जब बिल्ली को दूध की रखवाली सौंप दी जाए, तो यह केवल मुहावरा नहीं, एक चेतावनी भी है कि व्यवस्था में कुछ बुनियादी गड़बड़ है। ठीक यही दृश्य वैश्विक कूटनीति के सबसे प्रभावशाली मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में देखने को मिला, जब पाकिस्तान को जुलाई 2025 के लिए अस्थायी अध्यक्षता सौंप दी गई।
यह वही पाकिस्तान है, जिसकी पहचान दशकों से आतंक के निर्यातक देश के रूप में रही है। वह पाकिस्तान जिसे फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे लिस्ट में डाला गया, जो अपने ही देश में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के हनन के लिए बदनाम है, और जो भारत में उरी, पठानकोट, पुलवामा जैसे घातक आतंकी हमलों के लिए ज़िम्मेदार पाया गया – वही अब वैश्विक शांति और सुरक्षा पर बैठकें आयोजित करेगा, एजेंडा तय करेगा और दुनिया को शांति का उपदेश देगा।
यह वही पाकिस्तान है जिसकी भूमिका दशकों से वैश्विक आतंकवाद की नर्सरी के रूप में देखी जाती रही है और यह जिम्मेदारी उसे मिली उस मंच पर, जिसका मुख्य कार्य ही वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
यह किसी लोकतांत्रिक चूक का परिणाम नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें परिषद की अध्यक्षता सदस्य राष्ट्रों के बीच रोटेशन के आधार पर तय होती है। पर क्या रोटेशन किसी देश की नैतिक विश्वसनीयता से बड़ी हो सकती है? यदि हाँ, तो फिर उस संस्था की वैचारिक आत्मा पर पुनर्विचार ज़रूरी हो जाता है।
संयुक्त राष्ट्र की यह व्यवस्था कि हर सदस्य को बारी-बारी से अध्यक्षता मिलेगी — एक प्रक्रियागत समता का दावा करती है। लेकिन जब यह समता मूल्यबोध से रहित हो जाती है, तो वह महज़ औपचारिकता बनकर रह जाती है। पाकिस्तान को अध्यक्षता मिलना उसी औपचारिकता का परिणाम है। परन्तु क्या ऐसी औपचारिकताएं मूल्य आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव को कमजोर नहीं करतीं?
क्या संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था, जो मानवता, शांति और न्याय के वैश्विक प्रतीक के रूप में स्थापित हुई थी, इतनी प्रक्रियावादी हो सकती है कि वह नैतिकता और यथार्थबोध की अनदेखी कर दे?
यदि सुरक्षा परिषद जैसी संस्था में कोई देश केवल इसलिए अध्यक्ष बन जाए क्योंकि वह क्रम में अगला है, तो यह संस्था की नैतिक साख के लिए एक चेतावनी है। शांति की पहरेदारी का भार ऐसे देश को सौंपना, जो खुद अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघनकर्ता रहा हो — यह बताता है कि संयुक्त राष्ट्र को केवल अपने ढांचे नहीं, अपनी दृष्टि का भी पुनरावलोकन करना चाहिए।
क्योंकि इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि यदि संस्थाएं अपने आदर्शों और लक्ष्यों से भटक जाएँ, तो वे जल्द ही विश्वास खो बैठती हैं। और यदि संयुक्त राष्ट्र इस गलती को भी एक ‘प्रक्रियात्मक बाध्यता’ मानकर चुप बैठा रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब इसकी प्रासंगिकता भी महज़ शब्दों और घोषणाओं की ध्वनि भर बनकर रह जाएगी।
पाकिस्तान की राजनीति शुरू से ही धार्मिक पहचान और इस्लामिक राष्ट्रवाद पर आधारित रही है। लेकिन धीरे-धीरे यह पहचान कट्टरपंथी संगठनों की पोषक बनती गई। जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी समूह घोषित किए गए हैं, पाकिस्तान में या तो खुले आम काम करते हैं, या फिर उनके नेताओं को ‘घरेलू नजरबंद’ कर मामूली कार्रवाई कर दी जाती है।
यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान में ‘डीप स्टेट’ यानी सेना और आईएसआई लोकतांत्रिक सरकार से कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह सैन्य-नियंत्रित सत्ता तंत्र आतंकवाद को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं, बल्कि राज्यनीति के उपकरण के रूप में उपयोग करती रही है।
भारत के खिलाफ पाकिस्तान की नीति वर्षों से स्पष्ट रही है — सीधी जंग नहीं, बल्कि परोक्ष युद्ध (प्रॉक्सी वॉर)। कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी से लेकर आत्मघाती हमलों तक, पाकिस्तान-प्रेरित आतंकवाद ने भारत को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से गहरे प्रभावित किया है।
1999 का कारगिल युद्ध, 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई हमला, 2016 का उरी हमला, 2019 का पुलवामा हमला इन सबके तार पाकिस्तान-आधारित आतंकी समूहों से जुड़े पाए गए। केवल भारत ही नहीं, अफगानिस्तान भी पाकिस्तान की ‘रणनीतिक गहराई’ की नीति का शिकार रहा है। तालिबान को वर्षों तक पाकिस्तानी सैन्य एजेंसियों का समर्थन मिला और यह समर्थन एक भूत बनकर अब पाकिस्तान को खुद ही डराने लगा है।
पाकिस्तान को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जो सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है, वह यही है- क्या पाकिस्तान वैश्विक शांति का इच्छुक पक्ष है, या फिर वह आतंक की राजनीति का संरक्षक और प्रयोगकर्ता बना हुआ है? यह प्रश्न केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को प्रभावित करता है, विशेष रूप से जब पाकिस्तान जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता या वैश्विक संगठनों में निर्णायक भूमिका मिलती है।
पाकिस्तान की नीतियों को अगर समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो वह ‘State Sponsor of Terrorism’ की परिभाषा में पूरी तरह फिट बैठता है। शांति का भाषण और आतंक का क्रियान्वयन – पाकिस्तान की यही दोहरी नीति दुनिया के सामने सबसे बड़ा धोखा है।
वास्तव में, पाकिस्तान को शांति का मार्गदर्शक तभी कहा जा सकता है, जब वह आतंकवादी संगठनों पर कठोर कार्रवाई करे, आईएसआई के प्रॉक्सी नेटवर्क को ध्वस्त करे, भारत और अफगानिस्तान के साथ पारदर्शी और भरोसेमंद संवाद को प्राथमिकता दे, और धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति से ऊपर उठे।
लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक पाकिस्तान की भूमिका शांति की नहीं, ‘हिंसा को वैधता देने वाले एक संरक्षक’ की बनी रहेगी। जो स्वयं अपने घर में आग बुझा न सके, वह दुनिया को रोशनी देने का दावा कैसे कर सकता है?
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संस्थाओं को अब यह तय करना होगा कि वे शांति की संरचना को राजनीतिक समीकरणों के हवाले करेंगी या मूल्यबद्ध नेतृत्व के हाथों सौंपेंगी।
क्योंकि अगर बिल्ली को ही दूध की रखवाली दी जाती रही, तो फिर शांति के नाम पर खामोशी और छल ही मिलेगा — समाधान नहीं।
भारत सहित कई देशों की यह चिंता नितांत तार्किक है कि पाकिस्तान जैसे मुल्क को अध्यक्षता देना, भले वह एक महीने की औपचारिकता क्यों न हो, यह उन तमाम देशों के लिए राजनीतिक और नैतिक आघात है जो आतंकवाद से जूझ रहे हैं। यह उस वैश्विक द्वंद्व को भी उजागर करता है, जहाँ ‘राजनयिक तटस्थता’ की आड़ में नैतिक चुप्पी अपनाई जाती है।
यहाँ प्रश्न अध्यक्षता मिलने का नहीं, बल्कि अध्यक्ष के रूप में क्या छवि, मूल्य और संकेत विश्व को मिलते हैं, इसका है। पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में बैठकर कश्मीर पर मानवाधिकार की बातें करता है, पर वही देश अपने ही बलूच, शिया, अहमदिया, सिंधी और पश्तून समुदायों को राज्य प्रायोजित हिंसा से कुचलता है। जिस देश में पत्रकारों का अपहरण, अल्पसंख्यकों का दमन, और धार्मिक कट्टरपंथ का बोलबाला हो, वह वैश्विक मंच पर नैतिकता का व्याख्यान कैसे दे सकता है?
पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता सौंपना, संयुक्त राष्ट्र की नैतिक साख और उद्देश्यात्मकता पर प्रश्नचिह्न बनकर उभरता है। यह पूरी प्रक्रिया एक निरपेक्ष तंत्र की विवशता को दर्शाती है, जो न्याय और विवेक की जगह प्रक्रिया और परंपरा को प्राथमिकता देता है।
यदि किसी संस्था की प्रक्रिया ही हिंसा को वैधता, और दोहरे मापदंडों को संरक्षण देने लगे, तो फिर उस संस्था की उपयोगिता पर पुनर्विचार करना लाजमी हो जाता है। यह बहस एक मूलभूत नैतिक द्वंद्व की ओर संकेत करती है कि क्या वैश्विक संस्थाएँ केवल नियमों की गुलाम रहेंगी, या वे न्याय की चिंगारी को भी जीवित रखेंगी?
पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता देना सैद्धांतिक रूप से उचित, पर नैतिक रूप से हास्यास्पद और खतरनाक है। यह उस वैश्विक न्याय प्रणाली की विडंबना है, जो पीड़ित को चुप और अपराधी को मुखर बनने की आज़ादी देती है।
“जब हम प्रक्रिया को उद्देश्य पर हावी होने देते हैं, तो हम शांति के नाम पर केवल शोर ही सुनते हैं, सच्चाई नहीं।” शांति का मंच किसी भी राष्ट्र को तभी सौंपा जाना चाहिए, जब वह शांति की मूलभूत शर्तें — सत्य, सहिष्णुता और न्याय को अपनी नीति और नीयत दोनों में आत्मसात कर चुका हो। अन्यथा यह पूरी व्यवस्था लोकतंत्र के नाम पर विडंबना बन जाएगी।
अब समय है कि वैश्विक मंचों पर अध्यक्षता, सदस्यता और मान्यता को केवल कूटनीतिक संतुलन नहीं, बल्कि नैतिक अधिपत्य के आधार पर तय किया जाए। क्योंकि आतंक की ज़मीन से शांति के बीज नहीं उगाए जा सकते।
जब तक संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन मूल्यबोध को केवल घोषणापत्रों तक सीमित रखेंगे, तब तक शांति की संरचना भी घोषणाओं की तरह ही खोखली होगी। इसलिए हमें पूछना ही होगा —क्या अब भी हम शांति का सच खोज रहे हैं, या उसकी एक राजनीतिक प्रतिकृति बनाकर दुनिया को दिखाने का नाटक कर रहे हैं?







