जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कवि सूरदास और ब्रजभाषा: अर्शिया रसूल


हिंदुस्तान आरंभ से ही भिन्न-भिन्न भाषाओं का मरकज़ रहा है। उत्तरी भारत की भाषा को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है कारण यह है कि इसका प्रयोग साहित्य में अत्यधिक होता रहा है। इन विभिन्न भाषाओं में एक भाषा ब्रजभाषा है।
‘‘लगभग 1000 वर्ष पूर्व शौरसेनी अपभ्रंश से ब्रजभाषा विकसित हुई थी। उस समय इसका क्षेत्र पर्याप्त व्यापक था, किन्तु आज मथुरा , आगरा , अलीगढ़, धौलपुर, एटा, मैनपुरी, बदायूॅ और बरेली जि़लों में यह भाषा एक बोली के रूप में सिमट कर रह गई। साहित्य और लोक साहित्य दोनों ही दृष्टियों से ब्रजभाषा बहुत संपन्न रही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि ब्रज क्षेत्र से बाहर भी ब्रजभाषा में श्रेष्ठ काव्य की रचना हुई है। सूरदास ,नंददास, रहीम, बिहारी, देव, रत्नाकर आदि ब्रजभाषा के प्रमुख कवि रहें हैं।‘‘1

ब्रजभाषा के अग्रदूत सूरदास जी का जन्म सन् 1478 में दिल्ली के पास सिही नामक ग्राम में हुआ था। निःसंदेह सूरदास जी ने ब्रज संस्कृति के संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चुकि दिल्ली के पास रहने, वहाँ पले बढ़ें जिसके कारण उन  पर वहाँ कि सभ्यता, संस्कृति, बोल-चाल का गहरा प्रभाव पड़ा। इसलिए उनकी लेखनी में ब्रजभाषा का प्रवेश होना स्वभाविक था। ब्रजभाषा को सुसज्जित करने ,उसे आगे बढ़ाने में सूरदास जी का विशिष्ट स्थान है। सूदराज जी ब्रजभाषा के संबंध में कहते हैं
‘‘हिंदवी बड़ी ही कोमल और स्वच्छ होती है। इसका संगीत मधुर और सरल है। इसमें मनुष्य की करूणा, नम्रता, तथा वेदना का सुंदर चित्रण होता है। यह ज़ाहिर है कि हिंदवी का मतलल ब्रजभाषा से ही है।‘‘2


सूरदास की तीन प्रसिद्ध प्रामाणिक रचनाएॅ ‘सूरसागर‘, ‘सूर-सारावली‘, ‘साहित्य लहरी‘ है जो ब्रजभाषा में लिखा गया है। ‘सूरसागर में लगभग सवा लाख पद बताए गए हैं। ब्रजलोक, ब्रज संस्कृति ,ब्रज के तत्व सूर की पदावलियों पर ही आधारित है। सूरदास जी ने श्री कृष्ण की वेश-भूषा ,उनके श्रृंगार आदि का वर्णन सूरदास जी ने जन्मांध होते हुए भी इतना सुंदर वर्णन किया है कि ब्रजभाषा सजी-धजी प्रतीत होती है जैसे उसमें निखार आ गया है। सूरदास के पद इस प्रकार दृष्टव्य हैं

देख श्याम अचानक जात।
ब्रज की खोरि अकेले निकसे, पीतांबर कटि पर फहरात।।
लटकत मुकट मटक भौंहनि को, चटकत चलतम मंद मुसकात।
पग द्वै जात बहुरि फिरि हेरत, नैन-सैन दे के नंद तात।।
निरखत जारि निविरह कर बिलखित भई, दुख-सुख व्याकुल झुरत सिहात।
सूरस्याम अंग-अंग माधुरी चमकि चमकि चक चैंधति गात।।3

सूरदास जी ने इसके अंतर्गत श्री कृष्ण की बाल लीला, रूप माधुरी, प्रेम, विरह वर्णन, गोपी-उद्धव संवाद आदि की चर्चा विस्तार से किया हैं। सूरसागर के अंतर्गत होली-खेल रूपक सृष्टि का वर्णन है और अंत में निकुंज लीला और संवत्सर लीला का मर्म प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ लीलापरक न होकर सिद्धांतपरक है।


‘साहित्य लहरी‘ दृष्टकूट पदों में रचा हुआ एक विशिष्ट ग्रंथ है। इसमें लगभग 117 पद हैं। इसके अंतर्गत नख-शिख, शिख सौंदर्य एवं नायक-नायिका भेद की पद्धति पर कृष्ण की मधुर रास लीला का अलंकारों के माध्यम से वर्णन किया गया है।
सूरदास जी ब्रजभाषा के अग्रदूत हैं जिन्होंने ब्रजभाषा को जो गौरव प्रदान किया ,उसका नतिजा यह हुआ कि ब्रज भाषा अपने युग में काव्य भाषा के पद पर आसीन हो सकी। उनकी भाषा में अलंकारिकता, सजीवता, सहजता, चित्रात्मकता, प्रतीकात्मकता तथा बिंबात्मकता पूर्ण रूप से विद्यमान है। सूरदास जी ने ब्रजभाषा को ग्रामीण स्थलों से उठाकर नगर और ग्राम तक भी ले गए। ब्रजभाषा ठेठ माधुरी यदि संस्कृत और अरबी -फारसी के शब्दों के साथ सजीव शैली में जीवित रही है तो यह अद्भूत शैली  केवल सूर की भाषा में ही दिखलाई पड़ती है। उनके काव्यों में भक्ति, प्रेम विरह आदि का भाव दिखलाई पड़ता है।

 
सूरदास की रचना में दो प्रकार की भक्ति मिलती है। एक सख्य संबंधी और दूसरी विनय संबंधी। बल्लभाचार्य द्वारा पुष्टि मार्ग में दीक्षित होने से पहले जब सूरदास गौघाट पर रहते थें तब उनका मन विचलित था तो वह उस समय दास्य भाव के पद बनाकर अपनी भक्ति भाव का परिचय दिया करते थें। वह स्वयं को पतित मानकर तथा प्रभु को पतितपावन मानकर अपने उद्धार की प्रार्थना करते थें। उनके पद इस प्रकार द्रष्टव्य हैं।

प्रभु हौं सब पतितन कौ टीकौ।
और पति सब द्यौस चारि के, हौं तो जनमत ही कौ।।‘‘4
वह भक्त कवि थें, किन्तु जीवन के प्रथम चरण में उन्होंने निर्गुण ब्रह्म की महिमा का गान किया है


नैननि निरखि स्याम स्वरूप
रहयौ घट-घट व्यापि सोई जोति रूप अनूप।।‘‘5
इन पदों में सूर ने माया का वर्णन भी ब्रहमा ज्ञानियों की शैली में किया है। सूरदास ने नवधा भक्ति के सभी रूपों का वर्णन किया है।


सूरदास जी वत्सल रस के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। सूर के वात्सल्य वर्णन में जो सर्वांगीणता और मार्मिकता मिलती है। सूर ने अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की बालसुलभ चेष्टाओं ,मनोहारी क्रियाओं , रमणीय बालक्रीडाओं का ऐसा हृदयहारी एवं प्रभावशाली वर्णन किया है जिसे पढ़कर हृदय उस ओर आकृष्ट हो जाता है। डाॅ हज़ारी प्रसाद द्विवेदी तो यहाँ कहते हैं कि
सूर ने यशोदा के बहाने अपने हृदय के उद्गारो को व्यक्त किया है।‘‘6

सूरदास जी ने कृष्ण क्रिड़ाएॅ उनकी भिन्न-भिन्न चेष्टाएॅ ,उनके अनुपम रूप , गोचरण लीला ,माखन चोरी आदि का बड़ा सुंदर चित्रण किया हैं। श्रीकृष्ण का आँगन में घुटने टेक कर चलना, बाल क्रिड़ा किलकारी मारना, मुँह में अंगुठा डालना आदि को देखकर यशोदा का हृदय वात्सल्य से ओत-प्रोत हो जाता है। कृष्ण को माखन बहुत पसंद था जब वह माखन चोरी करके खाते हैं तो गोपियाँ देख लेती हैं और उनकी माँ यशोदा से उनकी शिकायत करती हैं तो यशोदा का मातृ हृदय कृष्ण की शिकायत को कैसे स्वीकार करती वह कहती हैं
मेरौ गोपाल तनक सौ, कहा करि जानै दधि की चोरी।7

सूर के वात्सल्य का एक प्रसिद्ध उदाहरण इस प्रकार है-

जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलरावै, मल्हावै, जोई-सोइ कछु गावै।।‘‘8

 

सूरदास अपने साहित्य रचना के लिए अपने इष्टदेव की विहार भूमि ब्रज की भाषा अपनाया है। निःसंदेह कहा जा सकता है कि सूर ने केवल इसे अपने काव्य की भाषा ही नहीं बनाया, अपितु उसे साहित्यिक भाषा की प्रौढि़ तक पहुँचा दिया। सूरदास जैसे शखि़्सयत को पाकर ब्रजभाषा धन्य हो गया। डाॅ0 हरवंशलाल शर्मा लिखते हैं-
‘‘जो कोमलकान्त पदावली, भावाानुकूल शब्द चयन, सार्थक अलंकार योजना, धारावाही प्रवाह, संगीतात्मकता और सजीवता सूर की भाषा में है, उसे देखकर तो यही कहना पड़ता है कि सूर ने ही सर्वप्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया। ‘‘9
निःसंदेह सूरदास का ब्रजभाषा में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।






संदर्भ-

1. हर्षनंदिनी भाटिया, ब्रज संस्कृति और साहित्य, ज्ञान गंगा प्रकाशन,दिल्ली, पृ0173
2. वही पृ0 176
3. वही पृ0 179
4. डाॅ. रवेलचन्द आनन्द, प्राचीन प्रतिनिधि कवि, सूर्यभारती प्रकाशन,दिल्ली, पृ0 90
5. वही पृ0 90
6. वही पृ0 91
7. वही पृ0 92
8. वही पृ0 92
9. वही पृ0 94


- अर्शिया रसूल

रचनाकार परिचय
अर्शिया रसूल

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