सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

प्रकृति अनकहा चीन्ह लेती है

एक दम मत रीझो
थोड़ा गुज़र लो
रास्ते के पेड़ इंतज़ार करते हैं

यह बोध थोड़ा छोटा है
पहले ख़ुद निचड़ लो
फ़िर नदी के साथ हो लेना
वह आस्था का नहीं
गहराई का पाठ है

यह मत कहना ठहर गए
यह भी संभव है कि
तुमने गिरती बारिश को ही अंतिम मान लिया
जबकि बारिश आँखें और दृश्य के बीच महज एक पड़ाव है
कुछ बारिश कभी नहीं रुकती

सब कुछ समझने की नादानी नहीं ओढ़ना
वक़्त के साथ बर्फ़ पिघल जाती है,
ककून अपने ही कवच को छोड़ देते है,
अदृश्य हो जाती हैं सड़कें गलियों और  मोड़ों पर,
क़ब्र की देह तब्दील हो जाती है घास में
हो सकता है कुछ छूटे, कुछ अधूरा रहे, कुछ बीते
कुछ ख़त्म हो जाए
तब भी अपने कथा नहीं कहना

प्रकृति अनकहा चीन्ह लेती है


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संस्तुति

प्रेम एक अधिक समुद्र है
समुद्र एक अधिक लहर
लहर हवा को छूती है
हवा पेड़ को
पेड़ एक दिन झर जाता है
झर जाना प्राकृत प्रसंग है

हम यह झरना रोज़ देखते हैं
रोज़ हम पेड़, हवा, लहर और समुद्र से गुज़रते हैं
रोज़ाना विदा कठोरता से भरी है

प्रेम प्रकृति की अद्भुत संस्तुति है


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अनाम चीज़ों के लिए

दृश्य में कोई दीवार नहीं है
ज़मीन पर लेटी हुई एक शांत पत्ती
धीरे-धीरे अपने समय में डूबती है
सब ओर कोई नहीं है
वह पेड़ भी नहीं जो इसे विदा कर चुका

कीड़े दरकी हुई जगह को अपना आवास बनाते हैं
एक छोटा-सा मेहमान जो विदा हो गया
उसके क़दमों के निशान नहीं मिलते

कुछ चीज़ें इतनी अनाम हैं कि
अंत तक वे लिपिबद्ध नहीं होती

हम उस संसार को नहीं जानते
जो हमारे बीच अदृश्य हो जाता है


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प्रेम सबसे असुरक्षित है

अपनी बनाई हर छवि को तोड़ना चाहता हूँ
ऐसा इसलिए नहीं है कि मुझमें कोई सुभीता नहीं
या जानकार चीज़ों को नष्ट करना पसंद हो
वास्तव में यह एक द्वंद्व है

आप समझे जो चीज़ हमें बनाती है
उसका एक अंत है
ऐसे अनगिनत प्रयास हमें कहीं ले जाकर छोड़ देते हैं
बकरियाँ अपने निश्चित जीवन में सिर्फ़ उस खूँटे को याद रख पाती हैं
(बकरियाँ अपने निश्चित जीवन में सिर्फ़ खूटे को याद रख पाती हैं
उस इंसान को नहीं जिसने उसे गाड़ा
लेकिन यह बकरियों की स्मृतिहीनता नहीं
अधिक बार गहन संवेदनाएँ मौन होती हैं)
जो ज़्यादा गहराई से नहीं गड़ा बल्कि वह गड़े रहने की फ़्रेम है
यह उस कोटर की तरह है जो अपने भीतर आसमान रखती है

प्रेम सबसे असुरक्षित है
इसमें लपटो, धसों, घिरो
हर बार अपूर्ण रहने की व्याप्ति
कविता का ग्रीस है

जीवन की हर लड़ियों में इसे चुना जाना बेहतर है
इसमें कोई छवि या समाहित का अंत नहीं


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जीवन का स्थापत्य

लगभग नामुमकिन हो चुके शब्द
लौट आने के लिए बाध्य करते हैं
जीवन का स्थापत्य विविध है
मैं फ़िर कहता हूँ–

निराशा का मूल्य कीमती है
इसे दोहराया नहीं जा सकता

जो हार रहा है उसकी भी एक जगह है
जो लौटा नहीं उसके निशान धूमिल नहीं
कहीं कोई पेड़, कोई गली प्रतीक्षारत है

समंदर से कीले उखाड़ता है
एक मछुआरा, एक नाविक
अपनी राह के अंतिम सवार है

धरती की पीठ से अपनी पीठ सटाए
एक किसान, एक श्रमिक
जड़ों के उत्तराधिकारी है

बदनाम जगहों में
लकड़ी के बुरादे जितनी सहिष्णुता बचाए
विचित्र है प्रेम की छोटी गली

किसी ग्रंथ या पुराण में नहीं
ज़िंदगी बंद दरवाज़े के पीछे का
अधिकतम सच है

जो जहाँ है
वह इस सच का अकेला गवाह है


- नीलोत्पल

रचनाकार परिचय
नीलोत्पल

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कविता-कानन (1)