जून 2015
अंक - 4 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी- सोशल डेथ

इस घटना को लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाऍ व्याप्त थीं। कोई दफ्तर के माहौल को लेकर चिन्ता जता रहा था तो कोई अन्य इसे मनोरंजन के रुप में लेकर चटकारे लेने में मगन था। कुछ ऐसे भी थे जो अभी भी इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं थे कि यहॉ सरेआम मारपीट हो सकती है। बात यह थी कि गर्मी के मौसम में पीने के लिए एक्वागार्ड की मशीन लगी हुई थी। वहीं पर भैंरोसिंह पानी लेने आया। ओमप्रकाश पहले से खड़ा होकर बोतल में पानी भर रहा था। पहले भरने के नाम पर दोनों में झगड़ा हुआ। कमरे में आकर एक बातूनी आदमी ने सूचना दी कि दफ्तर में ऐसा काण्ड हो गया है। बताने वाला ऑल इंडिया रेडियो कहा जाता था। इसलिए खबर की पु्ष्टि के लिए लोगों ने क्रॉस चेक किया। बात सच थी। दूसरे भी यही बता रहे थे। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में मेरी भू्मिका बस इतनी थी कि वहॉ से गुजर रहा था। इसलिए मैं एक चश्मदीद गवाह माना गया। मैंने देखा कि ओमप्रकाश अपने हाथ में चप्पल उठाए हुए था। हालॉकि इससे पहले भी बहुत कुछ हो गया था। ओमप्रकाश जमीन पर गिरा था या गिराया गया था। शायद एकाध हाथ भी उसे लगाया गया हो। यह सब मेरे आने से पूर्व हो चुका था।

   
दोनों के बीच हुई मारपीट में ओमप्रकाश को चोट आयी थी। भैंरोसिंह लम्बे कद का मजबूत इंसान था। अक्खड़ और घमंडी। दूसरा बेचारा ब़ूढा और दिल का मरीज। पहली नजर में मैं निष्कर्ष पर पहॅुच गया कि बदमाशी किसकी है। यह भैंरोसिंह कौन है ? एक महिला ने पूछा। अरे वही। ऑफिस का सबसे पुराना बाबू कहने लगा। ढ़ाढ़ी वाला। ड्राइवर है। पहले पार्लियामेंट ब्रांच में था। फिर सेक्रेटरी ऑफिस में काफी समय रहा। अभी डायरेक्टर बजट के साथ लगा हुआ था। इस जानकारी से अनभिज्ञ लोगों के मन में कोई धॅुधली सी आकृ्ति उभरी। खैर ! जो भी हो। मामला गंभीर था।


मैं उसे जानता था। हालॉकि ओमप्रकाश को नहीं जानता था। हो सकता है कि शक्ल से वाकिफ हॅू। पर नाम न जानता था। मेरे साथ भैंरोसिंह का वास्ता कुछ दफा पड़ा था। पूरे एक गज दूर से उसके मॅुह से बीड़ी की जली हुई बदबू आती थी। जब वह ओवरटाइम की फाइल पर मेरे दस्तखत लेने आता तो मैं कुर्सी पर बैठे-बैठे ही यथासंभव पीछे हो जाता। कामकाज करना नहीं और चाहिए सब कुछ। यदि कभी व्यस्तता की वजह से यह कह देता कि ठीक है रख दो देख लॅूगा तो वह मुझे घूरता हुआ चला जाता जैसे कह रहा हो कि हाथोंहाथ करने में क्या हर्ज है। खालाजी का घर है। सारे दिन गायब रहेगें और शाम में बैठकर दारु की महफिल सजाएगें। फिर ऊपर से ओवरटाइम के पैसे चाहिए। गनीमत थी कि वहॉ से मेरा ट्रान्सफर हो गया।


दरअसल भैंरोसिंह दफ्तर से थोड़ी दूर पर स्थित सरकारी कॉलोनी में रह्ता था। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों वाले ब्लाोकों में से एक में उसका बसेरा था। उसके ठीक ऊपर नरेश भी था। वह चपरासी थे। दोनों पहले दिहाड़ी मजदूर रह चुके थे। काफी पापड़ बेलने के बाद रेगुलर हुए। मैं नरेश को जानता था क्योंकि शुरु में उसके क्वार्टर में कुछ समय किराए पर रहा था। बात काफी पहले की थी। बजाज साहब से उसके अच्छे संबंध थे। सेक्रेटरी ऑफिस में भी वह उनके साथ था।
बजाज साहब का खास आदमी है। राजकुमार कह रहा था। अफसरों के बीच हमेशा इसकी पैठ रही है। फिर तो इसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। एक आम प्रतिक्रिया उभरी। कुछ नहीं ? अजी साहब जाति को लेकर गाली देने का आरोप है इस पर। ऐसे कैसे छूट जाएगा। इतना आसान नहीं है। भिगोया,धोया और हो गया। कोई मामूली मारपीट हो ती तो बात और थी। यहॉ तो कई धाराऍ हैं। राजकुमार पहले भैंरोसिंह के साथ एक ही ब्रांच में था। सुना था कि किसी बात पर दोनों में अनबन हो गयी थी। उसकी बातों से पुरानी खुन्दक प्रकट हो रही थी।


जो भी हो। ओमप्रकाश ने लिखित शिकायत दर्ज करायी थी। भैंरोसिंह ने पहले उसके साथ मारपीट की फिर उसे जातिसूचक गालियॉ दी। स्पष्ट था कि एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते वह परेशानी में पड़ेगा। गाली वगैरह का तो मैं नहीं जानता लेकिन इतना पता था कि आदमी बदतमी है। अब दिमाग ठिकाने आएगा। आज से बीस-बाईस साल पहले वह सरकारी दफ्तर में आया था। बहुत से और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तरह वह दिल्ली से काफी दूर से आता था। हरियाणा में झज्जर में अपना पुश्तैनी घर,खेत-खलिहान,गाय,बैल,भैंस सभी थे। गॉव में एक रुतबा था। पूरा कुटुम्ब भी था। आसपास रिश्तेदारी थी। एक नेह-अपनेपन का फैलाव था। शुरु में वह वहीं से रोजाना दिल्ली आता था। कभी-कभार करोलबाग में अपने किसी पहचान के आदमी के यहॉ रुक जाता। ऐसा तब होता था जब ऑफिस में देर तक बैठना पड़ता। यहॉ से चलने वाली ट्रेनें रेगुलर यात्रियों के लिए सर्वोत्तम विकल्प थीं।
कालान्तर में उसे गोल मार्केट में सरकारी र्क्वाटर मिल गया। वह भी बारी से काफी पहले। इसमें बजाज साहब की सराहनीय भू्मिका थी। मिनिस्टर से लेटर लिखवा दिया था। लोग बताते हैं कि तबसे भैंरोसिंह उनका मुरीद था। सच्चाई यह थी ऊॅचे सम्पर्क होने 
का फायदा उसने काफी उठाया था। कईयों को बाद में इस डिपार्टमेंट में काम पर लगवाया था। कुछ उसके इलाके के थे। कुछेक दिल्ली के भी। सद्भावना-समर्थन का एक घेरा विभाग में उसके साथ रहता था। आदमी बड़ा जुगाडू है। घेरे से बाहर वालों की टिप्पणी थी। काम निकालना,बनाना खूब आता है। लेकिन निष्पक्ष द्दष्टि रखने वाले पर्यवेक्षकों का मानना था कि चॅू्कि डिपार्टमेंट में उसका किसी से झगड़ा नहीं है इसलिए आदमी मूलत: शरीफ है।


बजाज साहब मिनिस्टर के पी.एस.थे। हर पी.एस. की तरह न केवल बेह्द चाक-चौकन्ने बल्कि सभी काम के लोगों से उनका रैपो भी बहुत अच्छा था। वाणी में मिठास और दिमाग सदैव सक्रिय। आदमी पह्चानना कोई उनसे सीखे। आखिर कुछ सोचकर ही उन्होंने भैरोसिंह को कृपापात्र बनाया होगा। राजकुमार आज भी कहता फिरता था। यार चमचागिरी को आर्ट के रुप के तौर पर रिकॉगनिशन मिलनी चाहिए। यह एक कला है बंधु। हमारी गलती है जो इसे बुरी चीज समझते थे।
बुरी कहॉ है। बड़े काम की चीज है। लोग-बाग चुटकी लेते। इसपर वह जरा तमक कर बोला। यार तभी तो भैंरोसिंह उन्नीस साल से एक ही जग
 जमा हुआ है। मिनिस्टर भी उससे पूछ कर कुर्सी पर बैठता है। और एक हम है जिसका हर साल तबादला हो जाता है।


''लेकिन राजकुमार जी उस बन्दे में कुछ तो क्वालिटी होगी।'' नाथ ने अपना मत प्रकट किया। ''तुम भी अफसर-मिनिस्टर को  कब तक देख कर हमेशा ज्रुडवा बच्चों की तरह हाथ जोड़े रहेगो तो इसे तुम्हा री क्वालिटी मानी जाएगी।'' वह झल्लाया। उसके मुखड़े पर व्याप्त भावों का मजमें में बैठे प्रत्येक व्यक्ति ने आनन्द उठाया। कुछ देर तक यह गपशप चलता रहा। राजकुमार ही ज्यादा बोल रहा था। लेकिन काम के दबाव में या विषय के संतृप्त होकर  बेस्वाद हो जाने बाद लोग धीरे-धीरे किनारा करने लगें। आखिर वह अकेला कब तक लो दही-दो दही करता रह्ता। वह भी औरों की तरह खिसका। डिपार्टमेंट का राजनीतिक समीकरण पिछले कई वर्षो से एक जैसा चल रहा था। ऊपर के स्तर पर भी और मिडिल तथा नीचे के लेबल पर भी। दबदबा बजाज साहब, शर्मा एण्ड कम्पनी तथा भैंरोसिंह के यारों-प्यारों का था। कुछ लोग इससे खफा होकर अपने को विपक्ष में मह्सूस करते थे। पता नहीं अपनी सरकार कब आएगी। बजाह साहब का अगले साल रिटायरमेंट था। फिर यह गुट टूट भी सकता था। तब कुछ हो सकता था। पूरा माहौल खराब है। लोग टिप्पणी करते। शायद बोरियत दूर करने के लिए यॅू ही की गयी एक निर्दोष टिप्पणी। या फिर इसमें थोड़ी बहुत सच्चाई भी हो सकती है। नाथ कहता कि यहॉ तो बस यह दुआ करते रहो कि रोज सूरज निकलता रहे और जिन्दगी चलती रहे। सरकार बाबूओं की फौज कम करना चाहती है। शायद रिट्रेन्चमेन्ट हो। कम से कम नयी भर्ती तो नहीं ही होगी।

 
बजाज साहब से मेरा मिलना-जुलना था। मैं सरकारी काम को लेकर उनके कमरे में पहॅुचा। अपने यहॉ फैक्स नहीं था। एक जरुरी लेटर फैक्स करवाना था। उनके पास यह सु्विधा थी। और किसी जगह जाओ तो वहॉ पचास तरह के सवाल करते। यहॉ कम से कम ऐसा नहीं था। ''आओ भाई।'' वे मुझे देखकर मुस्कराए। काम पूरा होने के बाद भी मैं बैठा रहा। बातें होने लगीं। शायद वे थोड़ा खाली थें। चाय मॅगवायी। मैंने भैंरोसिंह का जिक्र किया। ''सर जो भी हुआ अच्छा नहीं था। ऑफिस में यह सब ठीक नहीं है।'' वे गम्भीर हो गए। ''तुम शायद इस बन्दे के बारे में ज्यादा नहीं जानते। मैं उसे सत्रह-अठारह साल से जानता हॅू। एक बार की बात है। कनॉट प्लेस में रीगल के पास मैं किसी काम से गया था। सड़क पार करते वक्त न जाने किधर से एक वैन आयी और मुझे टक्कर मार कर रफ्तार से निकल गयी। मैं सड़क पर लहू-लुहान पड़ा था। होश में था लेकिन बेहोशी छाती जा रही थी। लोग जमा हो गए। लेकिन मदद करने वाले नजर नहीं आ रहे थे। मेरे पर्स में कुछ रुपए भी थे। डर था कि कोई साफ न कर दे। भई हर तरह के लोग होते हैं। तभी यह बन्दा भैंरोसिंह प्रकट हुआ। एक ऑटो में लाद कर राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल ले गया। मेरे पैर की दो हड्डियॉ टूट गयी थीं।''
मैं गौर से सुन रह्थे था।''अच्छा !''

 

''हॉ..'' चाय पीने का इशारा करते हुए उन्होंने भी कप उठा लिया। लगता था कि उठने में महीनों लग जाएगें। लेकिन भगवान का शुक्र था कि उम्मीद से पहले दफ्तर में हाजिर हो गया। मैं तो यार इस आदमी का कायल हो गया।'' तो यह बात है। मुझे विचारमग्न देखकर वे आगे बोले,''इसका स्वभाव ऐसा ही है। बातों में मत जाओ। अपनी दास्तान खुद बताता है। औरों के लिए कूद पड़ना इसके लिए कोई नयी बात नहीं है। बताता है कि इसके तरफ यानि कि झज्जर में एक साइकिल सवार को टक्कर मार कर बाइक वाला भाग रहा था। यह भी पीछे से अपनी साइकिल से आ रहा था। ऑधी की तरह भाग कर गया और अपनी साइकिल बाइक वाले के सामने गिरा दी। उससे हरजाना दिलवाया। वरना हिट एण्ड रन केस में होता ही क्या है।''


''तभी आप भैंरोसिंह के प्रेमियों में हैं।'' मैंने हॅसकर कहा। उनके कमरे में रोज चाय मॅगायी जाती है। केंटीन वगैरह से आती होगी। लेकिन भैंरोसिंह रोज सुबह उनकी टेबल पर चाय रख देता था। पैसे भी नहीं लेता है। बाकी चपरासी तो बख्शीश की होड़ लगाते हैं। लोग देखते हैं और यह समझते हैं कि चमचागिरी कर रहा है या फिर चाय वाले के साथ उसकी सेटिंग है।
मैं निश्चय नहीं कर पाया कि उनका उससे कोई रागात्मक सम्ब न्ध है या विभाग की राजनीति में वे एक ही गुट के सदस्य थे। ओमप्रकाश को चप्पल उठाए तो मैंने साफ देखा था।

ओमप्रकाश की शिकायत लिखित तौर पर फाइल में आ चुकी थी। उसने भैंरोसिंह पर जातिसूचक अपशब्दों  के प्रयोग का आरोप लगाया था। प्रशासन के  अधिकारी ने कुछ भी निर्णय लेने से पहले मुझे बुलाया था। आखिर मैं घटनास्थल का चश्मदीद गवाह था। मेरे मन में वे सारी बातें चलचित्रों की भॉति घूम रही थी जब भैंरोसिंह अपनी अवज्ञाकारी हरकतों से हर नियम कानून की बेखौफ धज्जी उड़ाया करता था। कभी तो ऊॅट पहाड़ के नीचे आएगा। ड्यूटी के समय ताश की महफिल जमाना और उल्टा जवाब देना। ड्राइवरों के रुम में बीड़ी की तेज गंध व्याप्त रह्ती। कालीन या कम्बल के नीचे पड़ी शराब की बोतल से आती महक भी साथ में घुली होती। कोई किसी ड्राइवर को बुलाने जाता तो वह उसपर कोई ध्यान नहीं देता। दो-चार बार आवाज लगाने पर रुखाई से आता हॅू कहता। इस पर भी यदि दुबारा कहने का दुस्साह्स करता तो ड्राइवर गण उसकी इज्जत ताक पर उठाकर रख देता। अबे तुझे कहा ना आता हॅू। तसल्ली नहीं कर सकता। आदमी खिसियानी हॅसी के साथ खुद ही दरवाजे से बाहर हो जाता। मानो यह स्वीकार कर रहा हो कि उसका अपमान उसकी सहमति से ही हुआ है। मैं भी एकाध बार ऐसी हालत से गुजरा था। इसलिए ये लोग मुझे नापसंद थे। अब इसे क्या कहा जाए। ओमप्रकाश भी भैंरोसिंह के साथ महफिल जमाता था। सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे थे। इन लोगों का क्या भरोसा।


राजकुमार ने आज लंच के समय बताया कि भैंरोसिंह ताल ठोक कर कह रहा था कि आजकल कॉरीडोर में मजे लेने वाले छत्तींस मिल रहे हैं। जिसे देखो वही उस बात को किसी न किसी बहाने उठा रहा है। मैं अकेले सब से निबट सकता हॅू। कोई आए तो सामने।
मैं किसी फैसले पर पहॅुच चुका था। गलत आदमी का साथ नहीं दॅूगा। अपने कमरे में बैठा फाइलों से कुछ घंटे माथापच्ची करने के पश्चात् आज का काम लगभग समाप्त कर चुका था। घड़ी की तरफ देखा। जाने का समय हो गया था। कई दिनों बाद सही वक्त पर घर जाने का मौका मिला था। वरना अक्सर लेट हो जाता था। पेन बंद किया ही था कि किसी के पदचाप की ध्वनि सुनी। नजर उठायी तो पाया कि भैंरोसिंह खड़ा था। मुझे अच्छा नहीं लगा। ''क्या बात है?'' पूछते हुए लगा कि पता नहीं क्यों आया है और कितना वक्त लेगा। ''साहब आपसे कुछ बात करनी है।'' आज उसके चेहरे पर विनम्रता के भाव थे। मैं समझ सकता था। अपना काम पड़ने पर गधा भी बाप नजर आता है। अपने मुख पर गंभीरता और जल्दी के चिन्है ज्यादा  से ज्यादा मात्रा में बटोर कर मैंने कहा,''हॉ बोलो।''


वह खड़ा रहा। ''साहब मैं बुरा आदमी नहीं हॅू। मुझे लोग चाहे जो भी समझे वो बात सही नहीं है।''
'' कौन सी बात ?'' मैंने अनुमान पर कुछ भी न छोड़कर पूछा।
''यही कि मैंने उसे जाति को लेकर कुछ कहा।..।'' कुछ पल के लिए वह रुका। वह असमंजस में नहीं था। लेकिन बात कैसे शुरु करे शायद यह सोच रहा था। ''साहब हम दोनों हम निवाला हैं। साथ बैठकर खाते-पीते हैं। दारु पीना हो या हॅसी ठिठोली। सब साथ होता है। मेरा किसी से कोई पहली बार झगड़ा नहीं हुआ है। ताश की बाजी के वक्त पता नहीं कितनी बार हम आपस में लड़े-झगड़े हैं। हजूर एक दूसरे का कॉलर तक पकड़ा है। लेकिन एकाध दिन बाद फिर वही सब..। इस बार पहली दफा यह बात हुई है कि झगड़े के बाद हमारी बोलचाल बंद हो गयी। और तो छोडि़ए। सभी साथी दो पार्टी में हो गए हैं। एक हमसे बात नहीं करता। आपस में सलाह करते हैं। मैंने सुना है कि मेरे खिलाफ योजना बना रहे हैं।'' वह कहते-कहते थमा।


फिर शुरु हुआ। ''वैसे मुझे किसी का डर नहीं। लेकिन जो आपस की मुहब्बत थी वह खत्म हो गयी। बस गम सिर्फ इतना है।'' वह ऊपर से संयत दिखने का प्रयास कर रहा था। परंतु मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसका कंठ अवरुद्ध हो गया है। मैंने इस अवसर पर अपनी सभ्यता दिखाते हुए कहा, ''भई आप बैठ कर बात कीजिए।''
वह कुर्सी पर बैठ गया। अपेक्षाकृत धीमे स्वर में बोला,''साहब मैं गॉव का आदमी हॅू। मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है। मकान है। जमीन-जायदाद सब कुछ है। आप विश्वास नहीं करेगें। हमारे यहॉ होण्डा सिटी कार भी है। चार औलाद हैं। सबके सब अपनी जगह सेटेल हैं। सबको मैंने इसी कमाई पर कमाया है। खुद भी पढ़ा हॅू। मैट्रिक हॅू। मानता हॅू कि गिल्ली-डंडा के चक्कर में आगे नहीं बढ़ा। लेकिन जानता सब हॅू। बस अंग्रेजी नहीं मालूम।''


मैं खामोशी से उसकी बातें सुन रहा था। शुरु में लगा कि कहॉ से आ गया पर अब रस आने लगा। ''ऐसे मंजर न जाने कितने देखे हैं। यह जिंदगी ऐसे नहीं बीती।'' वह भावविह्वल था। ''आप चाहे न यकीन करें..हम करोड़पति हैं। झूठ नहीं बोलूगॉ। दफ्तर में काम करने का यह मतलब नहीं कि हम दो कौड़ी के हैं। आप लोगों की दया से हमारे बच्चे सही जगह पर पहॅुच गए हैं। छोटी वाली बिटिया सुबह सात बजे क्लास करने जाती है। फिर शाम को भी नौ बजे तक क्लास अटैण्ड करती है। उसकी देखभाल,लाना-ले जाना सब करता हॅू। लड़के को परसों पेचिश जैसा कुछ हो गया था। घर में दवा नहीं थी। शाम को गोली लेकर आया। जब सुबह वह जल्दी में भूल कर चला गया तो बस स्टैण्ड पर जाकर उसे दिया। ह्जूर मैं बुरा आदमी नहीं हॅू।'' यह दिखाकर कि वह अपने पारिवारिक दायित्वों को वह कितनी गंभीरता से निभा रहा है, मुझे आश्वस्त कराना चाहता था कि वह एक कायदे का इंसान है।

 
उसने मेरे कुछ कहने के पूर्व स्वयं ही घड़ी की ओर देखा और कहा,''आपका काफी समय लिया। अब चलता हॅू।'' जाते हुए उसने अपने पक्ष में कुछ गवाही देने के बारे में कुछ नहीं कहा। दरवाजे तक पहॅुच कर न जाने किस प्रेरणा से बोल पड़ा। ''अपने ही यार-दोस्त मुझसे चार दिन से  बोल नहीं रहे हैं। लड़ाई एक से हुई है। सीन थोड़ा सा आपने देखा था। बाकी लोगों ने न कुछ देखा न समझा। बस उठना-बैठना बंद कर दिया। यह मैं झेल न पाऊगॉ।'' उसके चेहरे पर एक अव्यक्त दर्द धुंध की तरह लिपटा हुआ था। शायद भैंरोसिंह जिस पृष्ठभू्मि से आया था वहॉ लड़ाई-झगड़े के बाद भी कोई दुश्मन नहीं बनता। पराया नहीं होता। हर किसी का एक-दूसरे पर अधिकार होता है।       
मैं उसके जाने के बाद ऑफिस के वर्तमान परिपेक्ष्य में कोई ठीक सा निर्णय लेने पर विचार करने लगा। इंसान बुरा नहीं है। वह मुझे उस दर्द के प्रति मन में उपजी मानवीय संवेदना तथा ऑफिस के समीकरणों को बदलने की पुरानी योजना के बीच उलझने के लिए अकेला छोड़ गया था। इंसान बुरा नहीं है। ऐसा भाव मेरे मन में बारिश के बीच बिजली की तरह आया। लेकिन योजना में यह कहा फिट होता है यह देखना था। आखिर अच्छे विचार कंकड़ की तरह पानी में डूब जाते हैं। यहॉ सब कुछ अवसरानुकूल होता है। लाभ-हानि का गणित अनिवार्य रुप से उसमें अन्तर्निहित रहता है।


- मनीष कुमार सिंह

रचनाकार परिचय
मनीष कुमार सिंह

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कथा-कुसुम (2)