नवम्बर 2016
अंक - 20 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- छोटू का कमाल

नंदन वन में  एक विशाल पेड़ था। उसके तने में छोटू चूहा रहता था। वह बड़ा ही मिलनसार था। एक बार की बात है, जब छोटू अपने दोस्तों मीनी
चिड़िया और मोकू बंदर के साथ खेल रहा था कि तभी अचानक एक काला नाग फुसफुसाते हुए आ धमका। एकाएक  माहौल बिगड़ गया। जहाँ मीनी ने पलक
झपकते उडान भर ली, वहीं मोकू ने बगल के पेड़ पर छलांग लगा दी। अब रह गया था केवल छोटू। नाग उसी पर झपटा।
"फँस गया", चिल्लाते हुए छोटू सर पर पाँव रख कर भागा और किसी तरह अपनी जान बचाई।
शाम को जब तीनों मित्र मिले तो छोटू बड़ा उकड़ा-सा लगा। मोकू ने पूछ ही लिया, "क्या बात है दोस्त? बड़े उकड़े-से हो।
"हाँ हाँ, बताओ न क्या  बात है?" मीनी ने भी आँखें मटकाकर पूछा।
"चूहों की जिंदगी कितनी कठिन है। बिल्ली, गिद्ध, साँप, मनुष्य सभी हमारे पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं। कितना अच्छा होता अगर मेरे भी पंख
होते तो। मैं किसी भी मुसीबत में फुर्र से उड़ जाता।" रुआंसा होकर बोला।

"अरे ये भी कोई बात हुई। हर किसी की अपनी खूबी होती है। कोई किसी से कम नहीं।" मोकू बोला।
"हूँ तुम तो ऐसे ही बोलोगे। उस दिन जान पर तो मेरी बन आई थी। तुम दो तो पल भर में रफूचक्कर हो गए थे।" छोटू हाथ नचाते हुए बोला।
"अरे बाबा, मेरे पंख हैं इसलिए उड़ गई वरना पैरों से तो फुदकते रहती और उस साँप का भोजन बन जाती।" मीनी ने अपने पंख फड़फड़ा कर कहा।
"और क्या? मैं भला भी तुम्हारी तरह कहाँ दौड़ पाता इसलिए पेड़ का सहारा लिया।" मोकू बोला।
"कुछ भी कहो। मैं तो अब उड़ना सीख कर ही रहूँगा।" छोटू तुनक कर बोला और पैर पटकता हुआ आगे  बढ़ गया।
मोकू और मीनी हैरान परेशान देखते रह गए।

छोटू  रास्ते  में  गिरे पक्षियों  के पर जमा करने लगा और कुछ ही दिनों में उसने बहुत सारे पंख इकठ्ठा कर लिए थे। उसने इन पंखों को बाँधने
के लिए डोरी की भी जुगाड़ कर ली थी। उसने सारे पंखों को डोरी से बाँधी और फिर अपने ऊपर लपेट लिया।
"अब बारी है उड़ने की", कहकर वह एक चट्टान पर चढ़ गया।
उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर उड़ने का प्रयास किया तो ओंधे मुंह नीचे गिर पड़ा। उसने हिम्मत न हारी और दुबारा प्रयास किया पर फिरसे पछाड़ खाकर
गिर पड़ा।
"मैंने जरूर पंखों को सही तरह से नहीं लगाया होगा।" सोचकर छोटू डोरी खोलने लगा पर यह क्या डोरी पर तो गाँठ बन गई थी। उसे खोलते-खोलते उसके
पसीने छूटने लगे थे।
उसी पल शब्बो बिल्ली वहाँ पहुँच गई। तरह तरह के पंखों से लिपटे चूहे को देखते ही उसके आँखें चमक गयीं।

"अरे वाह, मोटा चूहा चिड़ियों के पंख के फ्लेवर के साथ। अब देखूँ कि बच्चू कैसे तेज भागता है?" उसने जीभ फिरा कर कहा।
छोटू घबराकर दौड़ने लगा पर उसकी पहले की फुर्ती नदारद थी। पंखों के डोरी में उलझकर वह एक काँटेदार झाड़ी पर गिर पड़ा। छोटू को लगा बस यह
उसकी अंतिम घड़ी है और उसकी साँसे जोर जोर से चलने लगीं। तभी संकटमोचक हनुमान की तरह मोकू आया और उसे बचाकर पेड़  पर चढ़ गया। शब्बो  बिल्ली खिसियाकर रह गई।
मोकू ने फिर छोटू के बदन से पंखों की लड़ी को खोलकर दूर फेंक दी। छोटू के आँखों में भी पश्चाताप के आँसू थे।
मोकू बोला, "अब समझे, जाको आए ताको साझे और करे तो डंडा बाजे।"
"चूहे की गति और फुर्ती ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।" छोटू बोला और मोकू के गले मिल गया।
फिर दोनों मीनी से मिलने चल पड़े पर वह कहीं न मिली। तभी चिंटू हिरण घबरा कर बोला- बहुत बुरा हुआ। कुछ  लोग आए और पक्षियों को कैद कर ले
जा रहें हैं।

"जल्दी बताओ वे कहाँ गए?" छोटू ने पूछा।
चिंटू के इशारा करते ही वे दोनों उस ओर दौड़ पड़े। कुछ ही दूरी पर उन्होंने आदमियों को खोज निकाला। वे पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे और पास ही जाली में पक्षी कैद थे। अपने मित्र मीनी को इस हाल में देखकर छोटू की रुलाई छूट गई।
"लेकिन हमें दिमाग  लगाना पड़ेगा" बोलकर छोटू ने मोकू के कान पर कुछ बुदबुदाया।
मोकू मुस्कुराया और पलक झपकते ही एक आदमी का डंडा लेकर भाग खड़ा हुआ। जब वे सभी उसे पकड़ने  लपके तो वह डंडे  से करतब दिखाने
लगता। सभी उसकी करतब मंत्रमुग्ध देखने लगे। छोटू ने इस समय का फायदा उठाया। देखते ही देखते उसने सारे जालों को कुतर दिया और सभी पक्षियों  को
आजाद कर दिया। छोटू से इशारा पाते ही मोकू ने डंडा पटका और पल भर में पेड़ों में ओझल हो गया।
जब शिकारियो ने जालों को देखा तो सर पीट लिया। इन जानवरों ने तो आज सचमुच उल्लू बना दिया था। जंगल में तो इस आजादी का खूब जश्न मना और सबने इस जीत का सेहरा बाँधा छोटू के सर पर।
"आज मेरे दोस्तों ने कर दिया कमाल, आओ मिलकर मचाये खूब धमाल।" मीनी खुश होकर गा रही थी।
आज छोटू को चूहे होने पर गर्व था। सोचने लगा, "सचमुच गर है चाह और दिमाग तो कोई किसी से कम नहीं।"


- सुधा विजय

रचनाकार परिचय
सुधा विजय

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (1)