असम में लगभग आठ सौ चाय बागान विद्यमान हैं जहाँ मूल रूप से उड़ीसा, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आनेवाले श्रमिक काम करते हैं। ये लोग स्थायी रूप से असम में बस गए हैं। इन्हें चाय और पूर्व-चाय बागान जनजाति के रूप में जानते हैं। इन्हें सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में मान्यता दी गई है। असम राज्य के आर्थिक विकास में इस समुदाय का विशिष्ट योगदान है। आबादी की दृष्टि से यह समुदाय असम का महत्वपूर्ण समूह है। राज्य के चाय उत्पादन में इनकी प्रमुख भूमिका है। चाय जनजाति के लोग पूरे असम राज्य में फैले हुए हैं। वे लोग आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हुए हैं और इन समुदायों में साक्षरता की दर निम्न है। इस समुदाय की आर्थिक सहायता करने और इनकी शिक्षा के स्तर में सुधार करने के लिए असम सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए गए हैं। चाय जनजाति के लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए असम सरकार ने एक अलग निदेशालय का गठन किया है जिसका नाम ‘चाय और पूर्व-चाय बागान जनजाति कल्याण निदेशालय’ है। चाय जनजाति असम के चाय बागान श्रमिकों और उनके आश्रितों का बहुजातीय समूह है। इस समुदाय को असम सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर “चाय-जनजाति” के रूप में मान्यता दी गई है । वे ब्रिटिश उपनिवेश काल में आए मजदूरों के वंशज हैं जो 1860-90 के दशक में लाए गए थे। उन्हें असम के चाय बागानों में काम करने के लिए लाया गया था। चाय जनजाति बहुजातीय समाज है जिसमें अनेक आदिवासी और जातीय समूह शामिल हैं। वे मुख्य रूप से ऊपरी असम और उत्तरी ब्रह्मपुत्र घाटी के उन जिलों में पाए जाते हैं जहाँ अधिक संख्या में चाय बागान हैं।
चाय जनजाति की अधिकांश आबादी असम के कोकराझार, उदालगुरी, शोणितपुर, नगांव, गोलाघाट, जोरहाट, शिवसागर, चरैदेव, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया में निवास करती है । असम के बराक घाटी क्षेत्र के कछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिलों में भी इनकी अच्छी आबादी है। चाय जनजाति एक जातीय समूह नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग जातीय समूह है। ये लोग भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलते हैं। भाषिक और सांस्कृतिक दृष्टि से चाय जनजाति में विविधता है। ये लोग मुख्यतः सदरी, ओडिया, सौरा, कुरमाली, कुरुख, गोंडी, कुई, खरिया, संथाली और मुंडारी भाषा बोलते हैं। सदरी मुख्य रूप से पहली भाषा के रूप में बोली जाती है और इन समुदायों के बीच संपर्क भाषा के रूप में काम करती है, लेकिन असम में बोली जाने वाली सदरी छोटा नागपुर क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा से अलग है। इस सदरी पर असमिया भाषा का प्रभाव है। इसलिए इसे असमिया सदरी कहा जाता है। असमिया भाषा से प्रभावित सदरी बोली इस समुदाय के बीच संपर्क भाषा के रूप में काम करती है।
चाय बागान मजदूरों को उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक असम के चाय बागानों में काम करने के लिए कई चरणों में लाया गया था। वर्ष 1840 के दशक में छोटा नागपुर डिवीजन के आदिवासी ब्रिटिश नियंत्रण के विस्तार के खिलाफ विद्रोह कर रहे थे। इधर असम के चाय उद्योगों में काम करने के लिए सस्ते मजदूरों की कमी हो गई थी। इन कारणों से ब्रिटिश अधिकारियों ने मुख्य रूप से आदिवासी और कुछ पिछड़े वर्ग के हिंदुओं को असम के चाय बागानों में काम करने के लिए लाया। असम आने के दौरान विभिन्न रोगों से हजारों मजदूरों की मौत हो गई और अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त होने की कोशिश में सैकड़ों लोग ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा मार दिए गए। वर्ष 1841 में असम कंपनी द्वारा मजदूरों की भर्ती के लिए पहला प्रयास किया गया था। इस प्रयास में 652 लोगों को जबरन भर्ती किया गया था, लेकिन हैजा के प्रकोप के कारण उनमें से अधिकांश की मृत्यु हो गई। जो बच गए वे भाग गए।
1859 में वर्कर्स ब्रीच ऑफ़ कॉन्ट्रैक्ट एक्ट पारित किया गया जिसमें मजदूरों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया था। इससे ठेके के माध्यम से असम के बाहर से भर्ती कर चाय बागानों में मजदूरों की कमी को दूर किया गया। वर्ष 1870 में मजदूरों की भर्ती के लिए “सरदारी प्रणाली” शुरू की गई थी। बंगाल और बिहार से मजदूरों की भर्ती की शर्तें अमानवीय थीं। 15 दिसंबर 1859 से 21 नवंबर 1861 तक असम कंपनी ने बाहर से 2,272 मजदूरों की भर्ती की । असम आते समय 2,272 मजदूरों में से 250 मजदूरों की रास्ते में ही मृत्यु हो गई। 2 अप्रैल 1861 से 25 फरवरी 1862 तक 2,569 लोगों को भर्ती किया गया और मजदूरों को दो बैच में ब्रह्मपुत्र नदी मार्ग से असम लाया गया। यात्रा के दौरान 135 मजदूरों की मौत हो गई और 103 मजदूर फरार हो गए। 1 मई 1863 और 1 मई 1866 के बीच 84,915 मजदूरों की भर्ती की गई थी, लेकिन उनमें से 30,000 मजदूरों की मृत्यु हो गई। इन मजदूरों को जानवरों की तरह जहाजों में लाया जाता था। अस्वास्थ्यकर स्थिति में मजदूरों में हैजा फैल जाता था जिसके कारण यात्रा में अनेक मजदूर काल के गाल में समा जाते थे। यात्रा के बाद भी चाय बागानों में उनका जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। चाय बागान के मालिकों ने मजदूरों के रहने के लिए बैरकों का निर्माण करवाया था जिसमें क्षमता से अधिक लोग रहते थे। इन बैरकों में प्रत्येक चाय बागान मजदूर को व्यक्तिगत उपयोग के लिए लगभग पच्चीस वर्ग फुट क्षेत्र आबंटित किया जाता था। बीमार होने पर भी मजदूरों को छुट्टी लेने की अनुमति नहीं थी। मजदूरों को कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। उन्हें अन्य चाय बागानों में काम करनेवाले मजदूरों से मिलने पर भी प्रतिबंध था। उन्हें विवाह के लिए भी चाय बागान के प्रबंधकों से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती थी। इन मजदूरों को मिलनेवाली मजदूरी बहुत कम थी जिसके कारण परिवार के सभी सदस्य चाय बागान में काम करने के लिए मजबूर थे। असम के तत्कालीन मुख्य आयुक्त फुलर ने मजदूरों की स्थिति पर टिप्पणी की थी जिससे इन मजदूरों की दयनीय दशा का पता चलता है-“वे अपनी सभी प्रकार की स्वतंत्रता से वंचित थे और उनकी अपमानजनक स्थिति और अत्याचार अफ्रीका में चल रहे दास प्रथा की याद दिलाते हैं।” इन मजदूरों पर हो रहे अन्याय का कोई अंत नहीं था। चाय बागान के प्रबंधक श्रमिकों का शारीरिक शोषण भी करते थे।
स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के अभाव में प्रतिवर्ष हजारों मजदूरों की मृत्यु हो जाती थी। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने चाय बागानों में डॉक्टरों की नियुक्ति करने की कोशिश की, लेकिन चाय बागान के प्रबंधकों ने उनके आदेशों का पालन नहीं किया। ज्यादातर बागानों में बीमार मजदूरों के इलाज के लिए अस्पताल नहीं थे। इन बागानों में शिक्षा की स्थिति और भी दयनीय थी। वर्ष 1917-18 में चाय बागान में स्कूली शिक्षा के बारे में एक यूरोपीय डीपीआई द्वारा रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी जिसमें उल्लेख किया गया था कि असम के चाय बागानों में स्कूल जानेवाले 2 लाख बच्चे रहते थे जिनमें से प्राथमिक विद्यालयों में 2% बच्चे भी नहीं जाते थे। स्कूलों और छात्रों के नामांकन की संख्या केवल कागजों और फाइलों तक सीमित थी। वर्ष 1946-50 की अवधि में चाय बागानों से केवल चार छात्र कॉलेज जाते थे। चाय बागान के मालिकों ने कभी भी बागान के मजदूरों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। शिक्षा की माध्यम भाषा के कारण भी चाय बागानों में शिक्षा की प्रगति धीमी थी। अलग-अलग जनजातियों और जातियों की अपनी-अपनी अलग भाषा थी। चाय बागानों में मुख्य रूप से मजदूरों द्वारा तीन भाषाएँ बोली जाती थीं-संथाली, कुरुख और मुंडारी, लेकिन आमतौर पर सदरी का उपयोग किया जाता था। संपर्क भाषा के रूप में चाय बागान के बाहर असमिया भाषा का उपयोग किया जाता था।
यद्यपि मालिक चाय बागान मजदूरों का हर प्रकार से शोषण करते थे, लेकिन उनके मन में भी ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला धधक रही थी। प्रख्यात इतिहासकार अमलेंदु गुहा ने लिखा है कि चाय बागान मजदूर अनपढ़, अज्ञानी, असंगठित और अलग-थलग थे, लेकिन फिर भी कई बार उन्होंने बागान मालिकों और एस्टेट प्रबंधकों के अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह करने की कोशिश की। असम के कांग्रेस नेताओं ने चाय बागान के मजदूरों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। अनेक बार कांग्रेसी नेताओं ने चाय बागानों में अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे असहयोग आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों का समर्थन किया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इस समुदाय के लोगों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, लेकिन इनके योगदान को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रेखांकित नहीं किया गया। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में गजाराम कुर्मी, प्रताप गोंड, शंभूराम गोंड, मोहनलाल गोंड, जगमोहन गोंड, बिदेश कमर लोहार, अनसा भुइया, राधु मुंडा, गोबिन तांती, रामसई तुरी, बिष्णु सुकु माझी, बोंगई बाउरी, दुर्गी भूमिज आदि का नाम प्रमुख है। इन चाय बागान मजदूरों के नाम को कभी भी इतिहास में कोई महत्व नहीं मिला, लेकिन यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि इन आदिवासियों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। असम सरकार की अधिसूचना के अनुसार 96 जातियों को चाय जनजाति के रूप में मान्यता दी गई है। ये जातियां अभी अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल हैं।
धर्म की दृष्टि से इस समुदाय की अधिकांश आबादी हिंदू धर्म और शरणा धर्म का अनुसरण करती है। लगभग 15% जनसंख्या ईसाई धर्म को मानती है। चाय जनजाति के लगभग 60% लोग हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं जबकि 25% आबादी शरणा धर्म में आस्था रखती है। हिंदू धर्म को माननेवाले लोग वर्ष में अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। येलोग अधिकांशतः प्रकृति की पूजा करते हैं। वे आदिवासी और तंत्र साधना से संबंधित देवताओं की भी पूजा करते हैं। चाय बागान श्रमिकों के एक बड़े वर्ग के बीच प्राचीन आदिवासी शरणा धर्म का गहरा प्रभाव है। वे एक सार्वभौमिक सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास करते हैं और मारंगबुरु, महादेव और सिंगबोगा जैसे विभिन्न नामों से उनकी पूजा करते हैं। वैष्णव धर्म भी चाय जनजाति की हिंदू आबादी के बीच लोकप्रिय है। धर्म के प्रति इस समुदाय का अटूट विश्वास है। येलोग प्रकृति की भी पूजा करते हैं। इस समाज में पेड़ों को पवित्र माना जाता है और उनकी पूजा की जाती है। सामुदायिक पूजा के लिए लगभग हर गाँव में धार्मिक मंदिर और पवित्र भूमि (जहर थान) मौजूद है। जिन गाँवों के लोगों ने ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया है उन गाँवों में कई चर्चों का निर्माण किया गया है।
पर्व-त्योहार इस समुदाय के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है और ये पर्व-त्योहार उनके धर्म और संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। वे विभिन्न ऋतुओं में अनेक त्योहार मनाते हैं। इस समुदाय द्वारा प्रायः हर प्रमुख हिंदू त्योहार मनाया जाता है जबकि ईसाई लोग गुड फ्राइडे, ईस्टर और क्रिसमस जैसे ईसाई त्योहार मनाते हैं। हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों द्वारा मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहार हैं-फगुआ, करम (त्योहार), जितिया, सोहराई, माघ परब, बाहा परब, टुसू पूजा, सरहुल, नौआखाई, लखी पूजा, मनसा पूजा, दुर्गा पूजा, दिवाली । इस समुदाय के जीवन में संगीत का महत्वपूर्ण स्थान है। येलोग सामूहिक रूप से विवाह, पर्व-त्योहार, मौसम के आगमन, नए जीवन की शुरुआत, फसल की कटाई आदि विभिन्न अवसरों पर संगीत प्रस्तुत करते हैं। लोक संगीत और नृत्य के माध्यम से वे सामाजिक मुद्दों पर अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं और अपनी दैनिक जीवन शैली व इतिहास को पारिभाषित करने का प्रयास करते हैं। ढोल, मंजीरा, मदार, करताल, तमक, नगाड़ा, बांसुरी इनके प्रमुख वाद्ययंत्र हैं। ‘झूमर नृत्य’ इस समुदाय का प्रसिद्ध लोकनृत्य है। करम नृत्य एक महत्वपूर्ण नृत्य रूप है जो लड़कों और लड़कियों द्वारा करम उत्सव के समय प्रस्तुत किया जाता है। अन्य लोकनृत्य हैं-छऊ नृत्य, संबलपुरी दलखाई नृत्य, संताल, उरांव जनजाति के कुरूख नृत्य और खारिया जनजाति के खरिया नृत्य। नर्तकियां आमतौर पर लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनकर और पारंपरिक आभूषण धारण कर नृत्य करती हैं । नर्तक अपने सिर पर सफेद पगड़ी और धोती-कुर्ता पहनकर नृत्य करते हैं।
दशकों से चाय बागान प्रबंधन द्वारा लगातार शोषण और सरकार की उपेक्षा के कारण चाय जनजाति की गिनती असम के सबसे पिछड़े और शोषित समुदायों में की जाती है। हालांकि इस समुदाय की युवा पीढ़ी शिक्षित है और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही है। असम में इस समुदाय की साक्षरता दर खासकर लड़कियों और महिलाओं की सबसे कम है। इस समुदाय के अधिकांश लोग मजदूर हैं। इसलिए वे चाय बागान के अंदर निर्मित श्रम लाइन में रहते हैं जिन्हें चाय बागान मालिकों द्वारा बनाया गया है । अशिक्षा, गरीबी, मादक पदार्थों का सेवन, बदतर जीवन स्तर, बढ़ती जनसंख्या और इन्हें प्रदान की जानेवाली अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं इनकी प्रमुख समस्या है। चाय बागान मजदूरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए ‘असम चाह मजदूर संघ’ निरंतर प्रयास कर रहा है। चाय बागान मजदूरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए ‘असम शाखा इंडियन टी एसोसिएशन’ (एबीआईटीए) और ‘भारतीय चा परिषद’ (बीसीपी) जैसे प्रतिष्ठित चाय संघ यूनिसेफ और असम सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। भारत के कुल चाय उत्पादन में असम की 55% हिस्सेदारी है। यह एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ अधिकांश श्रमिक महिलाएँ हैं। लगभग दस लाख मजदूर असम के चाय उद्योग पर निर्भर हैं और ये सभी उन लोगों के वंशज हैं जिन्हें असम में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा मजदूर के रूप में लाया गया था। इन मजदूरों के त्याग, परिश्रम और समर्पण ने असम के चाय उद्योग को आकार दिया। ये मजदूर अभी भी चाय बागान या कंपनियों द्वारा दी जाने वाली बुनियादी सुविधाओं के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रह रहे हैं। इस समुदाय की हित रक्षा के लिए ‘आदिवासी विकास परिषद और चाय और पूर्व-चाय बागान विकास परिषद’ भी कार्य करती है । इस समुदाय के लोग दशकों से अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन अभी तक इन्हें यह दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। चाय जनजाति मुंडा, संथाल, कुरुख (उरांव), गोंड, भूमिज और दर्जनों अन्य समुदायों का मिश्रित समूह है जिन्हें भारत के अन्य राज्यों में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति अथवा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का दर्जा दिया गया है। ये आदिवासी खुद को आदिवासी कहते हैं। असम भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ इन आदिवासियों को एसटी का दर्जा नहीं दिया गया है। चाय जनजाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के लिए संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश (संशोधन) विधेयक 2019 को मंजूरी दे दी गई है और आशा है कि शीघ्र इस समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दे दिया जाएगा।







