अप्रैल 2017
अंक - 25 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यादें

पिता के साथ माँ का नाम ज़रूरी


'विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन' के तत्वाधान में "अंतरंग महिला चेतना मंच" के पाक्षिक कार्यक्रमों की श्रंखला में 23 अगस्त 2016 को हम संयोजकों ने आज़ादी के उपलक्ष्य में भाव गीतों का आयोजन किया।इस कार्यक्रम में हमने उभरते युवा कलाकारों को नृत्य,भरतनाट्यम्, गीत गायन आदि के लीये आमंत्रित किया था।एक-एक कर अपनी कला में पारंगत कलाकारों का नाम ले उन्हें मंच पर प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया।सभी ने अपनी श्रेष्ठ कला प्रदर्शन से सभागृह में उपस्थित लगभग सौ दर्शकों को मन्त्र मुग्ध कर दिया,फिर चाहे वह नृत्य हो या गीत गायन।इसी श्रंखला की अगली कड़ी में हमने एक उभरते युवा कलाकार जो क़रीब सत्रह से अठारह वर्ष के है,आमंत्रित किया।इतनी कम उम्र में ये ख्याति प्राप्त कर चुके है। हमने उन्हें ऋषिकेश प्रदीप पोहनकर नाम से भरतनाट्यम् की प्रस्तुति के लिए मंच पर आमंत्रित किया।ऋषिकेश जी मंच पर आए तथा उन्होंने कान्हा की वेशभूषा में मधुरम्-मधुरम् गीत पर कृष्ण की भूमिका में भरतनाट्यम् किया।अपने शानदार वेशभूषा,मेकअप के साथ शानदार-जानदार डांस स्टेप्स तथा चेहरे के हाव-भावों द्वारा सभागृह में उपस्थित सभी दर्शकों को मन्त्र-मुग्ध कर दिल जीत लिया।नृत्य समाप्त होने पर उन्होनें सभागृह में बैठे दर्शकों को संबोधित कर अपने मन की बात साझा करने की अनुमति मांगी।हम आयोजकों ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर उनसे उनके मन की बात साझा करने का अनुरोध किया।

अपने मन की बात उन्होंने ने इस प्रकार साझा की,"मेरा नाम ऋषिकेश प्रज्ञा प्रदीप पोहनकर है।विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा,प्रज्ञा मेरी माताजी का नाम है तथा प्रदीप मेरे पिताजी का।मै हमेशा अपने नाम के आगे अपने माता-पिता दोनों का नाम लिखता हूँ।पिता के नाम की तरह जन्म देने वाली जननी,बोलना सिखाने वाली,ऊँगली पकड़ चलना सिखाने एवं सुसंस्कार दे पालन-पोषण करने वाली माँ का नाम बच्चों के नाम के साथ अवश्य लिखा जाना चाहिये ऐसा मैं मानता हूँ।क्योंकि मैं आज जो भी हूँ पिता की बराबरी के साथ माँ की मेहनत,लगन व् प्रेरणा से ही कलाकार बना हूँ।वर्ना मैं इनके बिना कुछ नहीं।मेरा वजूद इन्हीसे है।"नारी के प्रति खासकर पिता के साथ माँ के प्रति आजके युग के उस युवा कलाकार के मन में अपार स्नेह,आदर व् श्र्द्धा के भाव जान उसकी बात मेरे मन को गहरे तक छु गई व् मुझे असीम आनंद प्राप्त हुआ,कारण हमारे भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में आजके आधुनिक ,विकसित दौर में भी अपने नाम के साथ केवल पिता का नाम लगाने की परम्परा है।सभागृह में उपस्थित सभी महिलाओं ने उनकी बात सुन उनकी भावना का आदर कर उस युवा कलाकार के जज़्बे को खड़े हो सलाम किया।


- शगुफ्ता अतीब काज़ी

रचनाकार परिचय
शगुफ्ता अतीब काज़ी

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