मई 2017
अंक - 26 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

हिन्दी सिनेमा में पारिवारिक मूल्य: निर्मल सुवासिया


सिनेमा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। आज हर विषय पर फिल्में बन रही हैं। हर तरह का दर्शक वर्ग उसे देख रहा है और प्रतिक्रिया दे रहा है। ज्वलंत समस्याओ पर आज फिल्मी मीडिया जितना मुखर हुआ है, उतना पहले कभी नहीं रहा। आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता भी भरपूर परोसी जा रही है। गीतो में से भावुकता, सार्थकता और संवेदना गायब हो चुकी है। संचार क्रांति ने जहाँ आधुनिकता को घरों तक पहुंचाया है, वहाँ आग में घी का काम फिल्मी मीडिया भी कर रहा हैं। पारिवारिक फिल्मों का दौर लगभग समाप्त हो गया है। प्रतिदिन रिलीज होती फिल्मों के 100 गानो में से एक दो ही ऐसे होते हैं, जिसे एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ देख सकता है। सिनेमा मनोरंजन का ऐसा साधन माना जाता है, जिसमें पूरा परिवार एक साथ बैठकर फिल्म देख सके। हिन्दी सिनेमा में सूरज बड़जात्या, करण जौहर, आदित्य चोपड़ा, रवि चोपड़ा आदि निर्माता निर्देशक संस्कारों, मूल्यों, प्रेम और परंपरागत फिल्मों का समय समय पर निर्माण करते रहे हैं। पर हाल के कुछ वर्षो में स्थिति बदल रही है और निर्माता निर्देशकों का पारिवारिक फिल्मों से मोह भंग हो गया है। इससे फिल्मी स्क्रीन से फेमिलियर फिल्में गायब होने लगी हैं।

पारिवारिक मूल्यों को स्थापित करने वाली फिल्मों में मैं सबसे पहले विवाह फिल्म को लेना चाहूँगा। विवाह फिल्म में सगाई से लेकर शादी तक की कहानी पटकथा के रूप में है। लेकिन कहानी में आपसी प्यार, सोहार्द, संयुक्त परिवार की महत्ता, जिम्मेदारी का सामना, संस्कार और परम्पराओं का निर्वाह आदि नैतिक गुणों की स्थापना कर दर्शकों को सोचने पर विवश कर दिया है कि आधुनिकता के इस दौर में ये मूल्य इंसान भूल गया है। कृष्णकान्त मधुपुर गाँव का फ़लों का व्यापारी है। उसका एक ही सपना है, अपने स्वर्गवासी बड़े भाई की बेटी पूनम का विवाह सम्पन्न और संस्कारी परिवार में करना, जहाँ उसके गुणों और मूल्यों का सम्मान हो। पूनम द्वारा अपने बाबूजी की सेवा करना, मेहमानों की आवभगत करना, पूजा अर्चना करना, दोनों बहनों के बीच असीम प्यार और स्नेह फिल्म की कहानी के आधार तत्व हैं। इन संस्कारों की आज के युवाओं में कमी है। फिल्म में दूसरी ओर हरिश्चंद्रजी दिल्ली शहर के एक समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके दो पुत्र हैं, जिनमें एक की शादी हो चुकी है। इनकी पत्नी बरसों पहले स्वर्ग सिधार गयी। दोनों बच्चे पिता की छत्रछाया में ही पले बढ़े। परिवार छोटा है लेकिन स्नेह भरा पूरा है। ये सब साथ बैठकर नाश्ता करते हैं और इसी में खुशियों की तलाश करते हैं क्योकि हरिश्चंद्रजी का मानना है कि बहू व बेटे न हो तो घर सूना-सूना हो जाता हैं। हरिश्चंद्रजी के घर पूनम का रिश्ता आता है। शहरीकरण के युग में गाँव से आया रिश्ता हरिश्चंद्रजी सहर्ष स्वीकार करते हैं। हरिश्चंद्रजी जानते है कि जींस-टी शर्ट, रेस्टोरेण्ट आदि भौतिक सुख सुविधाएं रिश्तों से बढ़कर नहीं हैं। वे अपने युवा पुत्र प्रेम से शादी के बारे में निःसंकोच बात करते हैं, उसकी पसंद-नापसंद के बारे में पूछते हैं। बेटा कम उम्र बताकर बाद में विवाह की बात कहता है। पिता अपने अनुभव बेटे के साथ शेयर करते हैं और बताते हैं कि शादी का अर्थ होता है विश्वास, ईमानदारी और सच्चाई। बीवी प्रेरणा बनकर पति की ज़िंदगी में आती है। वह पति के दुख आधे और खुशियाँ दुगुनी कर देती हैं और यही उम्र होती है, जब रिश्तों की जड़ें मजबूत होती हैं। लव मैरिज और पिता की मर्जी के बिना शादी करने वाले युवाओं से परे प्रेम अपने पिता की बात स्वीकार करता है। इस शादी से पहले पूनम और प्रेम के घरवाले एक दूसरे के यहाँ आते-जाते हैं और सुख-दुख में शरीक होते हैं, ताकि वे एक-दूसरे को जान सके और मेल-जोल बढ़ा सके। इसी मेलजोल में पूनम और प्रेम भी मुलाकात करते हैं। प्रेम बिना छुपाए पूनम को अपने अतीत के बारे में बताता है। पूनम के संस्कार उसे अपने भावी पति में बाबूजी की तस्वीर दिखाते हैं। वर्तमान में जबकि दहेज की घटनाएं आए दिन होती हैं फिल्म एक सीख दे जाती है क्योंकि हरिश्चंद्रजी नारियल और सवा रूपया देकर रिश्ता पक्का कर देते हैं। पूनम की आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी उसके ससुर लेते हैं। घर में पूनम की शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। शादी के दिन पूनम अपनी माँ की यादों में खो जाती है और घर में कब एक पटाखे से आग लग जाती है, उसे पता ही नहीं चलता। छोटी बहन को बचाने के प्रयास में पूनम का पूरा शरीर जल जाता है। हरिश्चंद्रजी और प्रेम यह सब जानकर होने वाली बहू की सहायता के लिए अस्पताल पहुँच जाते हैं। हैरानी तो तब होती है जब प्रेम जिंदगी और मौत से लड़ रही पूनम को अस्पताल में ही अपनी अर्द्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लेता है। उसे शारीरिक सौन्दर्य से कुछ लेना-देना नहीं है, भावनात्मक सौंदर्य का पुजारी प्रेम आग में झुलसी पूनम को अपना लेता है। वह उसके सारे दर्द खुद कबूल कर लेता है।
कहानी में पूनम की चाची को बुरे किरदार में दिखाया गया है। लेकिन पूनम को अस्पताल में छोटी बहन के लिए चिंतित देखकर उनका भी हृदय परिवर्तित हो जाता है। इस तरह फिल्म रिश्तो की अहमियत प्रकट करती है।


'हम साथ साथ है' फिल्म भी पारिवारिक फिल्मों की श्रेणी में अग्रणी है। फिल्म में रामकिशन एक सम्मानित और धनी उद्योगपति हैं। उनका परिवार आधुनिक होते हुए भी परंपरागत एकता तथा परस्पर प्रेम का अनूठा उदाहरण है। उनके तीन बेटे- विवेक, प्रेम, विनोद और एक बेटी संगीता है। रामकिशन तीनों बेटो और पत्नी ममता के साथ एक संयुक्त परिवार में रहते हैं। विवेक उनकी दिवंगत पत्नी का पुत्र है। उसे उसकी सौतेली माता ममता, जो रामकिशन की दूसरी पत्नी है, ने पाला है। ममता प्रेम, संगीता और विनोद की सगी माता है। किन्तु वह विवेक को भी उतना ही प्यार देती है जितना अपनी संतानों को। बचपन की एक दुर्घटना में विवेक अपने भाइयों को बचाते हुए एक हाथ से विकलांग हो गया था। इस कारण उसके लिए योग्य वधू मिलने में कठिनाई होती है।
रामकिशन और ममता के विवाह की रजत जयंती पर एक भव्य समारोह का आयोजन होता है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य, बंधु-बांधव और परिचित लोग सम्मिलित होते हैं। इसमें आदर्श बाबू नाम के एक उद्योगपति अपनी इकलौती बेटी साधना के साथ आते हैं। विदेश में पली हुई बिन माँ की बेटी साधना रामकिशन के संयुक्त परिवार की एकता और संस्कारयुक्त जीवनशैली से प्रभावित हो जाती है। अगले ही दिन आदर्श बाबू रामकिशन और ममता के आगे साधना और विवेक के विवाह का प्रस्ताव रखते हैं, जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता है। विवेक को चिंता होती है कि साधना उसकी विकलांगता के साथ पूरे जीवन समझौता नहीं कर पाएगी, किन्तु साधना का अडिग निश्चय विवेक का संशय मिटा देता है। धूमधाम से दोनों का विवाह सम्पन्न हो जाता है। इसी समारोह के अगले दिन प्रेम और प्रीति की गुरुजनों की सहमति से सगाई कर दी जाती है।


कुछ दिनों बाद विवेक-साधना, प्रेम-प्रीति, संगीता-आनंद, विनोद, राजू, बबलू और राधिका अपने पैतृक गाँव रामपुर में छुट्टी मनाने जाते हैं। सपना जो अपने पिता और दादी के साथ वहीं रहती है, उन सबका स्वागत सत्कार करती है। हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती के बीच विनोद और सपना का परस्पर आकर्षण सबके सामने आ जाता है। बहुत उल्लास के साथ उन दोनों की सगाई भी कर दी जाती है। अब रामकिशन यह निर्णय करते हैं कि व्यापार की बागडोर बेटों को सौंपकर वह काम से अवकाश ग्रहण कर लेंगे। वह ज्येष्ठ पुत्र विवेक को मैनेजिंग डायरेक्टर बनाने की अनौपचारिक घोषणा कर देते हैं। इस बात से सभी खुश होते हैं, पर सपना के पिता धर्मराज को यह अच्छा नहीं लगता। वह नहीं चाहते कि उनका भावी दामाद विनोद अपने ज्येष्ठ भ्राता विवेक के अधीन रहे। वह ममता को अपने पक्ष में करते हैं और इस काम में उसकी मदद ममता की तीन सहेलियाँ भी करती हैं। वे सब मिलकर ममता को समझाते हैं कि उसे रामकिशन से कहकर घर और व्यापार का तीनों बेटों में बराबर बंटवारा करवा देना चाहिए। यदि ऐसा न हुआ तो बाद में बेटों और बहुओं में तनाव और मतभेद पनपने लगेंगे। वे ममता से यह भी कहते है कि सौतेला होने के नाते विवेक अपने छोटे भाईयों के साथ अन्याय करेगा। ममता अपनी सहेलियों और धर्मदास की बातो में आ जाती है। वह रामकिशन से मांग करती है कि विवेक को सर्वोच्च पद ना देकर वह जायदाद का तीनों बेटों में बराबर बंटवारा कर दे। रामकिशन बंटवारे की मांग को ठुकरा देते हैं और अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास करते हैं। साधना यह सब बातें सुन लेती हैं और बंगलौर से लौटने पर विवेक को बता देती है। विवेक तत्काल निर्णय करता है कि वह मैनेजिंग डायरेक्टर का पद प्रेम को दिलवा देगा और स्वयं साधना के साथ रामपुर में रहेगा, जिससे ममता की आशंका निर्मूल हो जाये। यह सुनकर विनोद भी विवेक और साधना के साथ जाने का निश्चय कर लेता है। प्रेम विदेश में होने के कारण इन बातों से अनजान रहता है। प्रेम विदेश से लौटकर आता है तो विवेक को वापस ले जाने का प्रयास करता है। विवेक के मना कर देने पर प्रेम अनिच्छा से मैनेजिंग डाइरेक्टर बन जाता है परंतु वह उस पद को बड़े भाई विवेक की धरोहर और स्वयं को उनका प्रतिनिधि मानकर चलता है। वह ममता के आगे संकल्प लेता है कि विवेक और साधना का महत्व यथास्थान बना रहेगा और उनके घर लौटने तक वह शादी भी नहीं करेगा। वह कहता है कि सौतेलापन विवेक के मन में न होकर स्वयं ममता के मन में है। ममता यह सब सुनकर अवाक रह जाती है।

समय बीतने पर अनुराग को व्यापार में हानि होने लगती है। घर में संगीता और राधिका के न होने से राजू और बबलू बीमार हो जाते हैं तब अनुराग को अपनी भूल का पछतावा होने लगता है। संगीता और आनंद राधिका को लेकर लौट आते हैं। अनुराग उनसे माफी मांगता है और उनका बिखरा परिवार फिर से एक हो जाता है। यह जानकर ममता को भी अपनी गलती पर बहुत पछतावा होता है। वह अपने पति से क्षमा प्रार्थना करती है। और विवेक-साधना को घर लाने के लिए रामपुर चल देती है। रामपुर में साधना को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है। रामकिशन का परिवार फिर से साथ-साथ आ जाता है। इसके बाद प्रेम-प्रीति, विनोद-सपना विवाह कर लेते हैं। धर्मराज अपनी भूल स्वीकार करते हैं। सबकी शुभकामनाओं के साथ विवेक मैनेजिंग डायरेक्टर का पद ग्रहण करता है। इस तरह  ‘रामायण’ की प्रेरणा से निर्मित फिल्म भावना के उत्कर्ष पर पहुँचती है और दर्शक वर्ग में अपना अलग मुकाम हासिल करती है।

इसी प्रकार 'बागबां' फिल्म भी पारिवारिक मूल्यों को स्थापित करने वाली फिल्मों की श्रेणी में आती है। अपने बच्चों पर अपना सबकुछ लुटाकर, उनको यथासंभव जीवनोपयोगी हर सुख-सुविधा प्रदान करने वाले माता- पिता का उत्तरदायित्व संभालने की बारी जब उन बच्चों पर आती है तो उनको किस प्रकार अपने यही माता-पिता बोझ लगने लगते हैं। इसी सर्वकालिक सत्य को आधार बनाकर रवि चोपड़ा ने इस फिल्म का निर्देशन किया है। फिल्म में एक तरफ सगे बेटों के लिए अपने माता-पिता केवल पैसा उगलने वाली मशीनें हैं तो दूसरी ओर अनाथ युवक आलोक के लिए अपने पालनहार बाबूजी भगवान के समान हैं। वह उसकी पूजा करता है। उन्होंने ही आलोक को सड़क से उठाकर काबिल इंसान बनाया। फिल्म बागबां एक ऐसे दंपति की कहानी है, जिनके दाम्पत्य के 40 वर्ष बीतने के बाद भी उनमें प्यार जवान है। प्यार ही तो वह जादू है जो उम्र भर जवान रखता है। फिल्म में पिता को बागबां के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने बच्चों को पौधों की तरह सींचता है। राज अपने बच्चों की खुशियों के लिए कुछ भी कर सकता है। लेकिन बेटे केवल पैसे पाने के लिए अपने पिता से प्रेम करते हैं। सेवानिवृति के बाद बेटे अपने माँ-बाप को साथ रखने को तैयार नहीं है। वे दोनों को अलग-अलग अपने पास रखने का प्लान बनाते हैं ताकि माँ-बाप उनके साथ रहने को सहमत ही न हो। परंतु अपने बेटों का प्यार पाने के लिए वे यह निर्णय स्वीकार कर लेते हैं। जब राज और पूजा बेटों के वहाँ जाते हैं तो उनका तिरस्कार किया जाता है। उनकी सेवा-सुश्रुषा करना तो दूर की बात वे उन्हें ताने देते हैं। राज अपनी जिंदगी के अनुभव को हेमंत के यहाँ किताब के रूप में लिखता है। यही किताब जब बागबां के शीर्षक से प्रकाशित होती है तो वे बेटे अपने पिता के सम्मान समारोह में इस उम्मीद से जाते हैं कि उन्हें भी कुछ रकम मिलेगी। परंतु पिता राज मल्होत्रा उन्हें अपनी संतान मानने से ही इंकार कर देता है।

वर्तमान में दो पीढ़ियों के बीच फैल रही दूरियों के बारे में राज मल्होत्रा संवेदना प्रकट करता है। वह साफ-साफ शब्दों में कहता है कि औलाद यह क्यूँ भूल जाती है कि जो हश्र आज उनके माता-पिता का है, वही हश्र आने वाले कल उनका खुद का होगा। मैंने तो वही लिखा है जो जिंदगी ने मुझे सिखाया। बागबां एक किताब है बीते कल और आने वाले कल के बीच फैले सन्नाटे की, एक पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी के बीच टूटे हुए पुल के बारे में, झुके हुए उन कंधो के बारे में जिन पर बैठकर बच्चों ने जिंदगी के मेले देखे, काँपते हुए उन खाली हाथों के बारे में जिन्होंने बच्चों के नन्हें हाथो को पकड़कर चलना सिखाया, लरजते हुए उन होंठो के बारे में जिन पर कभी बोली थी अब उन पर खामोशी है। जमाना बहुत बदल गया। जिंदगी बदल गयी। हमारी उम्र के लोग बेकार के रिश्तों और बंधनों में उलझे रहते थे। बाप के चरणों में ईश्वर देखते थे और माँ के चरणों में स्वर्ग। अब लोग समझदार हो गए। आज की पीढ़ी होशियार और प्रेक्टिकल हो गई। उनके लिए रिश्ते सीढ़ी की तरह हैं जिन पर पाँव रखकर आगे बढ़ना है। रिश्तों को अखबार की रद्दी समझकर कबाड़खाने में फेंक देते हैं। जिंदगी सीढ़ी की तरह ऊपर नहीं चढ़ती, जिंदगी पेड़ की तरह होती हैं। माँ-बाप सीढ़ी के पहले पायदान नहीं होते, माँ-बाप जिंदगी के पेड़ की जड़ है। पेड़ कितना ही हरा-भरा और बड़ा क्यों न हो जाये, जड़ के बिना वो जिंदा नहीं रह सकता।
जिन बच्चों की खुशियों के लिए एक बाप अपने मेहनत की पाई-पाई हँसते-हँसते उन पर खर्च कर देता है, वो ही बच्चे माँ-बाप की नजर धुंधली हो जाती हैं तो उन्हें कतरा भर रोशनी देने से क्यूँ मुकर जाते हैं। बाप अगर बेटे के पहले कदम उठाने पर मदद कर सकता है तो बेटा बाप के आखिरी कदम पर उन्हें सहारा क्यूँ नहीं दे पाता। जिंदगी भर खुशियाँ लूटाने वाले माँ-बाप को आखिरी पड़ाव पर क्यूँ तन्हाई और अकेलापन देते हैं। वो उन्हें प्यार नहीं दे सकते है तो छीनते क्यूँ हैं। जिन्हें भगवान ने एक किया उन्हें अलग-अलग करने का हक औलाद को कभी नहीं हैं।


वह समय फिर आ गया है जब पारिवारिक फिल्मों का निर्माण किया जाए, जिससे औलाद अपने पिता का अपमान न करे, बहुएँ दहेज की बलिवेदी पर कुर्बान ना हो, संयुक्त परिवार का विघटन ना हो। दर्शक अपने परिवार के साथ बैठकर फिल्म देखें। वक्त रहते नहीं संभला गया तो सिनेमा अंग प्रदर्शन, मार-धाड़ गुंडागर्दी, गाली गलौच, नग्नता, प्रतिशोध और घरेलू शोषण का पर्याय मात्र बनकर रह जाएगा।


- निर्मल सुवासिया

रचनाकार परिचय
निर्मल सुवासिया

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