सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे

कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्!

वह बांका है, मनोहर है, सुकुमार है, आनन्दकन्द है और भोला तो इतना है कि ठीक-ठीक कछनी तो इसे अपनी कटि में लपेटनी आती नहीं। मैया पहना दे तो ठीक है। इसे तो बस प्रतिध्वनि करनी आती है-
"कनु! तुम मेरे सखा हो-- प्रतिध्वनि आती है- हाँ, मैं तेरा सखा हूँ
तुम मेरे स्वामी हो-- हाँ, मैं तुम्हारा स्वामी हूँ
तुम मेरे सेवक हो-- हाँ, मैं तुम्हारा सेवक हूँ
ईश्वर निराकार है-- हाँ, ईश्वर निराकार है
हम ही उसे अस्वीकृत करना सिखला सकते हैं।
श्री कृष्ण! तुम ईश्वर नहीं-- झट कह देगा-- "हाँ, मैं ईश्वर नहीं।"
लीजिये नटखट ने नकार दिया ईश्वर को, अब आप जानो आपका काम जाने।


चन्द्रवंशी सोलह कलाओं के स्वामी का बाल रूप भी कैसा अनुपम, कैसा अनिर्वचनीय, सांवला-सा, सलोना-सा, मनमोहना मेरा। माथे पर झूलती घुंघराली लटें,बांकी चितवन, धूल में लिपटा, मुख में माटी और माथे पर मोरपंख धरे, करधनी की रुन-झुन से कण-कण को कृष्णमय करता उस पर भोली-सी सूरत।
कहते हैं रसखान-


या लकुटी अरु कमरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥


कैसा अद्भुत सरल स्वभाव है इस वन माली का। कोई सखा एक पुष्प, एक गुंजा, एक आम्र किसलय ले आये तो अपनी काली अलकों में खोंस लेगा, सबको दिखलाता घूमेगा। गोपियाँ तनिक-सी छाछ, तनिका-सा माखन देती हैं तो आगे पीछे नाचा घूमता है।
द्वारका के वैभव से सुदामा कहीं और अधिक अपने दीन होने का बोध न कर बैठें तो कान्हा चपल हो मित्र सुदामा से पूछते हैं-
'भाभी ने मेरे लिए क्या उपहार भेजा है? यह बगल में आप क्या दुबकाए हैं?" कहते हुए खींच लेते हैं पोटली। "अरे वाह! इतने उत्तम चिउड़े'' जैसे महीनों से क्षुधातुर अन्न पर टूट पड़ा हो। न हाथ धोये, न आसन ग्रहण किया। कर्ता होने के अहंकार से अछूते हे मुरारी! सखा भाव निभाना तो कोई तुमसे सीखे। रूठे को मनाने में मोहन को बड़ा आनंद आता है, किन्तु अभिमान के कारण कोई मान करे तो? तो अभिमान तो नष्ट करेगा किन्तु सुयोग्य बनाने के लिए।


पांडवों के दूत बनकर हस्तिनापुर गये तो दुर्योधन के भोजन के अनुरोध को विनम्र हो मना कर दिया और पहुँच गये विदुर घर... "चाची! चाची! बहुत भूखा हूँ.." द्वार पर रथ से कूद पड़े और वहीं से पुकार उठे, भावविह्वला विदुर पत्नी भी कृष्ण की मधुर आवाज़ सुन भूल उठीं सुध-बुध, केले का गूदा फेंकती जा रहीं थीं और छिलके कृष्ण को देती जा रहीं थीं। "अहा! बड़े मधुर और स्वादिष्ट है फल" और कृष्ण भी थे कि बड़े उल्लास से छिलके खाए जारहे थे। कृष्ण रागी है तो पराकाष्ठा का और बिरागी है तो भी पराकाष्ठा का।
एक युगपुरुष, एक योगीश्वर, एक कुशल राजनीतिज्ञ, धर्म, दर्शन और योग का पूर्ण वक्तव्य, जाति-पांति, रंग-भेद जैसी समस्त मान्यताओं को धता बताता एक सम्पूर्ण पुरुष जिनके जीवन का प्रत्येक पल-छिन सकारथ था। कृष्ण को अपनों के सम्मुख हार जाने में अपनी प्रतिज्ञा तोड़ देने में हिचक नहीं थी, इसे तो रण छोर कहो, माखन चोर कहो, कुछ भी कहो यह तो अपना बनाने का संकल्प लिए मानव रूप में जन्मा था। स्वयं अपने लिए कहते हैं कृष्ण-


"अयम् आनन्दस्वरूपः आत्मैव सर्वस्यापि जीवस्य आनंदित्वे कारणम्"


- नीता पोरवाल

रचनाकार परिचय
नीता पोरवाल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (2)विमर्श (1)जो दिल कहे (1)भाषांतर (3)