धरोहर
कुक्कुटी
कुक्कुट इस पक्षी का नाम,
जिसके माथे मुकुट ललाम।
निकट कुक्कुटी इसकी नार,
जिस पर इसका प्रेम अपार।
इनका था कुटुम परिवार,
किंतु कुक्कुटी पर सब भार।
कुक्कुट जी कुछ करें न काम,
चाहें बस अपना आराम।
चिंता सिर्फ इसकी को एक,
घर के धंधे करें अनेक।
नित्य कई एक अंडे देय,
रक्षित रक्खे उनको सेय।
जब अंडे बच्चे बन जाएँ,
पानी पीवें खाना खाएँ।
तब उनके हित परम प्रसन्न,
ढूंढे मृदु भोजन कण अन्न।
ज्यों ज्यों बच्चा बढ़ता जाय,
स्वच्छंदता सिखावे माय।
माँ जब उसे सिखा सब देय,
बच्चा सभी, आप कर लेय।
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उठो भई उठो
हुआ सवेरा जागो भैया,
खड़ी पुकारे प्यारी मैया।
हुआ उजाला छिप गए तारे,
उठो मेरे नयनों के तारे।
चिड़िया फुर-फुर फिरती डोलें,
चोंच खोलकर चों-चों बोलें।
मीठे बोल सुनावे मैना,
छोड़ो नींद, खोल दो नैना।
गंगाराम भगत यह तोता,
जाग पड़ा है, अब नहीं सोता।
राम-राम रट लगा रहा है,
सोते जग को जगा रहा है।
धूप आ गई, उठ तो प्यारे,
उठ-उठ मेरे राजदुलारे!
झटपट उठकर मुँह धुलवा लो,
आँखों में काजल डलवा लो।
कंघी से सिर को कढ़वा लो,
औ’ उजली धोती बँधवा लो।
सब बालक मिल साथ बैठकर,
दूध पियो खाने का खा लो।
हुआ सवेरा जागो भैया,
प्यारी माता लेय बलैया।
– श्रीधर पाठक