सार: पत्रात्मक शैली में रचित उपन्यास ‘सहेला रे’ भारतीय संगीत के उस दौर को प्रस्तुत करता है जब संगीत शास्त्र मर्मज्ञ सहृदय हुआ करते थे, शास्त्रविहीन श्रोता नहीं। उपन्यास की सूत्रधार विद्या हिन्दुस्तानी संगीत और पुरानी गायिकाओं पर पुस्तक लिखना चाहती है लेकिन सुकुमार बैनर्जी की हुस्नाबाई की सहेली बनारस की मशहूर गायिका हीराबाई और उनकी बेटी अंजलीबाई के रहस्यमय इतिहास को जानने की गहरी ललक के कारण विद्या की पुस्तक के केन्द्र में हीराबाई और उनकी बेटी अंजलीबाई समा जाती हैं। उनके जीवन के बिखरे सूत्रों के संकलन के दौरान संगीत के स्वर्णिम युग की कई कड़ियाँ जुड़ती हैं। उपन्यास को लेखिका ने पाँच वंशवृक्षों में पिरोया है, जो स्वर्णिम युग के संगीत साधक एवं रसिकों की गहन संगीत समझ को दर्शाते हैं। वंशवृक्ष एक, गायिका हुस्नाबाई एवं उनकी बेटी बी अल्लारक्खी, वंशवृक्ष दो, हीराबाई एवं उनकी बेटी अंजलीबाई की अनलिखित जीवन यात्रा लिखित रूप में दर्ज है। अर्थात् हुस्नाबाई-बी अल्लारक्खी, हीराबाई-अंजलीबाई के जीवन का लिखित दस्तावेज-‘सहेला रे’। पत्रात्मक शैली में रचित कृति एक तरह से जीवनीपरक उपन्यास का भी आभास देती है। वंशवृक्ष तीन, चार और पाँच स्वर्णिम युग के रसिकों के संगीत आस्वादन, चिंतन जैसे गुणों एवं उस दौर के सांगीतिक घरेलू माहौल की ओर इंगित करते हैं। स्वर्णिम युग के रसिक सुकुमार बैनर्जी के शब्दों में-‘‘तमीज़ के साथ संगीत अदायगी करने और खुले मन से उसे सुनने की क्षमता सुथरे समझदार घरेलू माहौल और सालोंसाल उस्तादी चरणों में बैठकर ही अर्जित होती है।’’1
बीजशब्द: कलकत्तेवाली हीराबाई, बनारसी गायकी, मिर्जापुरी कजरी, सुकुमार बैनर्जी, तराना, कौल टप्पा।
‘सहेला रे’ लेखिका मृणाल पाण्डेय के अथक परिश्रम का परिणाम है, जिसमें संगीत के स्वर्णिम युग की आखिरी तस्वीर के साथ-साथ वर्तमान के बेढंगे संगीत की तस्वीर भी मौजूद है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सिंहावलोकन से वर्तमान संगीत में परिवर्तन की अनेकों परतों पर शोधपत्र में प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। सर्वप्रथम वंशवृक्ष एक और दो की कहानी। वंशवृक्ष एक को जानने के लिए वंशवृक्ष दो की जानकारी पहले देना ज्यादा उचित होगा।
वंशवृक्ष दो उर्फ हुस्नाबाई और बी अल्लारक्खी
बनारस की खानदानी डेरेदार गायिका बी अल्लारक्खी, जिनकी माँ बनारस की नामी-गिरामी डेरेदार मशहूर तवायफ हुस्नाबाई सारंगीनवाज़ उस्ताद आशिक अली खाँ साहिब की गंडाबन्द शार्गिद थीं। हुस्नाबाई का ख्याल, टप्पा, ठुमरी, तराना शैलियों में बड़ा नाम था। ‘‘इन्तहाई खलीक, बावज़अ और जिन्दादिल खातून थीं। खुले दिल से हँसती-बोलतीं। खुली पाटदार आवाज़ में बनारसी बोल-बनाव की ठुमरी और कजरी, चैती गाने के लिए वे दूर-दूर से महफिलों में बुलवाई जाती थीं।’’2 हुस्नाबाई के सुरों पर मशहूर रियासत चंपानगर के राजा के बेटे कालिकानंद सिंध महाराज ऐसे रीझे कि उन्हें और 14 वर्षीय अल्लारक्खी को रामपुर की नई-नवेली शेरकोठी में आदर के साथ बसा दिए। यहाँ बड़े-बड़े उस्तादों से बी अल्लारक्खी ने तालीम ली-‘‘ख्याल गायकी, ठुमरी, दादरा, तराना, कौल टप्पा सबकी उम्दा से उम्दा तालीम दिलवाई गई हमको। लय के तमाम बल पेंच और पंद्रै मात्रा की पंचम सवारी और ग्यारह मात्रा की अष्टमंगल सरीखी तालों के खानदानी गुर जभी सीखे।’’3 अल्लारक्खी के पिता हुबली तरफ के बड़े उस्ताद थे, जिनकी बनारसी महफिल में गायकी सुनकर हुस्नाबाई उन पर मर मिटी थीं। अल्लारक्खी अपने पिता खाँ साहिब की ही गंडाबांध शिष्या हुईं। अल्लारक्खी ने भी संगीत में खूब नाम कमाया जिसके चर्चे दूर-दूर तक थे। किसी महफिल में अल्लारक्खी की पंडित मोतीलाल मिसिर से मुलाकात हुई और नथ उतराई की बात चल गई। ‘‘सारा मोलभाव बड़ी शायस्तगी के साथ किया जाता था तब, और नथ उतराई की कीमत लगानेवाले डेरेदार तवायफों के रईस सरपरस्त तब खुद भी मौसीकी और कलाम के बड़े गुणी ज्ञानी होते थे।’’4 पंडित मोतीलाल मिसिर रसूखदार ब्राह्मण परिवार से थे। उनके माँ-बाप का दिया नाम था-किरपा शंकर। पुरखों के समय से उनके घर में इत्र और सुंघनी का व्यापार होता था। मोती पंडित की कम उम्र में फेफड़े के कैंसर के कारण मृत्यु हुई। बी अल्लारक्खी पर मोती पंडित की मृत्यु का गहरा असर हुआ था।
बी अल्लारक्खी कुछ अलग मिज़ाज की थीं, उनका नाम और शोहरत कमाने की ओर कोई रुझान न था। बी अल्लारक्खी के समय हिन्दुस्तानी महफिली संगीत की स्थिति रिकॉर्डिंग कंपनियों की मार्फत कुछ डगमगाने सी लगी थी। महफिली संगीत के बदलते दौर का वर्णन आगे शोध पत्र में किया गया है। महफिली संगीत की स्थिति और भविष्य को देखते हुए ही बी अल्लारक्खी ने अपनी बेटी 12 वर्ष की हैदरी का मुंबई शहर के कानवेंट में दाखिला कराया। अम्माजानी के इंतकाल के बाद बी अल्लारक्खी शेरकोठी में ही रहीं। जहाँ उन्होंने बगीचे के फल फूल बेचकर और पुराने वक्त का गहना बेंच-बाचकर अपना काम चलाया। वे कुछ समय के लिए मुंबई अपनी बेटी हैदरी के पास भी गईं थीं। मुंबई में अल्लारक्खी को गुलाम हैदर ने इंडस्टी में काम दिलवाया। उनका पहला गाना गुलाम साहब के लिए ही रिकॉर्ड हुआ था-‘‘हाय मुझे कहीं का न छोड़ा’’5 फिर कादिरुलकलाम शायर, जतिन सेठ जैसे लोग अल्लारक्खी को मुंबई शहर में मिले। अचानक कुंदू मियाँ के बेटे बहीद (जो अमेरिका में नाच-गाने का स्कूल चला रहे थे) का खत मिलते ही हैदरी अमेरिका जाने का ऐलान कर देती है और बी. अल्लारक्खी की शेरकोठी में ही अंतिम दिन काटते हुए मृत्यु हो जाती है। न्यूयार्क में हैदरी की बेटी अमाल ‘दि ओरियेंटल डांस एंड म्यूज़िक स्कूल’ चलाती है। अमाल द्वारा विद्या को लिखे खत में अमेरिका में भारतीय गानेवालों की हालत का चिट्ठा कुछ इस तरह दर्ज है-‘‘ज्यादातर की निगाहें अम्मा, और उम्र सँभालने के बाद जिस तरह मुझ पर टिकती रहतीं यकीन मानों उनमें कोई अपनापन नहीं, एक वहशियाना तेवर ही दिखाई देता था। अम्मा ने एक दो बार तीखेपन से टोका तो कई लोग फैल गए कि ‘बी’ यहाँ बाहर आके सुहागवंतियों के तेवर क्या दिखा रही हो, हम जाने हैं। तुम्हारी नस्ल को!’’6 इसलिए हैदरी न्यूयार्क अमाल के साथ आई और महफिली संगीत की जगह खुद अपना हिन्दुस्तानी संगीत की तालीम देनेवाला स्कूल खोला।
वंशवृक्ष एक उर्फ हीराबाई और अंजलीबाई
उस वक्त तीन हीराबाई गवनहारी नाम से मशहूर थीं, मिर्जापुर की हीराबाई, चुलबुली हीराबाई और कलकत्तेवाली हीराबाई। हमारे शोधपत्र के केन्द्र में कलकत्तेवाली हीराबाई हैं। हीराबाई से पहले उनके पति हिवेट की कहानी जो गुत्थियों को सुलझाने में सहायक होगी। जंगलशिकार और औरतों के भारी जानकार और शौकीनमिज़ाज मित्रों के बीच ‘एडी’ नाम से मशहूर हिवेट इंग्लैंड के किसी बड़े सामंती खानदान के तीसरे नम्बर के बिगड़ैल बेटे थे। ‘‘इंग्लैंड में तब इन अमीर घरानों की खानदानी ज़मीन-जायदाद सिर्फ बड़े पुत्र को ही विरासत में मिलती थी, इसलिए इन खानदानों के शेष बेटे कई दफे छुट्टे साँडनुमा बनकर दबंग गुंडागर्दी की राह पकड़ लेते थे।’’7 हिवेट को अपने खादिम की बेटी से बलात्कार और उसकी हत्या के कारनामे से बचाने के लिए रईस परिवार ने विवादित पुत्र का रातोंरात हिन्दुस्तान, ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में बड़े अफसरी पद पर इंतजाम करा दिया। अफगानिस्तान की लड़ाई में अमीर अली की सेना से करारी हार के पश्चात् हिवेट महोदय अपने ऊँचे खानदान का हवाला देकर सेना से स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण कर जंगलात के बन्दोंबस्त के लिए पहाड़ी इलाके में बड़े पद पर तैनात हुए। ठाकुर हिम्मतसिंह ‘निर्भय’ का पत्र 1857 के गदर की पृष्ठभूमि में कुमाऊँ गढ़वाल इलाके की स्थिति और पीतांबरदत्त पंत का पत्र हिवेट, जॉन कैम्पबैल, पी. क्लटरबक द्वारा पहाड़ी इलाकों में हुई शासन की आड़ में प्रकृति दोहन एवं स्त्री शिकार का चिट्ठा उजागर करता है।
हिवेट के सर्वगुणों को जान लेने के बाद उपन्यास की मुख्य नायिका हीराबाई और अंजलीबाई की कहानी की ओर बढ़ते हैं। हीराबाई पहाड़ी इलाके की बादी बिरादरी से थीं। ‘‘इस सृष्टि में संगीत की शुरुआत शिव के आदेश से जिन गन्धर्वों ने की थी, बादी खुद को उन्हीं का वंशज मानते हैं।’’8 आज भी पहाड़ी इलाकों की बादी गायिकाओं के गीतों में गुलाब और उसकी भतीजी हीरा की जानकारी मिलती है। पति द्वारा परित्यक्त बुआ गुलाब का ब्याह नैक्याणा के कुमय्यों में हुआ था। जंगलात के दौरे करते हिवेट को गुलाब भा गई और 500 रुपए के लिए लालची भाई नत्थू के घर आकर वह कहता है-‘‘मैं हिवेट साहिब जंगलात का मालिक, मुझे भा गई तुम्हारी रूपसी बहन गुलाब। अपने सेब के बगीचों वाले उस जहाजी बंगले में इसे बीबी बना के रखने आया हूँ, जिसे देख सब ठगे रह जाते हैं, बोलो क्या दाम लोगे”9 हिवेट के घर जाने के साल भर बाद गुलाब प्रसूत बिगड़ने से अपने पीछे साँवले रंग के बेटे नथालियन को छोड़ चल बसी। अबतक हिवेट की नज़र गुलाब की भतीजी हीरा पर पड़ चुकी थी। लालची नत्थू ने हिवेट के समक्ष शर्त रखी कि गुलाब को कुमाऊँ रास नहीं आया था इसलिए आप अपना तबादला गढ़वाल और हमारे लिए एक पक्के घर का इंतजाम कराएँ। हिवेट ने गढ़वाल जाने से पूर्व ही रानीखेत के गिरजाघर में हीरा का धर्मांतरण करवाकर शादी की। ‘‘विक्टोरिया मसीह के नाम से वही हिरुली बादी हिवेट साहिब की पत्नी, उनकी पहली शादी के पुत्र नथालियन की विमाता बनकर मसूरी में साहिब की आलीशान कोठी में दाखिल हो गई।’’10 हिवेट ने ही हीरा को अंगे्रजी और उर्दू सिखलाई। उसने बेटी एंजेलीना का बपतिस्मा इलाहाबाद कराया। ‘‘दि. 3 फरवरी सन् 1860 को चर्च के आफिशियलचैपलेन हेनरी जे. स्टीफंस द्वारा, बेबी कैमीलिया एंजेलीना, वल्द एडवर्ड के. हिवेट, फ़ोरन ऑफिसर टु इम्पीरियल डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट कुमाऊँ एंड तराई एरियाज टु हर मैजेस्टीज़ गवर्नमेंट) और बीबी विक्टोरिया मसीह, के बपतिस्में की जानकारी उसमें बाकायदा दर्ज थी।’’11 हिवेट ने हीरा के छोटे भाई मोतिया का धर्मांतरण कराके उसका ईसाई स्कूल में मार्टिन नाम से अंग्रेजी पढ़ाई के लिए दाखिला कराया। मार्टिन पढ़-लिखकर हिवेट का भरोसेमंद निजी सेक्रेटरी बना। अपने पिता की लाड़ली 11 वर्षीय एंजेलीना और 16 वर्षीय नथालियन के ऊपर से हिवेट का साया जल्द ही उठ गया। हिवेट की मृत्यु के बाद नथालियन के नाना नत्थू ने हिवेट की जायदाद के वारिस के रूप में नथालियन को चुना। हीरा और उसकी बेटी एंजेलीना को दूसरा ठिकाना खोजने के लिए एक माह का समय दिया गया। बाद में मार्टिन ने नथालियन को चरस की ऐसी लत लगाई कि 25 वर्षीय नथालियन की मृत्यु हुई। अब हिवेट की सारी सम्पत्ति के दावेदार हीरा का पिता नत्थू और भाई मोतिया उर्फ मार्टिन थे।
उर्दू मास्टर महमूद बख्श की मदद से 27-28 वर्षीय हीरा अपनी बेटी एंजेलीना के साथ बनारस आई। ‘‘हीराबाई शक्ल से बेहद हसीन, गोरी-चिट्टी, घुँघराले बालोंवाली खातून थीं। निकलता हुआ कद, ऊँची पेशानी, तोते जैसी आगे से कुछ मुड़ी हुई सुतवाँ नाक और कुछ-कुछ अंबरी आँखें, नशीली सी। कमरे में दाखिल होतीं तो निगाहें अटक-अटक जातीं। ज़हीन थीं, पर तबीयतन कम बोलनेवाली, आवाज़ में कुदरती सोज़ था।’’12 गहरी मित्र हुस्नाबाई ने हीराबाई को बनारसी पुरबिया बोली, मिर्जापुरी कजरी, बनारस की बोल-बनाव की ठुमरी गायकी के साथ हिन्दुस्तानी महफिली चाल-चलन और पहनावे से परिचित कराया। हीराबाई ने भी हुस्नाबाई को काम-चलाऊ अँग्रेजी-जुबान सिखाई। ‘‘हीराबाई तो पढ़ी-लिखी वाग्गेयकार शायर भी थीं उनकी कुछेक बंदिशें अभी भी गाई जाती हैं।’’13 हीराबाई के गले की कुदरती मिठास को परखने के बाद काशी के मिसिर भाईयों ने उन्हें गंडाबंध शार्गिद बनाकर ख्याल, टप्पा, ठुमरी की तालीम दी। दोनों मिसिर भाई दरबारी गायक बनकर नेपाल जाने से पूर्व हीराबाई के गले को तराश चुके थे। ‘‘किसी महफिल में उनकी गाई बागेश्री की ‘मालिन लाई चुन चुन कलियाँ’ बंदिश सुनने के बाद उन पर उस वक्त के एक और मशहूर बनारसी गवैय्ये उस्ताद बशीर खाँ का भी दिल आ गया। और उन्होंने बाई को बड़ी मोहब्बत के साथ धुरपद और टप्पा गायकी की उम्दा तालीम दी।’’14 बनारसी महफिलों में हीराबाई और हुस्नाबाई का सितारा बुलन्दी पर और उनका बहनापा बनारस में एक मिसाल था।
पंजाब तरफ के एक पठान सितारिए जनाब मनव्वर खान साहब का बेटा ताजुद्दीन जो अपने गबरू, खुशबिलास मिज़ाज़ एवं आवाज़ में मिठास के साथ बनारस की बाईयों का एक समय कुछ ज्यादा ही चहेता बन बैठा। बाईयों ने उसे बनारसी गायकी ही नहीं बल्कि महफिली सलीके की भी तमाम बारीकियाँ सिखाईं। लेकिन जल्द ही ये चहेता बाईयों के दिलों से चढ़े परवान की तरह उतर गया, फिर भी वह एंजेलीना उर्फ अंजलीबाई के दिल पर परवान की तरह चढ़ा रहा। इसकी भनक हुस्नाबाई के शब्दों में जो वे हीराबाई से कहती हैं-‘‘हमारा मुँह न खुलवाओ बी, तुम्हारी बेटी का उस पर दिल आ गया है तो क्या हम भी उसे दामाद मान लें, अय बासी भात में खुदा का साझा? तुम भी तौबा करो बी वर्ना नथ उतराई हो चुकी तुम्हारी बिटिया की। पछताओगी, हाँ।’’15 हुस्नाबाई की बात हीराबाई के मन में कुछ ज्यादा ही खटकी। वे रातोंरात बेटी अंजली के साथ बनारस से कलकत्ता के लिए रवाना हुईं।
हीराबाई 14 वर्ष की अंजली के साथ कलकता की नखौदा मस्जिद के पास बहूबाजार के किराए के मकान में रहीं। ‘‘शुरू में किराये के मकान में चन्द साल गुजारने के बाद बाई ने धरमतला रोड पर किन्हीं हाजी साहेब की कोठी चालीस हजार में खरीद ली।’’16 कलकत्ता में दोनों माँ-बेटी ने अपने को फिर से सँवारा सँभाला और एक वर्ष पश्चात् अंजली बाई की पहली महफिल बिहार तरफ किसी जमींदार के यहाँ धूमधाम से हुई। अंजली के हुनर को बंगाल के उस्तादों-गुरुओं ने खूब तराशा। ‘‘आखिरकार हीराबाई की उम्मीदों के मुताबिक बेटी ने वो नाम कमाया बंबई, मैसूर तक, कि पूरब अंग की गायकी अंजलीबाई के नाम से जोड़ी जाने लगी।’’17 कलकत्ता में जबरन ला बसाए बादशाह-ए-अवध के यहाँ से न्यौता आने पर माँ-बेटी ने अपनी गायकी का कुछ ऐसा रंग इन गीतों द्वारा बिखेरा-‘‘बहरहाल ऊपरवाले को सजदा किया और जान-ए-आलम के दो और बेहद सलोने कलाम, पहला वो मशहूर दादरा, ‘दिलबर मेरा गयो कौन से देस’ इस नगरी में आन पड़ो अंदेस’ और फिर ठुमरी रागनी खमाज, ‘राम कैसे पार उतरे क्या करूँ, कुछ बन नहीं आता’, दिल में पैवस्त अपनी जड़ों से उजड़ने का सारा दर्द समेटकर अता कीं।’’18 गायकी खत्म होने पर बादशाह आलम नैनों में अश्क लिए ऐलान करते हैं कि वे उनकी शाही गवनहारी होंगी। इसी महफिल में लखनऊ से आए हँड़िया तहसील के नटवरी कत्थक के मशहूर उस्ताद किसुनलाल महाराज को हुकुम मिला कि वे अंजली को गंडाबंद शार्गिद बनाकर नृत्य की तालीम दें। नवाब रामपुर ने अंजलीबाई को बेहतरीन महफिल के बाद नौलखा हार भेंट किया। ‘‘वो माँ-बेटी, हीराबाई और अंजलीबाई अपने वक्त की भारी गायिकाएँ ही नहीं, बेहद शातिर महफिली शख्सियतें और करोड़ों की हैसियत रखनेवाली सेल्फमेड रईस भी थीं। आज की भाषा में कहें तो नॉट जस्ट ग्रेट सिंगर्स बट ऑल्सो वेरी मार्केट सैवी परफ़ॉर्मरस।’’19 हीराबाई और अंजलीबाई का एक अलग ठाठ और रुतबा था। हीराबाई ने उस समय अपनी बिल्ली के कार्यक्रम में हजारों लुटाए-‘‘अपनी एक बिल्ली की शादी में बाई ने 1200 रुपए खर्च किये बताते है। बिल्ली जब ब्याई तो फिर एक दावत पर बीस हजार लुटाए।’’20 वहीं बेटी अंजलीबाई भी संपत्ति के प्रति गहरी ललक रखनेवालीं-‘‘अंजलीबाई शहाना तबीयत की गायिका थीं। जे़वरात और सम्पति की उनमें गहरी प्यास। बाई जल्द ही कोलकाता की कई भव्य इमारतों की मालकिन बनीं।’’21
हीराबाई और अंजलीबाई ने अपनी गायकी में वे गुण भी जोड़े जो रिकॉर्ड कंपनीवालों को भाँए। अंजलीबाई 22 भाषाओं में गायन करने में गुणी थीं। जब रिकॉर्ड कंपनी के गाइसबर्ग कलकत्ता आए तो वे अंजलीबाई से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें मुँहमांगी कीमत तीन हज़ार सादर ऑफर की। ‘‘एक रिकॉर्ड की कीमत दो रुपए बारह आने से लेकर तीन रुपए बारह आने तक थी। टॉप का मेहनताना उस जमाने में छः सौ रुपया था। बीस-बीस भाषाओं में गाकर अंजलीबाई सरीखी बड़ी गानेवालियों ने भरहाथ कमाया।’’22 अंजलीबाई की गायकी का जादू श्रोताओं रसिकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाला था-‘‘जय माँ दुर्गा, कैसी तो आवाज़ और कैसी ताल की पकड़। दो-दो मध्यमों के बीच वह अविश्वसनीय तौर से खुला कंठ एक हिंडोले-सा आन्दोलित हुआ तब तो आकार और भी चैड़े होते गए, बाप रे! पूरा आवर्तन एक ही साँस में? खरज़ पर कुछ देर को टिकीं, तो हमको लगा कि हम सब बाई के साथ किसी गहरे समुद्र में डूब रहे हैं। कुछ देर को मानों पूरी महफिल की साँसें थम गईं। फिर अगला आवर्तन आया और हमको उबारता चला। फिर थोड़ी देर बाद आईं तानें, दानेदार ठुमकती सी तानें जिनका हर एक कदम नपा-तुला था, न कम, न बेशी। हर बार सम पर आतीं तो लगता कि राग की इसके अलावा कोई ठाह हो भी कैसे सकती थी।”23 जब ग्रामोफोन के तवों पर गाने भरेजाने लगे वे वहाँ भी अव्वल ही रहीं-‘‘उन दिनों सिर्फ रौशनआरा या अंजलीबाई के कद-बुत की गवनहारियों को नगद हजार रुपए की रिकॉर्डिंग फीस मिलती थी। अब इनमें से भी पहली तो चल दीं मियाँ का हाथ थामकर पाकिस्तान, बच रहीं बस अंजलीबाई। जलंधर के कोई बाली साहिब धुनें बनाते, वे गातीं। रुपया उनपर बरसता था।’’24
कलकत्ता में हीराबाई-अंजलीबाई का सितारा बुलंदी पर था लेकिन माँ-बेटी के मध्य दूरी बरकरार थी। हीराबाई अपने दर्द को शेरकोठी में बैठी हुस्नाबाई को पत्र में बयाँ करती हुईं-‘‘बड़ा पछताई मैं उस नमकहराम को लेकर। जाते-जाते भी मेरी बेटी का दिल साथ ले गया और उसकी जगह उसके सीने में मानों बरफ की एक सिल्ली रख गया। अब हाल ये है कि माँ और मर्दज़ात दोनों ही के नाम से अंजली को गहरी चिढ़ हो गई है।’’25 अंजली माइनर थी, इसलिए हीराबाई ने ताजुद्दीन का अंजली से तलाक कराने के लिए अदालत में दावा किया। ताजुद्दीन के वकील की चालाकी के चलते हीराबाई ने ताजुद्दीन को नखौदावाली तिमंजली कोठी देकर मामला अदालत के बाहर ही रफा दफा किया। एक रियासती मुवक्किल के साथ कोठी का एक लाख में सौदा कर ताजुद्दीन जनाब हीराबाई और अंजलीबाई की दुनिया से विदा होकर ढाका की ओर रुखसत हुए।
अंजलीबाई और ताजुद्दीन की दूरी भले ही हीराबाई ने कराई लेकिन उनकी नज़दीकी का परिणाम ही था कि अल्मोड़ा के पास के गाँव में बरसों से चल रहे खनन कार्य की ओट में इलाके से लड़कियों को फुसलाकर उनको तराई के देसी चकलों में बेचने के धन्धे में जिस कंजे का नाम आया उसका सीधा संबंध अंजलीबाई से कुछ ऐसे है-‘‘वह बरसों पहले पहाड़ से देस को भाग गई किसी अंगरेज की बागदी घरवाली की गैरशादीशुदा बेटी के बेटे की औलाद है। औरत काफी पैसेवाली होगी जिसने काफी पैसा-धेला देकर बच्चे को जनमते ही कलकत्ते से यहाँ पहचानवालों के पास पलने पहाड़ भेज दिया था। फर्राटे से पहाड़ी और अंग्रेजी बोलनेवाला कंजा शाकिर उसी करमफुट्टे का बेटा है।’’26 अंजलीबाई का बेटा 16 वर्ष की उम्र में घर से भागकर बदमाश बना और चकले की किसी स्त्री से कंजा का जन्म हुआ था। कंजा पुलिस को चकमा देने के लिए औरत का लिबास अपनाता। ‘‘विलायत से इधर गांजा नशा करने आए उन जटाजूटधारी अंग्रेजों के टोले में देवी मन्दिर के पास शाम को उसका दरबार लगता है। उनके बीच वह डार्लिंग शाकिरा कहलाता है।’’27
“हीराबाई की बढ़ती शराबनोशी और लिवर की बिमारी की भी अंजलीबाई को लगातार खबरें मिल रही थीं।’’28 माँ हीराबाई की मौत के सदमे का प्रभाव अंजलीबाई पर गहरा हुआ। जिन्दगी में लूटनेवाले कम नहीं थे। आशिकों और एक तथाकथित बेटे ने प्रॉपर्टी को लेकर अंजलीबाई से मुकद्मेबाजी की, वे मुकद्मा तो जीतीं लेकिन धीरे-धीरे सब ठाठ जाता रहा। मुकद्मेबाजी के कारण अंजली ने दो कोठियाँ बेचकर कर्जा चुकाया। उन्होंने जीवन के अन्तिम समय में देवदासी सहेली की मदद से दक्षिण की एक बड़ी रियासत में राजगायिका बनकर शरण ली और वहीं से इस दुनिया से कूच कर गईं।
वंशवृक्ष तीन, चार और पाँच
वंशवृक्ष तीन, सुकुमार चाचा ने लखनऊ और कलकत्ता की महफिलों को बहुत करीब से देखा था। इनके दादा गोरा बाबू कीर्तन गायन और हवेली संगीत के पारखी थे। पिता बाबू कालीसाधन बैनर्जी ने तो बंगाल के नामी धु्रपदियों और कीर्तनकारों से बाकायदा संगीत की तालीम ली और ख्याल गायकी भी सीखी थी। सुकुमार बैनर्जी भारतीय शास्त्रीय संगीत की अंग्रेजी में नियमित समीक्षाएँ भी लिखा करते थे, जो अकादमिक जगत में चिंतन का विषय हुआ करती थीं। सुकुमार बैनर्जी के मन को जीवन के अंतिम पड़ाव में यह प्रश्न कुरेदता है-‘‘एक हूक सी भी कभी उठती है कि काश समय रहते कलम उठाकर संगीत के जलसों की पीढ़ीवार अड्डेबाजी से उपजे उन सहस्त्र रसाख्यानों और अपने समय के कलावंतों से हासिल दुर्लभ अनुभवों को कहीं दर्ज करा दिया होता।’’29 वंशवृक्ष चार, राधाप्रसाद और माधवीलता (पुतुल दी) के दादा रायबहादुर कुँवर शार्दूल विक्रमसिंह लखनऊ शहर के नामी वकील और कलाप्रेमी थे। उनके तीनों बेटे और तीनों बेटियाँ संगीत रसिक थीं। वंशवृक्ष पाँच, संजीव और विद्या के पिता लखनऊ यूनिवर्सिटी के आला प्रोफेसर पारितोष सुकुल बाबू एवं माँ गौरी त्रिपाठी। विद्या के नाना पंडित अम्बादत्त त्रिपाठी संगीत के प्रबल जानकार थे। माँ गौरी त्रिपाठी संगीत रसिक थीं लेकिन पति की सांगीतिक महफिली बैठकों से गहरी अनकही के कारण बाथरूम में नल चलाकर पुराने रागदारी संगीत की बंदिशों को दुहराना न भूलती थीं। इन वंशवृक्षों के घरों में संगीत महफिलों, गोष्ठियों, चर्चाओं का स्वतंत्र रूप से लुफ़्त केवल पुरुष ही उठा सकते थे, घरों की स्त्रियाँ चिक के पीछे से रौशनआरा बेगम, अल्लादिया साहिब, भास्कर बुआ, पंडित भातखंडे जैसे कलाकारों को सुन लें और अगर घरेलू महफिल में ही खाद्य सामग्री को परोसती हुईं सामने से देख लें तो उनका अपना नसीब। वह ऐसा समय था जहाँ ‘‘संगीत की महफिलें बड़े घरों की रसिकता का स्टाइल स्टेटमेंट हुआ करती थीं।’’30 लेकिन घर की स्त्रियों को गायन की स्वतंत्रता ना थी। सुकुमार चाचा विद्या को पत्र में लिखते हैं-‘‘कैसे एक बार जब तुम्हारी माँ ने बड़े मन से मायके से लाई केसरबाई की भैरवी की अमर चीज़ ‘जात कहाँ हो’ का रिकॉर्ड उनको सुनाया तो उनका कमेंट था कि चार आदमियों के सामने बैठकर सारंगियों तबलियों की सोहबत में हाव-भाव सहित गाना सुनाना पेशेवर कुनबियों की ही चीज़ रहे तो बेहतर।’’31 यदि इन संगीत रसिक परिवारों द्वारा अपने घर की महिलाओं को संगीत की आज़ादी दी जाती तो वर्तमान स्थिति कुछ और होती-‘‘हिन्दुस्तानी संगीत जाने कितनी गायिकाओं और पारखी संगीत समालोचकों से इसलिए वंचित रह गया कि उन्होंने अपनी परवरिश के तहत या खटपट से बचने को ताउम्र एक, सो कोल्ड, भले घर में चुपचाप रहना मंजूर कर लिया। खैर।’’32
पुरानी संगीत महफिलों का दौर थमना
दरअसल 1961 में पुर्तगाल की राजकन्या कैथरीन की शाही शादी इंग्लैड के राजा चाल्र्स द्वितीय से हुई। जिसके दहेज में पुर्तगाल के राजा ने ब्रिटेन को सात द्वीपों के समूह मुंबा (मुंबई) नगरी दे दी। ब्रिटेन का आधिपत्य हो जाने के बाद इस महानगर में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का प्रभाव बढ़ा एवं जात-पाँत की भावना जैसे संकुचित सिद्धांतों के प्रति विमुखता का भाव कायम हुआ। जिस कारण यह महानगर मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी की पहली पसन्द के रूप में उभरा। उत्तर भारत के दरबारों से उजड़े, गरीबी की जकड़ से निकलने को उत्सुक गायक और दक्षिण महाराष्ट्र के मन्दिरों से राजबाड़ियों तक जा पहुँची पेशेवर देवदासियों की एक बड़ी जमात मुंबा देवी की शरण में आ पहुँची। उत्तर भारत से सबसे पहले आगरा घराने के कुछ बड़े उस्ताद आए। यहाँ आकर उनको पक्की महफिली गायकी के अलावा यहाँ के गुजराती, मराठी, पारसी-हिन्दोस्तानी थियेटर और फिल्मों में भी अपने हुनर और कमाई के रास्ते दिखाई देने लगे। जब आगरा घरानेवालों का काम जमने लगा तो रामपुर, सहसवान, ग्वालियर घरानों के कई उस्तादों ने भी रजवाड़ों नवाबों की हालत देखते हुए मुंबई नगरी में ही शरण लेना मुनासिब समझा। आगे इन घरानेदार गायकों ने समय की चाल को देखते हुए नए सरपरस्तों की रुचि के अनुकूल गायकी को ढालना शुरू किया। तत्पश्चात् नवस्थापित रिकार्डिंग कम्पनियाँ सबसे अधिक पैसा बनाने की राह बनीं। अंग्रेज जल्द ही हिन्दुस्तानी की संगीत रसिकता के भाव को भाँप गए। यानी जो संगीत अब तक महफिली संगीत के रूप में कायम था वो अब मुंबई नगरी में नई करवट लेने वाला था। हिन्दुस्तानी रसिक की तृप्ति को तृप्त करने के लिए अंग्रेजों ने लाख के बने जरमन तवे पर संगीत भरे और खूब बेचे। इन लाख के बने जरमन तवों पर शास्त्रीय संगीत की महफिली गायिकाओं का परचम खूब लहराया-‘‘गदग की जानकीबाई की गाई ‘बिन बदरा बिजुरी’, कलकत्ते की गौहरजान की होरी, बाँग्ला की शशिमुखी, शशिबाला, इलाहाबाद की मुन्नीजान, बनारस की शिवकुँवर, पानीपत की मिस अमीरजान और आगरे की मल्काजान की गायकी का जादू उत्तर भारत के सर चढ़कर बोलने लगा।’’33 कुछ किस्से ऐसे भी हैं कि जो अंग्रेज अपने घर-परिवार को छोड़कर आए थे वे देसी बाईयों पर आसना हुए। ‘‘भागलपुर साइड की एक बड़़ी नामचीन गायिका जुगनीबाई उनमें से एक की बीबी बनीं और इस कदर बनीं कि अन्त में पति समेत बरतानियाँ जा बसीं। वहाँ सुनते हैं उनका एक बेटा हुआ जो बाद को पादरी बन गया।’’34
अंगे्रजों के बाद दूसरे नम्बर पर संगीत रसिकों की कौम थी-जर्मन। ‘‘उनकी कौम ठहरी हमेशा से संगीत की आशना। कुछ बड़े संगीतकारों ने जब हमारी गायकी बड़ौदा सरीखे दरबारों में जाकर सुनी, तो वे बड़े उस्तादों के सरपरस्त बने। कुछ चर्चित परचों में उन्होंने मार्गी संगीत को एक ‘हिंडू’ धार्मिकता से जुड़ा प्राचीन कलारूप बताया। सच न होते हुए भी पर्चे की लन्दन तक धूम रही।’’35 विश्वयुद्ध के समय जर्मनी का हुक्का पानी बंद होने की वज़ह से रिकॉर्डिंग संगीत के क्षेत्र में हिन्दुस्तानी सेठ आगे आए। तवे के लिए लाख की आवश्यकता को पूरा करने के लिए इन सेठों ने जंगलों पर प्रहार आरंभ किए। ‘‘बेलियाघाट में पहली हिन्दुस्तानी रिकॉर्ड फैक्टरी लगी थी। लेबल था रॉयल और मिल्कियत मुखर्जी एंड मुखर्जी की।’’36 इस समय तक एक और बड़ा बदलाव देखने को मिलता है जो सभ्य भारतीय परिवार संगीत गायन केवल पेशेवर कुनबियों की ही चीज़ मानता आया था अब उन भले घरों की भी स्त्रियों ने संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया-‘‘तब तक भले घर से गायकी में उतरकर बंगाल की नैना देवी, साधना बोस और दीपाली तालुकेदार और महाराष्ट्र की दुर्गा खोटे जैसी मेधावी भद्रजन कन्याएँ हरिवल्लभ या आकाशवाणी संगीत समारोहों में गाकर नाम कमाने लगी भी थीं। और रेडियो पर गाना अब शर्म नहीं शोहरत का बायस बन चला था।’’37 एक तरफ इन रिकॉर्डिंग कंपनियों ने संगीत कलाकारों को काम देकर उनके जीवन को संबल दिया वहीं दूसरी ओर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बड़े-बड़े फेर-बदल किए जाने लगे। जिसका प्रभाव इतना बढ़ता चला गया कि उसके वर्तमान संगीत के साक्षी हम स्वयं हैं। उस समय के कलाकारों द्वारा बदलाव के तेवर को बी अल्लारक्खी के शब्दों में-‘‘हम देख सकती थीं कि किस तरह अंजलीबाई अंग्रेज, मराठी, गुजराती और पारसी सेठों की पसन्द में तमाम बोलियों में तमाम तरह की श्रुतियों को समेटकर मार्गी संगीत को लगातार बदलने लगी थीं।’’38 उस समय भी बी अल्लारक्खी जैसे कई संगीत कलाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत मे इस बदलाव के लिए तैयार नहीं थे-‘‘हमारी राय में मार्गी संगीत आम पब्लिक के लिए नहीं सिरजा गया है। पब्लिक के बीच मौसीकी के कठिन लेकिन पक्के रूप की जानकारी बढ़ाना हमारा काम है। उसको हम भी सच्चे ज़ायकों की तमीज़ सिखाने की बजाय दो मिनट में पकनेवाली नूडल के ज़हर भरे ज़ायके का लती बना दें तो वह तो धीमे-धीमे साफ़ सुथरी गिज़ा खाना ही छोड़ देगी।’’39
वर्तमान यथार्थ
लेखिका ने शास्त्रीय संगीत के स्वर्ण युग की तस्वीर के साथ-साथ वर्तमान संगीत की भी तस्वीर पेश की। वर्तमान संगीत के व्यापारी अग्रवाल साहब कहते हैं-‘‘चैबीस घंटे जागता शेयर बाजार, अनवरत साहूकारी लेन-देन और लेट नाइट सनीमे के रतजगे मनाती दुनिया में कहीं भी श्रोताओं का अकाल कैसे होगा जनाब!’’40 कितना बड़ा व्यंग्य है उन श्रोताओं पर जिनकी पीढ़ियाँ संगीत मर्मज्ञ हुआ करती थीं। जहाँ संगीत मनोरंजन मात्र नहीं, चिंतन, अनुभव, दर्शन, बोध का विषय था। संगीत कलाकारों के लिए साधना-आराधना की वस्तु थी, न कि शौहरत, ख्याति जैसी तमाम उपलब्धियों की। आज इंस्टेंट जमाने में व्यक्ति इंस्टेंट उपलब्धि के शिखर को छूने की कामना मन में बसाए इधर से उधर भटक रहा है। वह अपनी भटक अपने कार्य या कला की साधना में स्थिरता द्वारा नहीं मिटाना चाहता, शायद वह इस स्थिरता के भाव से अब परिचित ही नहीं रहा, ये शब्द उसके जाने-पहचाने, सुने-सुनाए नहीं हैं। वर्तमान में कलाकरों का हाल तो कुछ ऐसा ही है-‘‘हमारे बड़े-बड़े कलाकार सड़क से संसद तक में भदेसपन की बौछार करनेवाले बेसुरे-बेताले नेताओं से पद्मश्री हासिल करने को चप्पलें चटखाएँगे और उनके बच्चों की शादियों में नशे में धुत्त बारातियों के आगे बीन बजाएँगे”41 आज हालात इस कदर सामने हैं कि खुद संगीत परिवारों से संबंध रखने वाले युवा इंस्टेंट उपलब्धि की खातिर अपने पूर्वजों की संपदा को जैसे-तैसे पीठ से उतार देना चाहते हैं, ‘दि न्यू चेको इंडिया म्यूजियम’ वाले तपिश साहब के पोते नवाज़ के शब्द-‘‘अब हम सब भी इंडिया गौट टेलेंट के वास्ते अपने बैंड के लिए फरक तरह से सोचें। बस एक बार ये खानदान के बुजुर्गवार पीठ से उतरे तो। क्या?”42 ये नवाज़ मियाँ वही हैं जिनके पिता मखदूम मियाँ के दादा हुजूर के लिए वायलिन बनाने का कारखाना हुस्नाबाई ने खुलवाया था। ‘‘दिल की शहाना थीं, बोलीं कि जो हाथ सारंगी सरीखा साज़ संभाल सकते हैं, क्या वायलिन नहीं बना सकते? आखिर दोनों गज़ से ही तो छेड़े जाते हैं ना?”43 1993 में परदादा की मृत्यु के पश्चात् 10 वर्ष बाद चेकोस्लोवाकिया का मुल्क टुकड़ों में बँट गया और उधर जर्मनी दो से एक हुआ, तो दादा हुजू़र ने अपने कारखाने, ‘दि तारीक म्यूज़िकल हॉल’ का पुराना नाम बदलकर उसे ‘दि चेको इंडिया म्यूज़िक शॉप’ नाम दिया। लेकिन वर्तमान में स्थिति यह है कि अब गिटार या फर्नीचर ही बनाया जा रहा है। आज वायलिन की लोकप्रियता गोआ और केरल की तरफ ही ज्यादा है, लेकिन वहाँ भी मशीन से बने सस्ते वायलिन का चलन चल रहा है। वर्तमान में भारतीय संगीत गायकी, प्रस्तुति, वाद्ययंत्रों, साधकों एवं गंभीर श्रोताओं के अभाव के रहते हवा के झोंके के दिशा निर्देशों के भेरोसे ही गतिमान है। हवा के झोंके की दिशा से अभिज्ञान भारतीय साधक और श्रोता में उसी झोंके के प्रवाह में मग्न होने की छटपटाहट अपने चरम पर है। प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर हमारी संस्कृति की सुरक्षा किसके हाथों में है…….!
निष्कर्षतः उपन्यास टुकड़ों को जोड़कर लुप्त होने की कगार पर खड़े स्वर्णिम युग की मुकम्मल तस्वीर के साथ वर्तमान दिशाहीन संगीत की झांकी भी पेश करता है। एक समय भारतीय संगीत मर्मज्ञों के श्रवण मनन का विषय था आज की तरह राहगीरों के लिए मात्र मनोरंजन का नहीं। भारतीय संगीत की स्मृति को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान के संगीत पर कई जटिल प्रश्नों को तो खड़ा करता ही है, लेकिन फिर भी एक उम्मीद के साथ, जो अमाल के शब्दों में-‘‘आज हम सब गाने-बजानेवाले मानो किसी दूर-दराज अनाम प्लेटफार्म पर खड़े हैं। आखिरी ट्रेन जा चुकी है, अगली कब आएगी इसका भी कोई ठिकाना नहीं, फिर भी इस बेसुरे बेताले वक्त के बीच हम सब सुर-ताल का दामन पकड़े खड़े हैं…और अलग-अलग जुबानों में अपने अनदेखे रसिक सुननेवालों को पुकार रहे हैंः ‘सहेला रे आ मिलि गाएँ…’’44
संदर्भ:
1 सहेला रे, मृणाल पाण्डे, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2017, पृ.-147
2 वही, पृ.-84
3 वही, पृ.-26
4 वही, पृ.-167
5 वही, पृ.-172
6 वही, पृ.-193
7 वही, पृ.-62
8 वही, पृ.-67
9 वही, पृ.-70
10 वही, पृ.-71
11 वही, पृ.-43
12 वही, पृ.-83-84
13 वही, पृ.-37
14 वही, पृ.-86
15 वही, पृ.-91
16 वही, पृ.-185
17 वही, पृ.-93
18 वही, पृ.-98
19 वही, पृ.-37
20 वही, पृ.-185
21 वही, पृ.-154
22 वही, पृ.-152
23 वही, पृ.-156
24 वही, पृ.-172
25 वही, पृ.-97
26 वही, पृ.-159
27 वही, पृ.-160
28 वही, पृ.-186
29 वही, पृ.-35
30 वही, पृ.-29
31 वही, पृ.-145
32 वही, पृ.-148
33 वही, पृ.-152
34 वही, पृ.-151
35 वही, पृ.-151
36 वही, पृ.-152
37 वही, पृ.-138
38 वही, पृ.-94
39 वही, पृ.-94
40 वही, पृ.-197
41 वही, पृ.-143
42 वही, पृ.-22
43 वही, पृ.-28
44 वही, पृ.-198





