरुषार्थ और भाग्य के परिष्कार को संभव बनाती है जो आत्मिक समृद्धि हेतु उच्चतम दृष्टिकोंण अपनाने की निरंतर प्रेरणा प्रदान करता है । महानता की गौरव गाथा से मानवीय मूल्यपरक सिद्धांत को जीवन में श्रेष्ठता की धारणा द्वारा महामानव की उच्चता तक पहुंचा जा सकता है जहां से आत्म – दर्शन की दुर्लभ प्राप्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक पुरुषार्थ की शक्ति प्रदान करती है जिसमें वह – ‘ सर्वे भवन्तु सुखिनः …..’ की व्यापकता से संबद्ध होकर पूर्णत: कर्म संबंध से मुक्त अर्थात कर्मातीत अवस्था को प्राप्त कर लेता है । चेतना के निर्माण से चिंतनशील प्रवृत्ति का जन्म होता है जिससे व्यक्ति को – ‘ मानव सेवा से माधव सेवा …..’ की उपलब्धि प्राप्त होती है जो परमात्म – दर्शन का श्रेष्ठतम आधार बनकर व्यक्ति को राजयोग से मौन की ओर गतिशील करते हुए – ‘ वसुधैव कुटुम्बकम…….’ की धरोहर को अव्यक्त स्वरूप की आत्म उच्चता में परिवर्तित कर देती है।”
साधन और साध्य की पवित्रता :
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में वृहद् स्तर पर प्रकृत्ति के पंच तत्व – पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश की सृष्टि नैसर्गिक रूप से विद्यमान है । अध्यात्मिक जगत द्वारा प्रकृति के तत्वों को देव स्वरुप की संज्ञा प्रदान करके मानवीय चेतना को कल्याणकारी स्थिति से प्रेरणा ग्रहण करने की अवस्था तक गतिशील किया गया है । जीवन के सात्विक पक्ष को निभाने की शक्ति जहां अध्यात्म का मुख्य स्रोत है वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोंण का परिणाम अनुसन्धान की अनिवार्यता में मददगार बनना है । ‘ अध्यात्म ’ जब पूर्ण रूप से विश्व के मनुष्यों का धर्म , हो जाता है तब पुरुषार्थ में पवित्रता द्वारा प्रकृति को सतोप्रधान बनाने की जिम्मेदारी और जवाबदेही से व्यक्ति स्वत: अभिप्रेरित होता है । विज्ञान के चमत्कार ने विभिन्न अविष्कार से मानव जाति को सूक्ष्म एवं स्थूल – संसाधनों द्वारा भरपूर कर आत्मिक गुणों के विकास हेतु विशेष समय की शक्ति का वरदान दे दिया है ।
अध्यात्म का अनुकरण एवं अनुसरण :
अभिप्रेरणा का प्रकाश पुंज आत्म विकास की प्रक्रिया में संलग्न रहकर व्यक्तिवाद – वस्तुवाद , पूंजीवाद – साम्राज्यवाद तथा भौतिकवाद – विस्तारवाद से मुक्ति हेतु भगीरथ प्रयास , अंततः आत्मा को – सुख , शांति और आनंद की प्राप्ति कराता है । अध्यात्म के अनुकरण एवं अनुसरण से आत्मा की वैभव पूर्णता – उत्तम क्षमा से कल्याण का व्यवहार – दर्शन , अनहद नाद का अनुभव करते हुए भाव – भासना के साथ भावना – भाषा की पवित्रता को अक्षुण्य बनाए रखता है । सदप्रेरणा का यथार्थ आत्मा की समृद्धशाली और मंगलकारी परिणिति में उच्च दर्शन से निराकार तत्व को श्रेष्ठ – शुभ एवं पवित्र कर्म की स्थिति द्वारा पुण्य – महान तथा धर्मगत अवस्था से देवात्मा के स्वरुप में परिवर्तित कर देता है । मानव जीवन के प्रांगण में वैज्ञानिक दृष्टिकोंण से गतिशील समग्र चेतनता को उन्नति के पथ पर – परिवर्तन , परिणाम , परिमार्जन , परिवर्धन एवं परिष्कार के सन्दर्भ एवं प्रसंग में उत्कृष्टता हेतु सतत रूप से अभिप्रेरित किया जाता है । अध्यात्म के अंतर्गत – आत्मा के स्वमान , स्वरुप और स्वभाव का रूपांतरण , अनुभूति , दृष्टि , विकास और सम्पूर्णता की उच्चता को सदा स्थायी रखने का पुरुषार्थ मानवता की गरिमा को सदा समादर भाव से स्वीकार करता है ।
दिव्य दृष्टि से समृद्धशाली सृष्टि :
मनुष्य जीवन को ऊंचा उठाने एवं आगे बढ़ाने के लिए सर्वप्रथम अंतर्मन को पवित्र बनाने की आवश्यकता होती है जिसके लिए व्यक्तिगत पुरुषार्थ – मंसा , वाचा एवं कर्मणा की पवित्रता से युक्त कर्म करने पर महत्वपूर्ण रूप से ध्यान रखना पड़ता है । आत्मा की समृद्धशाली उच्चता को समझने के साथ स्वीकार करने हेतु जिस विशिष्ट आयाम को अपनाना अनिवार्य है उसमें ज्ञान की गहराई को बोध के साथ आचरण में उतारना जीवन का व्यावहारिक पहलू होता है । व्यक्ति स्वयं को जब ज्ञान से परिपक्व करने हेतु पुरुषार्थ करता है तब वह योग का प्रयोग इस विधि से करने लगे कि – प्रत्येक कार्यक्षेत्र में योग का सानिध्य जुड़ जाए तथा उसके द्वारा कर्मयोग की धारणात्मक पुष्टि सुनिश्चित हो सके । आत्म जगत को सुख पहुँचाने का भावार्थ – ‘ सेवा अस्माकं धर्म: ..’ के सिद्धांत एवं व्यवहार को प्रतिपादित करता है तथा व्यक्ति पारमार्थिक अहिंसा के प्रति संवेदनशील संचेतना से भर उठता है और वह – ‘ अहिंसा परमो धर्म: ……’ की मूलभूत सृष्टि को अपने भीतर सदा के लिए सृजित करके आत्म उत्कर्ष की ओर बढ़ जाता है । दृष्टि बदलने से सृष्टि बदलने का विचार जहां – ‘ दिव्य दृष्टि से समृद्ध सृष्टि…… ’ की अनादि परंपरा सृजित करता है वहीं मानव हृदय में भावनात्मक संतुष्टि को भी रेखांकित कर देता है जिससे आत्मिक शक्ति की अनुभूति – मन , बुद्धि एवं संस्कार परिवर्तन से – कर्म , पुरुषार्थ और भाग्य के परिष्कार को संभव बनाती है जो आत्मिक समृद्धि हेतु उच्चतम दृष्टिकोंण अपनाने की निरंतर प्रेरणा प्रदान करता है ।
मानवीय श्रेष्ठता के सामाजिक सरोकार :
श्रेष्ठता के आगमन से जीवन में प्राप्त ज्ञान का सदुपयोग सुनिश्चित होता है और व्यक्ति मानवीय सद्गुणों एवं शक्तियों से स्वयं को सुसज्जित अनुभव करते हुए आत्म सम्मान की गरिमापूर्ण स्थिति से मानवता को सुरक्षित करने में संलग्न हो जाता है । ‘ बड़े भाग्य मानुष तन पावा ……’ का आत्मबोध ज्ञान से सत्य दर्शन को व्यक्ति के समर्पण भाव तक स्वयं की संपूर्णता हेतु जागृत कर देता है जो उसे – ‘ सर्व धर्म समभाव …..’ के व्यवहार पक्ष पर लाकर खड़ा कर देता है और वह स्वयं की आत्मिक संपन्नता के मानवीय सरोकार से स्वत: ही जुड़ जाता है । संयमित जीवन – शैली की विराट परंपरा , व्यक्ति को योग द्वारा कर्मों में कुशलता की अभिवृद्धि के लिए अनुप्राणित करती है जो जीवन दर्शन से धर्म और कर्म के सामंजस्य को – ‘ बहुजन हिताय , बहुजन सुखाय….’ से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष संबंध बनाकर जीवन को उपराम स्थिति अर्थात साक्षी दृष्टा की उच्चता पर स्थापित कर देती है |
अध्यात्म द्वारा मानवता का मंगल :
महानता की गौरव गाथा से मानवीय मूल्यपरक सिद्धांत को जीवन में श्रेष्ठता की धारणा द्वारा महामानव की उच्चता तक पहुंचा जा सकता है जहां से आत्म – दर्शन की दुर्लभ प्राप्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक पुरुषार्थ की शक्ति प्रदान करती है जिसमें वह – ‘ सर्वे भवन्तु सुखिनः …..’ की व्यापकता से संबद्ध होकर पूर्णत: कर्म संबंध से मुक्त अर्थात कर्मातीत अवस्था को प्राप्त कर लेता है । चेतना के निर्माण से चिंतनशील प्रवृत्ति का जन्म होता है जिससे व्यक्ति को – ‘ मानव सेवा से माधव सेवा …..’ की उपलब्धि प्राप्त होती है जो परमात्म – दर्शन का श्रेष्ठतम आधार बनकर व्यक्ति को राजयोग से मौन की ओर गतिशील करते हुए – ‘ वसुधैव कुटुम्बकम…….’ की धरोहर को अव्यक्त स्वरूप की आत्म उच्चता में परिवर्तित कर देती है । जीवन में श्रेष्ठता की स्थिति का प्रमाण – अतीत , आगत एवं अनंत के प्रसंग में मानवता की मंगलकारी पवित्र अवस्था को अभिव्यक्त करता है जिसमें ‘ आत्म उत्थान से लोक कल्याण की यात्रा…..’ जन्म-जन्मांतर के संदर्भ एवं प्रसंग में वैज्ञानिक दृष्टिकोंण से अभिप्रेरणा प्रदान कर – सतत रूप से मानवता को – आधारमूर्त , उद्धारमूर्त, अनुभवीमूर्त, उदाहरणमूर्त एवं साक्षात्कारमूर्त स्वरूप में सदा गतिमान बनाए रखता है।







