जनवरी 2017
अंक - 22 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
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आलेख

गुजरात के आदिवासी के तीज-त्योहार और देवी-देवता: डॉ. हेतल जी. चौहाण


आदिम काल से अत्यंत गहरे जंगलों या दुर्गम प्रदेशों के बीच बसने वाले लोगों को भारत में आदिवासी के नाम से जाना जाता है। विश्व फलक पर इनको मूलनिवासी के रूप में भी पहचाना जाता है।
आदिवासी शब्द दो शब्दों 'आदि' और 'वासी' से मिलकर बना है और उसका अर्थ 'मूलनिवासी' होता है। भारत की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है। प्राचीन लेखों और संस्कृत ग्रंथों में आदिवासियों को 'अत्विका' और 'वनवासी' भी कहा गया है। संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति पद का प्रयोग किया गया है। महात्मा गाँधी ने आदिवासियों को 'गिरिजन' अर्थात् 'पहाड़ पर रहने वाले लोग' कहकर पुकारा है। आम तौर पर आदिवासियों को भारत में जनजातीय लोगों के रूप में जाना जाता है।


भारत सरकार ने आदिवासियों को भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में 'अनुसूचित जनजातियों' के रूप में मान्यता दी है। अक्सर इन्हें अनुसूचित जातियों के साथ एक ही श्रेणी 'अनुसूचित जातियों और जनजातियों' में रखा जाता है, जो कुछ सकारात्मक कार्यवाही के उपायों के लिए पात्र हैं। संविधान में उसे दलित के समकक्ष खड़ा कर दिया था। आज़ादी के तत्काल बाद संविधान में सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक कमज़ोर जिन दो वर्गों या समूहों को चिह्नित किया गया था, उसमें एक आदिवासी वर्ग है।
आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल एवं गुजरात में अल्पसंख्यक हैं जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों जैसे- मिजोरम में यह बहुसंख्यक हैं। भारत में प्रमुख आदिवासी समुदायों में संथाल, गौड़, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, भील, खासी, सहरिया, गरासिया, मीणा, उरांव, बिरहोर आदि हैं। लेकिन आज हम यहाँ बात करेंगे गुजरात राज्य में बसी आदिवासी प्रजा की।
गुजरात के आदिवासियों में मुख्यतया कूकणा, धोडिया, गामित, चौधरी, वसावा, भील, राठवा, नायका, हळपति, डामोर, कटारा, कोटवालिया आदि का समावेश होता है। इनके तीज-त्योहार तथा पारंपरिक देवी-देवतओं की बात ही निराली हैं।


आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति पूजक हैं और जंगल, पहाड़, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं। ये लोग प्रकृति के बहुत ही निकट होते हैं। इनके जीवन निर्वाह का मुख्य आधार खेती है और खेत की मौसम के अनुसार उनके त्योहार आते हैं। जिनकी विस्तृत जानकारी प्राप्त करते हैं-
होली-
आदिवासियों का मुख्य त्योहार है होली। जिसमें फागुन महीने की पूर्णिमा की रात को गॉंव में तय की गई जगह पर लकड़ियाँ इकट्ठी करके उसमें खम्भे जैसी ऊँची लकड़ी खड़ी की जाती है तथा उसके ऊपर की किनारी पर एक रोटी बाँधी जाती है। होली जलाते ही रोटी वाली लकड़ी गिर जाती है और रोटी पक जाती है, तब उसे खाने के लिए लोगों के बीच उसे झपट लेने की कोशिशें होती हैं, जिसे यह रोटी मिलती है वह खुशनसीब माना जाता है।


उन्दरियो देव-
खेत में फसल तैयार हो जाने के बाद एक दिन मिट्टी का चूहा बनाया जाता है। एक कपड़े के टुकड़े की झोली बनाई जाती है, जिसे दो आदमी पकड़ते हैं और उस झोली में इस चूहे को रख दिया जाता है। उसके बाद वहाँ खड़े लोग उस झोली में ककड़ी, भिंडी, टिंडा इत्यादि डालते हैं। झोली पकड़ने वाले दोनों आदमी भागने लगते हैं और लोग उनके पीछे भागते हैं। इस तरह करते हुए वे लोग जब गॉंव की सीमा से बाहर निकल जाते हैं, तब भागदौड़ रोक दी जाती है। उसके बाद नाच-गाना व खाने-पीने की महफ़िल सजती है।

पोहोतियो-
जब सर्दियों में वाल (एक द्विदल) के पौधे को पापड़ी आती है, तब पहली पापड़ी का उत्सव मनाया जाता है, जिसको पोहोतियो कहा जाता है। इसमें मित्रों तथा रिश्तेदारों को बुलाया जाता हैं और 'उबाडिया' की पपड़ी का मज़ा ताड़ी अथवा महुड़े की शराब के साथ लिया जाता है।

नंदुरो देव-
यह त्योहार विशेषकर वर्षा और प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है। जब पहली बारिश के आगमन के बाद खेत में फसल उगने लगती है और उसके बीज निकलने लगते हैं तथा जंगल में नया घास उगने लगता है तब उसकी ख़ुशी में यह नंदुरो देव त्योहार मनाया जाता है।
इस त्योहार में नारियल फोड़कर, जमीन पर शराब डालकर और मुर्ग़ी या बकरे की आहूति देकर पूजा और प्रार्थना की जाती है कि उगी हुई फसल तथा जंगल की वनस्पति समग्र वर्ष के दौरान बिना किसी नुकसान के अच्छी रहे, जिससे उनका जीवन निर्वाह आसानी से चल सके। खास तौर पर यह त्योहार जून महीने में मनाया जाता है। आदिवासियों की यह धार्मिक विधि देखने लायक होती है।


वाघ देव-
आदिवासी प्रजा में आज भी इस त्योहर का बड़ा महत्त्व है। सालों पहले जब इस इलाके में गाढ़ जंगल था, तब यहाँ वाघों (बाघों) की बस्ती विशेष थी। और वैसे भी वाघ जंगल का शक्तिशाली प्राणी है, इसलिए उसके डर तथा आदर की वजह से वाघदेव त्योहार में उसकी पूजा होती है। विधि अनुसार खेत में बनी पगडंडी पर साग की एक डाल बोई जाती है, उसके पास तैयार हुई नई फसल, नारियल और शराब से पूजा की जाती है तथा पितृ अर्पण किया जाता है।

चौरी देव-
वाघदेव त्योहर मनाने के बाद जब फसल काटने के लिए तैयार हो जाती है, तब अमावस्या के दिन यह त्योहर मनाया जाता है। इस दिन बैल के सिंग को रंग कर उसे सजाया जाता है और उसको अच्छा खाना दिया जाता है। कभी-कभी बैलों की दौड़ की स्पर्धा का भी आयोजन किया जाता है।
आदिवासी जाति प्रकृति से जुड़ी हुई जाति हैं। उनके हर त्योहर में प्रकृति तथा प्राणियों की पूजा-अर्चना होती है। उनकी जीवनशैली और त्योहरों में प्रकृति को विशेष महत्त्व दिया जाता है।


अब हम बात करेंगे आदिवासियों के पारम्परिक देवी-देवताओं के बारे में-

देवमोगरा माता-
देवमोगरा माता समग्र आदिवासी समाज की मुख्य देवी हैं। देवमोगरा नाम के गॉंव में देवमोगरा माता का मंदिर स्थित है। यहाँ हजारों लोग मन्नतें माँगने आते हैं। यह आदिवासी प्रजा का पवित्र यात्राधाम है। यहाँ लोग खुद के उगाये धान, फसल और सब्जी माताजी को चढ़ाने आते हैं।

पांडोर देवी-
यह गॉंव की रक्षक देवी हैं। इनको पार्वती का ही रूप माना जाता है। विशेष रूप से गॉंव के बाहर बड़े पेड़ के नीचे इनकी स्थापना की जाती है। इनके साथ मिट्टी के बने हुए प्राणी के खिलौने जैसे कि घोड़ा, बाघ, बैल इत्यादि रखे जाते हैं। जो प्रकृति के साथ गॉंव की रक्षा करेंगे ऐसा माना जाता हैं।

इंदला देवी-
इंदला भीम की पत्नी हेदंबा का दूसरा नाम है। उसको शक्ति का प्रतीक माना जाता है। प्राचीन काल में सोनगढ़ से उच्छल के बीच के जंगलों में यह इदला देवी और उनका पुत्र घटोत्कच के जन्म के समय की शारीरिक निशानी वाला एक पत्थर था, किन्तु अभी उसकी कोई जानकारी नहीं है।

नोकटी देवी-
रामायण की प्रसिद्ध राक्षसी शूर्पणखा जो रावण की बहन थी, उसका यह दूसरा नाम है। लोककथा अनुसार मोगलबारा के जंगलों में एक बार एक वीर पुरुष ने यहाँ की एक महिला का नाक काट लिया था और यहाँ के लोग उस महिला की पूजा करते थे, उसकी एक पत्थर की मूर्ति भी थी किन्तु उकाई का सरोवर बनने के बाद यह जगह उस सरोवर में डूब गई है।

इस तरह हमने देखा कि आदिवासियों के तीज-त्योहर एकदम अनूठे और अनोखे हैं। समय बहुत बदल गया है, बदलते समय के साथ बाकि सभी समाजों ने अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार अपने रीति-रिवाज़ों में बदलाव किए हैं परन्तु यह समाज अपने रीति-रिवाज़ों में आज भी कोई बदलाव नहीं ला पाए हैं। आज भी उनकी जीवनशैली में वही मिट्टी की सुगंध आती है, जो हमें यह एहसास दिलाती है कि यह समाज आज भी प्रकृति तथा जमीन से जुड़ा है।

विशेष- यह जानकारी आदिवासियों से मिलकर प्राप्त की गई है, इसलिए इसमें सन्दर्भ नहीं दिए गए हैं।


- डॉ. हेतल जी चौहाण

रचनाकार परिचय
डॉ. हेतल जी चौहाण

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