सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी - भेड़िया
 
समस्या वाक़ई विचित्र है। वह भेड़िए से दहशत खाता है ......और  ताज्जुब यह कि भेड़िया उसने कभी देखा नहीं। दरअसल यह वही भेड़िया है, जो झूठ बोलने वाले गड़रिये की कहानी में नहीं आते-आते भी एक रोज़ सचमुच आ गया था।
पिछले हफ्ते भर में उसकी यह दूसरी विज़िट है। पहली दफ़ा उसने केवल डरावने सपने देखने और नींद न आने की शिकायत की थी। "आजकल हर चौथे आदमी को ये बीमारी है" डॉक्टर परिक्षित ने चश्मा नाक पर सरकाकर उसे पुरमज़ाक नज़रों से घूरा था और बिना कोई ख़ास तवज्जो दिए कुछ ट्रेनक्यूलाइज़र्स में छोटे-मोटे निर्देश मिलाकर एक पुड़िया हाथ में थमा दी थी। सम्भवतः एक मामूली बात पर ऐसी संजीदगी उन्हें हास्यास्पद लगी हो।
और आज ऐसी ही उलझनें लिए वह फिर हाज़िर है।
 
भेड़िया!
पच्चीस वर्ष के तज़ुर्बे में जू फ़ोबिया के कई मामले सुलझाने के बावजूद डॉक्टर परिक्षित आज कुछ असहज हो चले हैं। अपनी अनुभवी आँखों से उसे टटोल जाने क्या भाँपकर वो हल्के से मुस्कराए, "आप शादीशुदा हैं?"
यह कैसा सवाल है....वह मुँह ताकने लगा। मानो मेज़ के उस पार उसके सामने डॉक्टर नहीं कोई विदूषक बैठा हो।
"शादीशुदा होना बीमारी है?" पता नहीं यह डाक्टर के साथ उसकी मुखर होने की एक कोशिश भर है या वह सचमुच ही अपनी किसी शंका का समाधान माँग रहा है। किन्तु डॉक्टर के साथ-साथ वह खुद भी ज़ोर से हँसने लगा है।
 
इस तरह की समस्याओं में अक्सर कारण ही उनका निदान भी होता है और डॉक्टर उसके डर को पकड़ पाए यह तब तक सम्भव नहीं जब तक कि वह उन्हें अपने भीतर दाखिल होने की अनुमति नहीं देता। अपनी निजी सम्वेदनाओं के तंतुओं को शायद वह किसी भी साझे के दायरे से समेट चुका है। उसके असहयोग से हार कर अंततः डॉक्टर ने खीझ भरे स्वर से कहा, "अब जो करना है, आप ही को करना है।"
"फिर आप क्या करेंगे?" उसकी आवाज़ कुछ तन-सी गयी। मेज़ पर रखी उनके नाम की तख्ती को संदेह भरी नज़र से देखता वह उठ खड़ा हुआ कि जब सब उसे ही करना है तो यहाँ आने का क्या अभिप्राय!!!
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आधी रात वह फिर नींद से उठ बैठा है। फिर उस आदमखोर भेड़िए की गुर्राहट ....घबराहट ....पसीना-पसीना देह। वह भयभीत निगाहों से इधर-उधर देखता है। दिन भर मुस्तैदी से अपने दायित्व निभाकर बगल में बेसुध सोती पत्नी....गोया चर्बी का एक विराट पहाड़ ढह गया हो। शरीर के सारे कटाव माँस की परतों में बिला चुके हैं। वो एक लम्बी और ठंडी साँस लेता है...बहुत कम औरतें बिना कपड़ों के भी खूबसूरत लगती हैं। पत्नी के विरुद्ध इस शिकायत के साथ ही वह अपनी चेतना के अवयवों से एक अदद देह को नापने लगा है।
 
उन दिनों बहुत शोर था उसका......रेडियो पर सुना भी था उसे। हालांकि उसकी आवाज़ के मुरीदों की कोई कमी नहीं थी। वह उसके इर्दगिर्द मँडराता रहा था। उसकी साड़ी के झीनेपन और बीयर के गिलास पर कसी हुयी बेधड़क अंगुलियों को देखकर उसके बारे में कई तरह के कयास भी लगाए थे।
"दिलचस्प औरत है.....बिल्कुल अजंता-एलोराटिस्ट....." वह मित्र के कान में फुसफुसाया और मित्र ने भी पीठ पर धौल जमाकर मर्द ज़ात के पाजीपन के समर्थन मे एक बेशर्म ठहाका लगाया था। यह पहला अवसर था जबकि वह बिल्कुल उसके रू-ब-रू था। परिचय की औपचारिकता निभाकर मित्र मध्यस्थता के दायरे से बाहर हो चुका था।
 
"आऽप कविता हैं ना?"
"उँह्हु ......पहेली" वह अदा से हँसी थी।
तब क्या जानता था कि उस पहेली को हल करने में उसके जीवन के सारे समीकरण यूँ उलझकर रह जाएंगे। पत्नी ने उनींदेपन में कसमसाकर करवट ली और वह झंझावातों से बाहर बिस्तर पर लौट आया। इस सर्द रात में भी माथे पर ढेरों पसीने की बूँदें छलक आयी हैं। कमरे की नीरवता को तोड़ते पत्नी के असहनीय खर्राटे 
.....वह अँधेरे में अन्दाज़न चप्पलों को टोहता हुआ छत पर निकल आया।
 
रात का समूचा सन्नाटे भरा विस्तार। ऐसे में कहीं घात लगाए बैठा वो कद्दावर भेड़िया किसी भी पल उछलकर उसे दबोच ले तो .......क्या करेगा वो? भय की सिहरन महसूस कर उसने सिगरेट सुलगा ली। हवा में छितरा गए धुँएं में वो फिर आकार लेने लगी है।
शांतिवन की डूबती हुयी वो पुरकशिश शाम.....ज़मीन पर यूकिलिप्टस के साए लम्बे  हो रहे थे। उसकी नम हथेलियों को हाथों में थामे हुए उसे पहली बार लगा था, शाम बहुत छोटी होती है।
कशमकश में डूबते-उतरते वह किसी तरह कह सका था।
"मैं शादीशुदा हूँ"
और बदले में हैरान रह गया था...वो सहज पड़ी थी, हमेशा की तरह उसके चौड़े कन्धे पर सिर टिकाए।
"जानती हूँ .....मैं किसी मुग़ालते में नहीं हूँ" उसकी आँखों में झाँककर वो अजीब अंदाज़ से मुस्करायी।
"पता है मैं हमेशा सोचती हूँ एक मर्द और पति क्या वाकई कभी कहीं से भी अलग होते हैं?"
वो और भी हैरान हुआ था.....कि क्योंकर उसके नज़दीक वह एक औरत और पत्नी को अलग-अलग देख पाता है।
 
वो समर्पित होना जानती थी और समर्पण कराना भी उसे बखूबी आता था। जीने के लिए अपने सिद्धांत और फ़लसफ़े तय करने वाली वह औरत कभी-कभी उसे सच कम और फंतासी अधिक लगती थी। या फिर सच और कल्पना के ठीक बीचो-बीच खड़ी कोई पहेली या ..जीने के लिए सबसे बेहतर एक विकल्प। उसके काले-सफ़ेद सपनों में जैसे रंग भरने लगे थे।
 
लेकिन!!!
औरत और मौसम कब रंग बदल जाए क्या पता।
"अब और नहीं......तुम्हें एक को चुनना होगा" एकाएक ही इस घोषणा के साथ उसने अपने चारों ओर बगावत की चिरांध महसूस की थी। वह चौकन्ना हो उठा था। एक तरफ़ वो अकेली, दूसरी तरफ़ अपने तमाम अधिकारों से लदी-फदी पत्नी...समाज ...वर्जनाएं ....रिश्ते-नाते। अपने सारे प्रयत्नों के बाद भी वह अधिक दिनों तक छलावों की मरीचिका में कहाँ रख पाया उसे।
"मैं हाशिए पर नहीं रह सकती।" उसकी ओर से स्पष्ट फ़ैसला सुना दिया गया। बिना किसी सुनवाई के एकतरफ़ा फ़ैसला। दुनिया की तमाम औरतें अंततः इस आत्महीनता से परे कुछ नहीं।
 
वह त्रिशंकु बन गया।
शापित! असहाय और लाचार। उधर वो भी जैसे संतृप्त हो चली थी। किसी भी "ना" के विरूद्ध। उसका हँसना-बोलना लगातार कम हो रहा था। उसी अनुपात में बढ़ रही थी बेहूदगी, सनक और कुंठाएं। द्वेष और अपेक्षाओं की हताशा से उपजा अवसाद जिसे झेलने को वह कतई प्रस्तुत न था। रोज़ की कलह, चीख चिल्लाहट, नोंच-खसोट, गुत्थम -गुत्था।
 
फिर शुरु हुई थी....
उसे भयभीत करने को उसकी अात्मघाती कोशिशें। वो प्राय: ऐसी ख़ताएं करने लगी थी। धीरे-धीरे वह आदी होता गया। और शायद एक हद तक लापरवाह भी। उसकी सनकों, उम्मीदों, शब्दों और धमकियों के प्रति।
और उस रात भी तो वह लापरवाह ही बना रहा। काश वो समझ पाता उसकी मंशाएं।
"मैं इस तरह और नहीं जी सकती।"  वह खीझ गया, "जो जी में आए करो ....."
उसका लहज़ा सहसा सर्द हो उठा था।
"तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता...वो कहानी सुनी है ......जानते हो, एक रोज़ भेड़िया सचमुच आ गया था......."आधी-अधूरी बात पर संशय की धुंध फैलाकर वो हँसती रही देर तक। 
अगली सुबह उसकी झुलसी हुयी लाश मिली थी।
वीभत्स! दारुण!! डरावनी!!!
ज़िंदा थी तो बस आँखें जो अजीब कैफ़ियत तलब कर रही थी़ं...."तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता"
वह पागलों के मानिंद रोना चाहता था किंतु उसे जैसे सन्नाटा निगल गया। एक घातक भेड़िया जाने कहाँ से कूदकर उसी रोज़ से उसके भीतर आ बैठा है...जिससे वह दहशत खाता है।
 
सोचते -सोचते वह हाँफ़ने लगा है। फ़र्श पर सिगरेट के ढेरों टोंटे पड़े हैं। वह कलाई पर वक़्त देखता है ....सुबह बस होने को ही है। वह आहट लेता है। गुसलखाने में गुनगुनाहट के बीच पत्नी की दिनचर्या आरंभ हो चुकी है। वह निश्चय कर चुका है, आज डॉक्टर परिक्षित के सामने खुद को  उंडेलकर रख देगा। उसे निज़ात चाहिए कैसे भी उस आदमखोर से।
यह एक अलग बात है कि उसके साथ-साथ डाक्टर परिक्षित भी उस भेड़िए से आज तक जूझ रहे हैं।

- विजयश्री तनवीर

रचनाकार परिचय
विजयश्री तनवीर

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कथा-कुसुम (1)