नवम्बर 2016
अंक - 20 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

करुणा का बस्ता


बचपन की लाख बातें भूल जाऊँ, पर करुणा का बस्ता भी क्या कभी भूल सकती हूँ। और उस बस्ते के खो जाने का दुख भरा किस्सा? करुणा की वे सूनी-सूनी आँखें, भल-भल-भल बहते आँसू!
पर भला आप करुणा को क्या जानेंगे? और उसके बस्ते को? नहीं न! तो चलिए, शुरू से ही बताती हूँ।


करुणा थी मेरी सहेली, खूब प्यारी-प्यारी और पक्की सहेली। क्लास में साथ-साथ हम बैठते, साथ-साथ खेलते-कूदते और कभी-कभी आधी छुट्टी के समय खूब गपशप करते। थी वह गरीब माँ-बाप की बेटी। पिता फल बेचते थे और उससे इतनी कमाई होती नहीं थी कि ठीक से गुजारा हो पाता। करुणा के पिता अक्सरपरेशान होकर कहा करते थे, “बेटी, तू पढ़ाई छोड़ दे। तेरी पढ़ाई का खर्च अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।”
सुनकर करुणा उदास हो जाती। कहती, “पिताजी, मैं पढ़ूँगी जरूर। आप पर बोझ नहीं बनूँगी। चिंता न कीजिए।”


स्कूल में करुणा की फीस माफ थी। महीने में सिर्फ सवा रुपया देना पड़ता था। पर वह भी उसके लिए किसी आफत से कम नहीं था।
एक बार समय से फीस नहीं दे सकी, तो क्लास टीचर माया दीदी की डाँट से स्कूल में ही उसका रोना छूट निकला। बाद में माया दीदी ने प्यार से पुचकारते हुए पूछा, तो करुणा ने सुबकते हुए घर की हालत बताई। माया दीदी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “करुणा, तू चिंता न कर। आज से तेरी फीस भरने का जिम्मा मेरा रहा।”
उस दिन के बाद करुणा की उदासी थोड़ी-थोड़ी छँटने लगी। पढ़ाई में भी अब वह तेज हो गई थी। अध्यापिकाएँ उसे प्यार करतीं। अकसर कोई काम होता तो माया दीदी करुणा से ही कहती, “जा करुणा, जरा चॉक तो ला। स्टाफ रूम में साइंस की कापियों का बंडल भी उठा लाना।”
करुणा दौड़ती हुई जाती और झटपट सारे काम कर लाती। देखते ही देखते वह सबकी लाडली हो गई।


उन्हीं दिनों का किस्सा है, करुणा के बस्ते का किस्सा! पर पहले यह तो बता दूँ, करुणा का बस्ता कोई कपड़े वाला बस्ता नहीं था। असल में तो वह टिन की एक छोटी सी, प्यारी सी संदूकची थी। पर कहते हम सब उसे बस्ता ही थे। करुणा को वह संदूकची भी सातवीं कक्षा में अच्छे नंबर लाने पर खुद माया दीदी ने खरीदकर दी थी।
करुणा की वह संदूकची ऐसी थी कि जिसे वह जान से बढ़कर रखती थी कि कहीं उसमें जरा सी खरोंच तक न आ जाए। उस संदूकची के भीतर करुणा की किताबों और कापियों की अलग-अलग ढेरियाँ होतीं। अकसर करुणा को दूसरों से माँगी हुई, पुरानी किताबें ही मिल पाती थीं। पर उन्हीं को अच्छी जिल्द चढ़ाकर, वह इतने ढंग से रखती थी कि देखकर हम दंग रह जाते।


इसके अलावा करुणा की उस जादुई संदूकची में जरूरत की हर चीज होती। एक कोने में स्याही की छोटी-सी दवात। दूसरे में पेंसिल, पेन, ज्यॉमेट्री का सामान। और तो और, एक घर का बना रूमाल भी उसमें रखा होता था, जिससे करुणा जब-तब अपनी संदूकची को साफ कर लिया करती थी। अगर कहीं स्याही फैलती, तो भी वह काम आता।
हम लोग जब-जब करुणा की इस सुंदर सी, प्यारी संदूकची की तारीफ करते तो उसकी आँखें चमक उठतीं थीं। कभी-कभी हमारे पेन की स्याही खत्म हो जाती तो करुणा की संदूकची में रखी छोटी सी, गोल-गोल स्याही की दवात हम सबके काम आती।
उसी संदूकची पर कापी रखकर करुणा मजे से क्लास में लिखने का काम किया करती। हम लोग देखते और तारीफ करते, “वाह करुणा! तेरी संदूकची का तो जवाब नहीं!”
और करुणा हँसते-हँसते गा उठती, “मेरा बस्ता नया निराला, उसमें लटका रहता ताला...!”
सुनकर करुणा समेत हम सभी खिलखिला उठते। सचमुच करुणा अपनी संदूकची में एक छोटा सा ताला भी लगाए रखती थी।


फिर एक दिन की बात है, प्रधान अध्यापिका ने करुणा को और मुझे आफिस में बुलाकर कहा, “सरस्वती विद्यालय में कविता-प्रतियोगिता है। आज ही तुम दोनों को उसमें भाग लेने जाना है।”
कविताएँ तो हमें बहुत सी याद थीं ही। झटपट हम दोनों सहेलियों ने तैयारी की और हिंदी की शोभा मैडम के साथ चल पड़े। वहाँ करुणा ने ‘एक गरीब लड़की के आँसू’ नाम की इतनी अच्छी कविता सुनाई कि खूब तालियाँ बजीं। करुणा को पहला पुरस्कार मिला, मुझे दूसरा। लौटते समय हमारे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। शोभा मैडम ने भी हमें खूब शाबाशी दी थी।


पर जब तक हम दोनों लौटीं, शाम के पाँच बज चुके थे। स्कूल की छुट्टी हुए आधा घंटा बीत चुका था। हम दोनों दौड़कर क्लास रूम में पहुँची, पर वहाँ पहुँचते ही करुणा का चेहरा दुख के मारे सफेद पड़ गया। मेरा बस्ता तो वहाँ पड़ा था, पर करुणा की संदूकची गायब थी।
और देखते ही देखते करुणा के चेहरे पर इतनी गहरी उदासी छा गई, जैसे उसका हीरे-मोतियों से भी बड़ा खजाना लुट गया हो। उसके पैर डगमग-डगमग कर रहे थे। खुद मेरा बुरा हाल था। पर चिंता करुणा की थी। कहीं वह बेहोश होकर जमीन पर न गिर पड़े।


मैंने करुणा की पीठ पर हाथ रखकर उसे दिलासा देना चाहा, पर वह भल-भल-भल कर रोई तो रोती ही रही। रोती रही बहुत देर तक। फिर उसे मैं घर तक छोड़कर आई। करुणा की माँ और भाई-बहनों को भी संदूकची के खो जाने का पता चला, तो वे बहुत दुखी हुए।
उस रात सपने में मुझे बस करुणा की संदूकची ही नजर आती रही। बार-बार मन दौड़-दौड़कर यहाँ-वहाँ जाता था। सपने में भी यही दुख था, कौन ले गया करुणा की संदूकची! क्यों? एक गरीब लड़की की मदद करने की बजाय, किसने उससे यों बदला लिया! संदूकची करुणा की खोई थी, रोना मुझे आ रहा था।


अगले दिन प्रधान अध्यापिका ने प्रार्थना सभा में कहा, “करुणा कितनी अच्छी लड़की है। किसी दुष्ट बच्चे ने उसका बस्ता चुरा लिया है। आप सब उसकी मदद कीजिए।”
किसी ने पुरानी किताबें दीं, किसी ने कापियाँ। किसी ने पेन और स्याही की दवात, तो किसी ने ज्यॉमेट्री बॉक्स। करुणा की एक सहेली ने अपना पुराना बस्ता भी दे दिया।
करुणा फिर उसी तरह किताब-कापियों पर जिल्द चढ़ाकर अपना बस्ता ठीक से सँभालकर स्कूल आती, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक उदासी की परत होती। कोई जरा भी उस सुंदर सी संदूकची की बात छेड़ता, तो उसकी आँखें डबडबा जातीं।
करुणा अब कम बोलती थी। चुप-चुप ही ज्यादा रहती थी। उस साल उसने खूब पढ़ाई की और आठवीं कक्षा में प्रथम आई। स्कूल में उसे दस रुपए महीना वजीफा मिलने लगा। अब भला उसकी आगे की पढ़ाई में क्या मुश्किल थी!


आज करुणा एक कंपनी में बड़ी अधिकारी है। कभी-कभार मुझे मिल जाती है, तो उसकी खोई हुई उस सुंदर सी संदूकची की चर्चा जरूर छिड़ती है। सुनते ही करुणा हँस देती है, “अरे वाह! नीना, तुम्हें अभी तक याद है, बचपन की वह छोटी सी घटना?”
फिर एकाएक वह गंभीर हो जाती है। कहती है, “हाँ, नीना, भूली तो मैं भी नहीं!”

 


- डाॅ. सुनीता

रचनाकार परिचय
डाॅ. सुनीता

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