अप्रैल 2017
अंक - 25 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

लक्ष्मण रेखा

थोड़ी-सी सहानुभूति, कुछ संवेदनाएँ
और प्रेम के कुछ शब्द मनुष्य के लिये पर्याप्त हैं
लेकिन कई बार मनुष्यता अंधेरे में गुम हो जाती है
और मनुष्य तब्दील हो जाता है
सूखी हुई नदी, अधजली लकड़ी या फिर सूखे दरख़्त में

बहुत तेज रफ्तार जीवन में गुमनाम अंधेरे
रोशनी में झूलने की कोशिश करते हैं
और विश्वास दम तोड़ता जाता है
सरलता, अभिवादन और आदरसूचक शब्द
निरर्थक मान लिये जाते हैं

तब अपने अंदर के इंसान को खोजने
हो सकता है वहाँ की यात्रा करनी पड़े
जहाँ थोड़ी-सी मुस्कान के लिये
आत्मा तक गिरवी रख दी जाती है
जहाँ प्रकाश के एक पल के लिये
सारा जीवन अंधकार में बिताना पड़ता है
जहाँ जीवन नरक से भी बदतर है

इस यात्रा में कई तो ऐसे मिल जाते हैं
जो यह जानना चाहते हैं कि उन्हें
नाश्ते, दोपहर के भोजन
और रात्रि में क्या परोसा जायेगा
लेकिन कमी नहीं है ऐसे लोगों की भी
जिन्हें जीवन में कभी स्वादिष्ट भोजन मिला ही नहीं है
लेकिन हमारी संवेदनाएँ वहाँ पहुँचने में अक्षम हैं

और हम गर्व से घोषणा करते हैं कि
यही हमारी लक्ष्मण रेखा है


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शब्दों की दुनिया में

मैं शब्दों की दुनिया में
दिन-रात भटकता हूँ
कि शब्द ही अभिव्यक्ति का माध्यम हैं
कि शब्द ही जोड़ते हैं
आदमी को आदमी से
कि शब्द ही विचारधारा बनाते हैं
और पीड़ा को भी स्वर देते हैं
कि शब्दों से ही निर्धारित होती है
हमारी मानवता या दानवता
कि शब्दों से ही व्याख्यायित होता है
जीवन का दर्शन
कि शब्दो से ही परिभाषित होते हैं
धर्म और संस्कृति
कि शब्दों की ईंट से ही
साहित्य की हवेली खड़ी होती है
कि शब्दों का भी एक विज्ञान होता है

शब्द ही प्रहार करते हैं तलवार की तरह
शब्द ही हैं जो औषधि की तरह काम करते हैं
इसलिये मैं करता हूँ उपासना शब्दों की
और भटकता हूँ शब्दों की दुनिया में


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मध्यांतर

कहीं सूखी रोटी के भी लाले हैं
तो कहीं छप्पन भोग स्वादिष्ट पकवान हैं
मनोरंजन का मतलब सिर्फ क्रिकेट और सिनेमा है
और कभी कभी शराब या फिर शबाब

अब बहुत ज़रूरी है अमीर होना
हिंदी के लेखक को
अन्यथा अंधेरे से लड़ते लड़ते
उसकी जान निकल जायेगी

और यह कैसा पागलपन है
कि अंधेरे सिनेमा हॉल में तीन घंटे विमूढ हो
कभी रोते कभी तालियां बजाते बैठे रहना

स्मार्ट जींस पहने लडकियों के हाथों में
अंग्रेजी उपन्यास सुशोभित होता है
हिंदी साहित्य सिर्फ चंद बूढ़ों का 
पराक्रम भर रह गया है

विचार लघुशंका की तरह बह रहे हैं
प्रतिभाएँ चौराहों पर पान खा रही हैं
एक से बढ कर एक उस्ताद आ रहे हैं
जो मुस्कराते हुए आम आदमी को मार रहे हैं
और मारा जाने वाला भी खुश हो मर रहा है

यह कोई काव्यात्मक प्रस्तुति नहीं है
कोई शोक गीत भी नही है
सिर्फ मध्यांतर भर है
आगे की फिल्म और भी खतरनाक है
जिसमें भूखे मरते आदमी से कहा जायेगा-
"ऐ खुशनसीब!
तुम्हारे पास आंखें हैं, लीवर है और किडनी भी है।"

 


- अनुपम सक्सेना

रचनाकार परिचय
अनुपम सक्सेना

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