पेड़ और रोटी
गरमी में ख़ुद जलकर पेड़
पका रहा आम हमारे लिए
बैठ गरम भट्ठी के पास जैसे
माँ सेंक रही रोटी हमारे लिए।
नाहक
मुश्किल से मिली थी आज़ादी
छीन ली तुमने कैमरे लगाकर
ले ली हमसे हमारी ख़ुद्दारी
नाहक हमें ग़ुलाम बनाकर।
बेअसर
शहंशाह के आने की ख़बर
फैली हर जगह तहसील में
बढ़ी है हुक़ूमत की परेशानी
अवाम है क्यूँ इतना बेअसर!
दौरा
उनके दौरे पर आने का
फरमान क्या आया
हुई हुक़ूमत एक पैर पर खड़ी
वहीं जनता गहरी नींद सोई।
हुकूमत
रंग भले हुकूमत का बदल जाए
रंगत नहीं बदलती है
चेहरे-दर-चेहरे बदलते रह जाएँ
सोच नहीं बदलती है।





