अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

बच्चों के बारे में

खलील जिब्रान की कविता On Children का हिंदी अनुवाद


तुम्हारे बच्चे
नहीं होते तुम्हारे बच्चे;
बल्कि वे संतानें हैं जीवेशणा की: जीवन की
अपने ख़ुद के प्रति लालसा की।
तुम ज़रिया रहे हो उनके इस दुनिया में आने का,
वजह नहीं!
और जबकि वे तुम्हारे ही पास हैं,
उन पर स्वामित्व नहीं है तुम्हारा।

तुम प्यार दे सकते हों उन्हें अपना, अपने विचार नहीं,
क्योंकि उनके पास हैं उनके खुद के विचार।
उनके शरीरों को आसरा देते हैं तुम्हारे घर,
उनकी आत्माओं को नहीं।
क्योंकि उनकी आत्माएं विचरती हैं
भविष्य के गृह में
जहाँ तुम जा नहीं सकते
अपने सपने में भी।

चाहो तो तुम कोशिश कर सकते हो उनकी तरह बन पाने की,
पर मत करो कोशिश उन्हें अपनी तरह बना पाने की कभी भी।
क्योंकि जीवन की गति होती है हमेशा आगे की ओर।
जीवन नहीं जाता कभी पीछे,
नहीं ठहरता कभी बीते हुए कल के साथ।

तुम हो वह धनुष
जिसकी प्रत्यञ्चा पर चढ़ाकर छोड़ा जायेगा
जीवित तुणीर-रुपी तुम्हारे बच्चों को।
धनुर्धर ने चिन्हित किया है-
असीम सूदूर में एक लक्ष्य-बिंदु।
वह खिंचेगा प्रत्यंचा अपनी पूरी ताकत से
कि तुणीर जा सके तेजी से खूब दूर।
कोशिश करो कि धनुर्धर के हाथों से
अपने धनुष-रुपी देह पर लगाई जाने वाली ताकत
को ही बना सको अपनी खुशी का सबब।
क्योंकि 'वह' -जिसे प्यार है
लक्ष्य पर जाने को उद्धत अपने तुणीर से,
उसे प्यार है उस धनुष से भी-
जो रहता है दृढ़ता से स्थिर।



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मूल कविता

Your children are not your children.
They are the sons and daughters of
Life's longing for itself.
They come through you,
But not from you.
And though they are
with you, yet they belong
Not to you!

You may give them
Your love, but not your thoughts
For they have their own thoughts.
You may house their bodies,
But not their souls​.
For their​ souls dwell in
The house of tomorrow,
Which you cannot visit,
Not even in your dreams.

You may strive to be like them​,
But seek not to make them like you!
For life goes not back​wards,
Nor does it tarry with yesterdays.

You are the bows ​from which
Your​ children
As living arrows are sent​ forth.
The archer sees​ the mark​ upon the
Path​ of the infinite.
And He bends you with His might
That his arrows may go swift and far.
Let your bending in the arch​er's hand
Be for gladness;
For even as He loves the arro​w that flies,
So He loves also the bow that is stable.


- राकेश कुमार

रचनाकार परिचय
राकेश कुमार

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