सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- एलबम

दरवाज़े की घंटी बजी।
माँ ने और किसी समय की अपेक्षा ज़्यादा उत्साह से दरवाज़ा खोला। सामने हमेशा की तरह हाँफ़ती-सी, हाथों में दो-तीन पॉलीथीन, एक बड़ा पर्स, मोबाइल, गाड़ी की चाबियाँ लिए, शाम होते-होते पोनीटेल की जकड़ में बंध चुके बालों के साथ, सौम्या खड़ी थी।
माँ ने मुस्काराते हुए कहा, "बड़ी देर कर दी। तेरा इन्तज़ार करते-करते मैंने अभी चाय पी। आजा फ्रेश होले। मैं अभी बोलती हूँ लड़की को तेरे लिए चाय बना दे।"
"अभी थोड़ी देर में, मैं ख़ुद बना लूंगी, माँ। वैसे भी मुझे आपकी इस लड़की के हाथ की चाय ज़रा भी अच्छी नहीं लगती।" सौम्या ने ड्राइंगरूम में पहुँचकर अपना सामान डा्यनिंग टेबल पर रखते हुए कहा।
"ठीक है। तू ये बता, तुझे देर कैसे हो गई।" माँ ने बड़े दुलार से पूछा।
"अरे माँ जिस दिन जल्दी निकलना हो, उस दिन ये ऑफिस वाले ज़रूर निकलते-निकलते भी कोई काम सिर पर डाल देते हैं। सुबह से शाम तक मीटिंग-मीटिंग, बस मीटिंग। काम तो दरअसल यहाँ कुछ होता ही नहीं है। बाइ द वे मैं लेट कैसे हो गई। रोहित और नील तो दिख नहीं रहे हैं। वे दोनो आ तो रहे हैं न!
माँ ने जैसे कुछ छुपाते हुए-सा बताया, "नील का फोन आया था रास्ते में है। कह रहा था, बहुत ट्रेफिक है।"
"माँ…, प्लीज़ डोन्ट प्रोटेक्ट हिम। आइ नो हिम एन्ड हिज़ एक्स्क्यूज़िज़। कभी समय से कोई काम नहीँ कर सकता।…और आपके बड़े सपूत रोहित जी, उनका क्या प्रोग्राम है?"


माँ बिना कुछ कहे किचिन की तरफ़ मुड़ गईं।
"क्या हुआ अबकी बार क्या बहाना बनाया उसने?"
"बहाना नहीं। सचमुच निधि की तबियत खराब है, फिर बेटे के एग्ज़ाम सिर पर हैं। इसलिए नहीं आ पाएगा।"
"माँ क्यूँ हमेशा बेटों की तरफ़दारी करती हो। हमेशा उनके पास कोई न कोई बहाना होता है। क्या मैं काम नहीं करती? मेरा परिवार नहीं है? मेरी बेटी के भी पेपर्स हैं। मैं भी उसे अपने हस्बैन्ड के पास छोड़ के आई हूँ। उसका टैस्ट नहीं होता तो मैं तो उन दोनो को भी साथ लेके आती।"
"अरे छोड़ भी न अभी, जाने दे, इतने दिन बाद आई है, तू बैठ आराम से।" माँ ने बात खत्म करने की गरज़ से कहा।
पर सौम्या कहाँ रुकने वाली थी, "क्यूँ छोड़ू? माँ-बाप कोई मेरे अकेले के हैं? रोहित तो अपने परिवार के साथ यहाँ साल में चार बार भी नहीं आता होगा। मैं तो जानती थी ये दोनो ऐसे ही हैं। खैर रोहित को तो आना ही नहीं है। इस नील के बच्चे को पहुँचने दो, मैं बताती हूँ इसे। उसी का आइडिया था। रोहित भाइया को भी बोल देंगे। पापा का जन्मदिन सब साथ-साथ मनाऐंगे। दोनों एक जैसे, एक का अभी तक कुछ पता ही नहीं है और दूसरे तो आ ही नहीं रहे हैं।" कहते-कहते सौम्या ने आगे बढ़कर फैन की स्पीड तेज़ कर दी। और एक कुर्सी खिसकाकर दूसरी पर पैर फैलाकर बैठ गई।


माँ ने पानी का गिलास लाकर टेबिल पर रख दिया।
तभी सौम्या को जैसे कुछ याद आया हो, "पापा हैं कहाँ?"
"बालकॉनी में बैठे हैं। पूरी शाम वही बैठे रहते हैं, अंधेरा होने तक।"
"पापा भी न, पिछली बार मैं कितना समझा के गई थी कि शाम को नीचे उतर जाया करो। थोड़ा टहल लिया करो। जब आप नहीं होती होंगी तब तो अंधेरा होने के बाद भी वहाँ से उठना याद नहीं रहता होगा। ऐसे ही बिलकुल अकेले अंधेरे में चुपचाप बैठे रहते होंगे?"
"मेरे रहते भी कौन-सा मुझसे कुछ बात करते हैं। दिनभर स्टडी में और शाम होते ही बालकॉनी में। मैं तो अपना उतर जाती हूँ, नीचे। मिल-मिला आती हूँ सोसायटी में दो-चार लोगों से। महीने में चार दिन किट्टी में चली जाती हूँ। फिर सोसायटी के मंदिर में भी रोज़ कुछ न कुछ होता ही रहता है, सो वहाँ चली जाती हूँ। अब तेरे बाबा ठहरे पूरे नास्तिक। एक तो ख़ुद नहीं जाते। ऊपर से बड़बड़ाते रहते हैं मंदिर वालों पर कि जब देखों शोर मचाते रहते हैं। अब मेरा तो जो समय बचता है, इस सबसे, तो उसमें टीवी देखती हूँ। बस ऐसे ही समय कट जाता है।"


सौम्या ने माँ की बात का समर्थन करते हुए कहा, "वही तो है, माँ। इस एज में अपने आपको किसी न किसी काम में लगाए रहना चाहिए।"
माँ ने अपनी बेबसी ज़ाहिर करते हुए कहा, "क्या कहूँ, उनका मन अब किसी काम से जुड़ता ही नहीं और कोई यहाँ आसपास उनकी उम्र का, उनसे बोलने, बात करने वाला भी नहीं है…और जो कुछ वह पढ़ते-लिखते हैं, वह सब मुझे नहीं समझ आता जो मैं ही कुछ बात करूँ, सो मैं तो अपने में ही रहती हूँ।" माँ ने बात ख़त्म करने की गरज़ से लम्बी साँस लेते हुए इतना ही कहा, "चल ये सब छोड़, चाय बनाती हूँ तेरे लिए।"
सौम्या ने माँ को रोकते हुए कहा, "अभी रहने दो माँ नील को आ जाने दो तब मैं ही बना लूँगी। आप आराम करो, तब तक मुझे जो दो एक जरूरी फोन करने हैं उन्हें निपटा लेती हूँ।"

सौम्या की बात सुनके माँ किचिन में काम करती लड़की को कुछ समझाकर अपने कमरे में जाकर बैठ गईं। और उन्होंने टीवी पर अपना मनपसंद सीरीयल चला लिया। सौम्या ड्राइंगरूम में घूम घूमकर फोन पर बात करने लगी।

 

कुछ देर बाद नील भी पहुँच गया। सौम्या ने फोन पर बात करते हुए ही दरवाज़ा खोला और इशारे से ही उसे घड़ी दिखाते हुए उसके देर से आने पर गुस्सा भी जताया और फोन लेकर फिर कमरे में टहलने लगी। कुछ देर में जब सौम्या की फोन पर बात खत्म हुई तो देखा नील कहीं दिख नहीं रहा है। उसने माँ के कमरे में जाकर देखा तो वहाँ नील आराम से पैर फैलाए, माँ के बैड पर बैठा, अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था।
सौम्या जैसे उसे देखते ही फट पड़ी, "ये क्या है, तू पहले ही इतना लेट आया है और आते ही अपना लैपटॉप निकालकर बैठ गया। तेरा यही प्लान था न।"
"रिलेक्स दीदी। बहुत काम है, और तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे तुम बिलकुल तय समय पर आ गई थीं। जब मैंने माँ को फोन किया था तब तक आप भी नहीं पहुँची थीं। मेरा प्लान था इसलिए मैं आ गया और जो मैंने कहा था वो सब मैं लेके आया हूँ। वो वहाँ रखा है मेरे बैग में।" नील ने शरारत से आँखें नचाते हुए कहा।
"अच्छा तो तू आज ही खरीददारी करता हुआ आ रहा है।" सौम्या ने उसे घेरने की कोशिश की।


"नहीं भई। ये सब तो मैंने तीन दिन पहले ही फ्लिपकार्ट पे आर्डर करके मंगा लिया था। यू नो, आप मुझे कुछ नहीं कह सकतीं। मेरा काम हमेशा फिट रहता है। माँ की भाषा में 'एकदम अपटूडेट'। अब यहाँ देखो बिग ब्रदर, रोहित साब तो आए ही नहीं। आप जब से आई हैं तो फोन पे लगी हैं। माँ अपना सीरियल देखने में मस्त हैं। पापा कहीं दिखाई नहीं दिए। सोचा रेस्ट कर रहे होंगे। तो मैं भी चेन्ज करके अपने काम में लग गया।" नील ने सौम्या के सामने अपनी सफ़ाई पेश करते हुए कहा।
"पापा कहीं दिखे नहीं का क्या मतलब? वो बालकॉनी में थे न। वहीं होंगे। अभी मैं भी नहीं मिली। चल निकाल न सामान, वहीं चलकर सरप्राइज़ देते हैं, उन्हें। माँ प्लीज़ बंद करो न ये अपना बोरिंग सीरियल। चलो उठो, आप भी हमारे साथ चलो।" सौम्या ने आगे बढ़कर टीवी बंद करते हुए कहा।


नील भी उठकर बैग से सामान निकालने लगा। सामान में एक बड़ा-सा डिब्बा था जो खूबसूरत पैकिंग में लिपटा था, जिस पर सुनहले-चमकीले रिबन से बना एक फूल चिपका हुआ था, जिसमें पापा के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा था नील की तरफ़ से और साथ ही एक छोटा पैकिट था। नील ने वह छोटा पैकिट सौम्या की ओर बढ़ाते हुए कहा, "ये लो ये आपकी तरफ़ से पापा के लिए। इसके पैसे मुझे नक़द में चुका देना।"
"नक़द क्यूँ?’ सौम्या ने यूँ ही पूछ लिया।
"क्योंकि कल सुबह यहाँ से जाते हुए सब्जियाँ लेता जाऊँगा। यार गुड़गाँव में सब्जियाँ दिल्ली से भी मंहगी हैं।" नील ने जवाब दिया।
"दे दूँगी भाई। दे दूंगी। तू भी कहीं भी हिसाब-किताब शुरु कर देता है।" सौम्या ने नील को प्यार से झिड़कते हुए आगे कहा, "अच्छा ये बता केक कहाँ है?"
"केक भी है मैडम। बस साड़े आठ बजने दीजिए, केक, फेमिली साइज़ पीज़ा और कोक भी हाज़िर हो जाएगा।" नील ने सौम्या को बड़े ही नाटकीय ढंग से तसल्ली देते हुए कहा।


"तू ही खाना पीज़ा में तो माँ के हाथ की बनी दालमखनी ही खाउँगी।"
तभी माँ दोनों की बात के बीच में ही बोलीं, "तुझे कैसे पता मैंने दालमखनी बनाई है?"
"अरे माँ मुझे तो आपके दरवाज़ा खोलते ही पता चल गया था कि आपने क्या बनाया है। आपके हाथ की दालमखनी की खुशबू पूरे घर में भरी हुई थी।"
माँ ने घुटने पर हाथ रखकर पलंग से उठते हुए कहा, "अरे बेटा अब पहली-सी कहाँ बनती है। इतनी देर किचिन में खड़ा ही नहीं हुआ जाता। ये तो मैंने इस लड़की से बनवाई है। धीरे-धीरे इसी को सिखा दिया है, बनाना।"
"ओह नो! सच में इसने बनाई है? तब तो मुझे सोचना पड़ेगा। इसके हाथ की तो मैं नहीं खाऊँगी।" सौम्या ने नखरा करते हुए कहा।
तब तक नील ने सारा सामान उठा लिया और माँ के कमरे से बाहर निकलते हुए बोला, "अरे जो दिल करे खा लेना पर अभी तो पापा के पास चलो।"
"हाँ ठीक है चल वहीं चलते हैं" सौम्या ने पहली बार नील से सहमत होते हुए कहा।
पर माँ बैड से उठते हुए बोलीं, "अब तुम्हीं दो उन्हें सरप्राइज़-वरप्राइज़, मैं तो चलकर किचिन देखती हूँ। क्या किया लड़की ने?"
"नहीं माँ प्लीज़। आप भी आओ।" सौम्या ने जिद्द की।
…और नील और सौम्या माँ को लेकर ड्रॉइंगरूम से होते हुए बालकॉनी की ओर बढ़ गए। सौम्या ने दरवाज़ा खोलकर बाहर बालकॉनी में झांका फिर पीछे मुड़ते हुए बोली, "पापा तो यहाँ नहीं हैं।"
तभी माँ बोलीं, "नहीं हैं, तो वहाँ देख स्टडी में होंगे।"
सौम्या ने अचरज भरे स्वर में कहा, "वहाँ कब चले गए? मैं तो यहीं थी ड्रॉइंग रूम में। चलो फिर वहीं चलते हैं।"


तीनों एक साथ स्टडी में पहुँचे। कोने में रखे टेबल लैम्प की हल्की-सी रोशनी कमरे में फैली हुई थी। पापा काउच पर आधे लेटे हुए थे। लड़की टेबल से दवा उठाकर पानी के गिलास के साथ उनकी ओर बढ़ा रही थी।
माँ ने उसकी ओर देखते हुए कहा, "तू यहाँ क्या कर रही है? तेरा किचिन का काम हो गया?"
लड़की ने धीरे से जवाब दिया, "जी हो गया। बस बाबूजी के लिए चपातियाँ बनानी रह गईं हैं। वो बड़ी देर से आवाज़ दे रहे थे। टीवी की आवाज़ में आप लोगों ने सुना नहीं इसलिए मैं दवा देने चली आई।"
सौम्या ने आगे बढ़के पानी का गिलास और दवा लड़की के हाथ से ले लिए और कहा, "तू जा किचिन का काम देख, मैं देती हूँ दवा।" फिर पापा की ओर मुड़ते हुए बोली, "क्या पापा ये दवा तो आपको शाम को लेनी होती है। आप इसे इतना लेट ले रहे हैं। मैं जब पिछली बार आई थी, तब सारी दवाओं को अलग करके, उनकी अलग-अलग डिब्बियाँ बना गई थी। उन पर लेवेल भी लगा दिए थे। आप तो उसे देखके खुद ले सकते हैं। इसका क्या है, ये पढ तो पाती नहीं है। कभी कोई उल्टी-सीधी दवा दे दी, तो बस…! बैठे-बिठाए लेने के देने पड़ जाएंगे। लीजिए दवा लीजिए।"


पापा ने चुपचाप सौम्या के हाथ से दवा लेके निगल ली। लड़की किचिन में काम करने चली गई। पापा की तबियत ठीक नहीं लग रही थी, इस पर सौम्या को फिर बोलने का मौका मिल गया। वह झुंझला रही थी, "आप अपनी सेहत का ज़रा भी ध्यान नहीं रखते। आपकी तो साँस फूल रही है। मुझे लगता है सुगर टैस्ट कराए भी महीने से ऊपर हो गया। एक तो आपके बेटों को आपकी कोई फ़िकर नहीं है, ऊपर से आप दोनो ख़ुद भी सेहत के मामले में बहुत लापरवाही करते हो, आख़िर ऐसे कैसे चलेगा?"
नील ने सौम्या को टोका, "अरे मुझे किसी ने कुछ बताया ही नहीं। मैं फोन पर ही बोल देता, घर से ही टैस्ट के लिए सैम्प्ल कलेक्ट हो जाता।"
सौम्या गुस्से में बोली, "तुम तो रहने ही दो। इतनी ही परवाह होती तो यहीं रहते मम्मी-पापा के पास, वहाँ गुड़गाँव जाकर न रह रहे होते।"


नील सौम्या की बात के जवाब में इस बार थोड़ा ज़ोर से बोला, "दीदी प्लीज़ पापा के टैस्ट से भला मेरे गुड़गाँव शिफ़्ट करने का क्या कनेक्शन है? आपको पता है दिल्ली के इस कोने से रोज़ सुबह गुड़गाँव जाने में मुझे ढाई घंटा लगता था और लगभग इतना ही लौटने में। मैं इस तरह पूरी ज़िन्दगी रोज़ चार पाँच घंटे  ड्राइव नहीँ कर सकता।"
माँ जैसे बीच बचाव करती हुई बोलीं, "छोड़ो, अब आज के दिन ये सब बातें करके मन खराब मत करो। जिसको जहाँ आराम हो वहाँ रहे।" माँ की आवाज़ में इस विषय पर बोलते हुए गहरी हताशा थी। लगता था वह इस बारे में अब और कोई बात नहीं करना चाहती थीं पर भीतर कुछ था जो अपने आप बाहर आ रहा था, "तेरा तो ऑफ़िस गुड़गाँव में है, रोहित का तो यहीं दिल्ली में है, वही कौन-सा रहता है, हमारे साथ। सब अपनी-अपनी मर्ज़ी की करो।" बात ख़त्म करते-करते माँ की आवाज़ थोड़ी तल्ख़ हो गयी थी।


पापा ने दवा लेने के बाद काउच पर पैर फैला कर आँखें बंद कर ली थीं। सौम्या माँ की बात पर कुछ कहना चाहती थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी। नील ने जाकर दरवाज़ा खोला। केक और उसके साथ ऑर्डर किया हुआ सारा सामान आ चुका था। नील सारा सामान लेकर पापा के पास स्टडी में ही आ गया। उसने माहौल को हल्का करने के लिए जल्दी ही केक खोलकर उस पर सिक्स्टी एट नम्बर की मोमबत्ती लगाई और उसे जला दिया। साथ ही कमरे की ट्यूब लाइट भी ऑन कर दी। अब कमरे में खासी रोशनी थी।


रोशनी तेज़ होते ही माँ ने मोमबत्तियों को ध्यान से देखते हुए टोका, "अरे सिक्स्टी एट नहीं, पूरे सेवन्टी के हो गए। लो तुझे साल भी याद नहीं?"
नील ने तुरन्त अपनी सफ़ाई देते हुए कहा, "नहीं माँ, आपके हिसाब से सेवेन्टी होगा, पर ऑफ़िशियली सिक्स्टीएट ही सही है, मैंने नेट पर भी चेक किया है।"
"सिक्स्टीएट हो या सेवेंटी क्या फ़र्क पड़ता है?" पापा ने पहली बार पूरी आँखें खोलकर सबको देखते हुए कहा। फिर पैर नीचे लटकाकर बैठते हुए बोले, "तुम लोग आ जाते हो तो अच्छा लगता है।" सब उनकी ओर देख रहे थे। वे काउच के बगल में रखे एक नीले पैकिट की ओर इशारा करते हुए बोले, "कोई यहाँ हो, न हो, मेरे साथ यादें तो रहती ही हैं। आज सुबह भी में इस पुराने एलबम में तुम सबकी बचपन की तस्वीरें देख रहा था।"


माँ ने थोड़े आश्चर्य से पूछा, "इसे कहाँ छुपा रखा था आपने। मैंने तो इसे कबसे नहीं देखा।"
"ये हमेशा से यहीं मेरी किताबों की अलमारी में ही था।" पापा ने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा।
सौम्या काउच पर बैठकर पापा से लिपट गई, "पापा, यू आर द बैस्ट। आप हमसे कभी किसी बात की कोई शिकायत नहीं करते।"
बाप-बेटी को यूँ साथ देखके माँ की आँखों में नमी झिलमिलाने लगी। नील इस सबसे थोड़ा असहज हो उठा। उसने मोबाइल पर पापा की पसंद का वही पुराना गाना चला दिया और उसके साथ गुनगुनाने लगा, "दिन जो पखेरू होते, पिंजरे में मैं रख लेता। पालता उनको जतन से, मोती के दाने देता,…सीने से रहता लगाए।" गाना सुनके माँ भी मुस्कराने लगी।


चारों ने मिलके केक काटा। सबने साथ खाना खाया। उसके बाद बड़े बेटे रोहित का भी फोन आ गया। उसने भी पापा को जन्मदिन की बधाई दी। सब ख़ुश थे। पापा भी अब पहले से ज्यादा स्वस्थ और थोड़े कम उदास लग रहे थे।
रात सौम्या ने अपने घर के लिए निकलते हुए माँ से कहा कि वह कल ही डॉक्टर से इसी हफ़्ते में किसी दिन का अप्वाइंट्मेंट लेगी, जिससे पापा का प्रोपर मेडीकल चेकअप भी हो जाएगा और साथ ही वह किसी कॉन्सलर से भी बात करेगी, जो वहीं एक बार पापा से मिलने के बाद फोन पर लगातार उनके टच में रहेगा। जिससे बार बार उन्हें यूँ उदासी नहीं घेरेगी और वह स्वस्थ रहेंगे।"


माँ कुछ कहना चाहती थीं पर कुछ सोचकर चुप ही रहीं। नील सौम्या की डॉक्टर और कॉन्सलर वाली बात से पहले ही सहमत था। वह उस रात वहीं रुका और दूसरे दिन सुबह पास की मंडी से सब्जियाँ लेकर गुडगाँव निकल गया।
दो दिन बाद सौम्या का माँ के पास फोन आया, "शुक्रवार को तीन बजे का समय दिया है, डॉक्टर ने। पहले चेकअप होगा, फिर टैस्ट के लिए ब्लड का सैम्पल लेंगे और फिर उसके बाद वहीं ओल्ड एज कॉन्सिलिंग सेन्टर में कॉन्सलर उनसे बात भी करेगा। सौम्या ने पापा को दिखाने की जिम्मेदारी ख़ुद ही ली थी। नील को पता चला तो उसने कहा, "दीदी इस सबमें जो खर्चा होगा वो मैं दूंगा। आप बस मुझे बता देना, मैं आपके एकाउन्ट में ट्रान्सफर कर दूंगा।"


शुक्रवार के दिन सुबह से ही बहुत हड़बड़ी थी।
सौम्या ने ऑफ़िस से आधे दिन की छुट्टी ले ली थी। अपने पति नलिन को भी सख्त हिदायत दे दी थी कि लंच के बाद कहीं बाहर की मीटिंग न रखें और हमेशा की तरह अपना फोन भी साइलेन्ट पर न रखें क्योंकि स्कूल से आने के बाद बेटी नव्या घर पर अकेली होगी और अपनी किसी जरूरत के लिए वह उन्हें ही फोन करेगी। ट्रेफ़िक की वजह से डॉक्टर के पास पहुँचने में देर न हो इसलिए उसने पहले से ही कैब बुक कर ली थी। उसे अपनी ड्राइविंग पर अभी पूरा भरोसा नहीं था। ऐसे में वह अक्सर बहुत घबरा जाया करती थी। उसने पापा को भी समय से तैयार रहने के लिए बोल दिया था। प्रोग्राम यह था कि वह ख़ुद कैब से पापा को लेने जाएगी इसलिए माँ को साथ जाने की जरूरत नहीं थी, इसीलिए माँ ने मंदिर की अपनी मंडली के साथ कीर्तन में जाने का कार्यक्रम बना लिया था और कई दिनो से छुट्टी मांग रही लड़की को बोल दिया था कि बाबूजी के निकलने के साथ ही वह भी अपने घर चली जाए और साथ ही छ:-सात बजे तक वापस आ जाए। तब तक सभी लौट आएंगे।
पापा उस दिन सुबह से ही थोड़े असहज और अनमने थे। बड़े दिनों बाद कहीं बाहर जाना था। वह भी बेटी सौम्या के साथ। उसके स्वभाव से वह वैसे भी भय खाते थे। पता नहीं कब क्या कह दे! किस बात पर डांट लगा दे! सोचा सौम्या की माँ को साथ चलने के लिए कहें, पर वह तो वैसे ही अस्पताल के नाम से दूर भागती हैं। फिर सोचा चलो जो होगा देखा जाएगा।


दोपहर दो बजे सौम्या का फोन आया। बड़ी देर तक घंटी बजने के बाद पापा ने फोन उठाया। उतनी देर में सौम्या का पारा चढ़ चुका था। फोन के उठते ही बरस पड़ी, "क्या हुआ, फोन क्यों नहीं उठा रहे थे, आप? पता है, मुझे कितनी टेंशन हो जाती है!"
पापा जब तक बता पाते की तुम्हारी माँ मंदिर गई हैं और लड़की भी काम निपटाकर जाने की तैयारी में है। यहाँ वह अकेले ही हैं और फोन बाहर चार्जिंग पर लगा था इसलिए उन्हें नहीं सुनाई दिया।"
तब तक तो सौम्या और भी कई बातें फोन पर बोल चुकी थी। अंत में उसने बात को समेटते हुए कहा, "अच्छा अब सुनिए, मैं ऑफ़िस में एक जरूरी मीटिंग में फँस गई हूँ। मुझे निकलने में देर होगी। मैं कैब सीधे आपके पास भेज रही हूँ। आप कैब से अस्पताल तक पहुँचिए। मैं ऑफ़िस से सीधे अस्पताल ही पहुँचूंगी। और सुनिए मेरी माँ से बात हो गई है। उन्होंने बताया है कि आपकी स्टडी में टेबिल पर एक नीले पैकिट में आपकी रिपोर्ट्स रखी हैं। वो आप अपने साथ लेते आइएगा, और सुनिए, निकलते समय घर का ताला ठीक से बंद करके, उस लड़की को अपने घर जाने के लिए कह दीजिएगा। उसे साथ में अस्पताल लाने की जरूरत नहीं है। मैं तो पहुँच ही जाऊँगी।"


पापा ने जवाब में कुछ कहना चाहा पर तब तक फोन कट चुका था। सौम्या को मीटिंग की जल्दी थी इसलिए उसने भी दोबारा नहीं मिलाया।
जिस दिन जल्दी निकलना हो, काम और लंबा खिंचता चला जाता है। आज भी वही हुआ। सौम्या को तीन बजे तक अस्पताल पहुँच जाना था पर उसे तो तीन यहीं बज गए थे। वह अपनी केबिन में जल्दी जल्दी सामान समेट कर बैग में डाल रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। गुस्से में मुँह से निकला, "उफ़्फ़ इस समय कौन फोन कर रहा है?" देखा तो कोई लैण्डलाइन नम्बर था। फोन दो-एक बार बजके बंद हो गया। तब तक वह सामान समेट कर लिफ्ट तक आ चुकी थी। फोन फिर बजा, "उफ़्फ़ ये सेल्स वाले भी कभी भी फोन घुमा देते हैं।" उसने झल्लाते हुए फोन उठाया।
अस्पताल से फोन था, "मेम आप सौम्या माथुर बोल रही हैं?"
"हाँ मैं सौम्या बोल रही हूँ।"
"आपने पेसेन्ट दिव्य प्रकाश माथुर, उम्र 70 साल के लिए मेडिसिन ओ.पी.डी. में डॉ. खुराना से अप्वाइन्टमेन्ट लिया था?"
"हाँ लिया था पर थोड़ा लेट हो गई पर पेसेन्ट तो अब तक वहाँ पहुँच चुके होंगे। वह तो बहुत देर पहले निकल चुके थे। अभी तक पहुँचे नहीं!"
"मेम पेसेन्ट पहुँच चुके हैं। उन्होंने रजिस्ट्रेशन भी करा लिया था पर जब वो बाहर कॉरीडोर में वेट कर रहे थे, तो फेन्ट हो गए।"


"क्या? ओ माई गॉड। वे ऐसे कैसे बेहोश हो गए, जब निकले थे तब तो मेरी बात हुई थी, उस समय तक तो बिलकुल सही थे।"
"देखिए पैनिक मत कीजिए। उनको इमर्जेन्सी में भेज दिया गया है, थोड़ा स्टेबिल होते ही आइ.सी.यू. में शिफ्ट कर देंगे पर प्रोबलम ये है कि पुरानी कोई रिपोर्टस उनके पास नहीं हैं।"
"नहीं हैं मतलब? प्लीज़ चैक कीजिए। उनके पास एक नीले रंग का पैकिट होगा, उसी में सारी रिपोर्ट्स हैं।"
"मेम उनके पास से जो सामान मिला है वो यहाँ मेरे पास ही है। जिस नीले पैकिट की आप बात कर रही हैं, उसमें रिपोर्ट्स नहीं हैं।"
"रिपोर्ट्स नहीं हैं, तो क्या है?"
"मेम उसमें एक पुराना एलबम है।"
"ध्यान से देखिए उसी में रिपोर्ट्स भी होंगी। शायद अकेले में देखने के लिए एलबम भी उसी बैग में रख लिया हो।" फिर जैसे सौम्या को कुछ याद आया हो, "कहीं ऐसा तो नहीं एलबम वाले पैकिट से रिर्पोट्स वाला बैग बदल गया हो…" कहते-कहते सौम्या रो पड़ी। वह अपने आपमें ही बड़बड़ा रही थी, "यही एलबम तो हमेशा पलटते रहते थे। उसी को उठाके चल दिए होंगे।"


दूसरी ओर से फोन पर आवाज़ आ रही थी, "मेम आप घबराइए नहीं। मैं फिर से चैक करती हूँ। मेम इसमें कुछ बच्चों के पुराने फोटोग्राफ़्स हैं। कुछ बर्थ सर्टिफ़िकेट्स की फोटो कॉपीज हैं। कुछ पुरानी स्कूल के एडमीशन्स की, फीस की और कुछ मनीऑर्डर की रसीदें हैं और किसी ताले की एक बड़ी-सी चाबी है, पर उनकी अपनी मेडिकल रिर्पोट्स कहीं नहीं हैं। मेम आप इनकी रिपोर्ट्स अरेन्ज करके जितनी जल्दी हो सके यहाँ पहुँच जाइए। मैं थोड़ी देर में डॉ. खुराना से आपकी बात कराती हूँ। एक्चुअली आपकी कन्सेट के बिना हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। आइ होप यू अन्डरस्टैन्ड, आपको पेमेन्ट वगैरह की कुछ फ़ोर्मेलिटीज़ भी करनी होंगी।"
"उस ओर से फोन पर आवाज़ आती रही पर यहाँ सौम्या को सुनाई देना बंद हो गया था। कितना शौक था पापा को फोटो खींचने का। कितनी यादें, कितने पल उन्होंने संजो के रखे थे। शायद उस एलबम में सबसे ज्यादा फोटोज सौम्या के ही थे। हँसते-खिलखिलाते, दौड़ते-भागते, तितली पकड़ते, पतंग उड़ाते, ताजमहल देखते, गंगा में नहाते, पहली बार स्कूल जाते।…एक के बाद एक तस्वीरें एलबम से निकलकर हवा में उड़ रही थीं। वे धीरे-धीरे ई.सी.जी., सुगर, कॉलेस्ट्रॉल, किडनी फंक्शन टैस्ट और इको की रिपोर्ट्स में बदलती जा रही थीं।


पापा बिना किसी से कोई शिक़ायत किए, धीरे-धीरे मुस्कराते हुए, अपनी यादों को अपनी पलकों में समेटे, अपने अकेलेपन में सिमटते हुए, धीरे-धीरे आँखें मूँद रहे थे। उस एकान्त में कोई आवाज़ नहीं पहुँच रही थी। जो आवाज़ें वहा पहुँच भी रही होंगी, वे इतनी ठण्डी थीं कि उनसे पिघलके कोई शब्द नहीं बन सकता था। उनके होंठ कुछ कहने के लिए खुले थे पर वे जैसे कुछ कहते-कहते रह गए थे। या उनके होठों से जो शब्द निकले थे, वे बच्चों की हँसी बनके पुरानी किसी तस्वीर में छुप गए थे। लग रहा था दिव्य प्रकाश माथुर, सौम्या, रोहित और नील के पापा बड़े दिनो के बाद गहरी नीँद में सो गए हैं।


- विवेक मिश्र

रचनाकार परिचय
विवेक मिश्र

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कथा-कुसुम (1)