सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

मालिक तेरी मर्ज़ी से तो इनकार नहीं है
है कौन जो दुनिया में गुनहगार नहीं है

हैरान हूँ मैं नफ़रतें आपस की देखकर
इंसान को इंसान से ही प्यार नहीं है

कैसे तुझे मिलने के लिए वक़्त निकालूँ
छुट्टी भी नहीं है कोई इतवार नहीं है

क्या ख़ूब है कि रोज़ मेरे पास भी आये
कहता है कि ज़ुल्फ़ों में गिरफ़्तार नहीं है

अंदाज़ तेरा जान न ले ले मेरी सरवत
हालाँकि तेरे हाथ में तलवार नहीं है


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ग़ज़ल-

वो ही रिज़्क़-ए-हराम खाता है
जिसका ईमान डगमगाता है

मुश्किलें तो सभी पे आती हैं
वक़्त हम सबको आज़माता है

दिल में गर हो ख़ुदा तो सहरा में
अब्र-ए-रहमत उमड़ के आता है

तीरगी दहर से मिटाने को
रोज़ सूरज फ़लक पे आता है

ये चिराग़-ए-हयात है शायद
न ये जलता न बुझने पाता है

अब कोई अहतियात क्या रक्खे
वक़्त किस पर बता के आता है

फूल खिल जाये हैं मिरे दिल के
जब वो नज़रें झुका के आता है

देख के उनकी शोख़ियाँ सरवत
अपना ईमान डूब जाता है


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ग़ज़ल-

निगाहों से साग़र की क़ीमत घटा दी
जो मय अपनी आँखों से तुमने पिला दी

जियेंगे कहाँ तुम से हम दूर होके
कभी ये भी सोचा क़सम तो दिला दी

किसी बद्दुआ का असर अब न होगा
मेरी बूढ़ी माँ ने मुझे वो दुआ दी

उड़े ख़ुश्क़ पत्तों से अम्नो-अमां सब
आँधी ये नफ़रत की किसने चला दी

तेरी रहमतों की है मशकूर सरवत
करम उसने समझा जो तूने सज़ा दी


- सर्वत बानो

रचनाकार परिचय
सर्वत बानो

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ग़ज़ल-गाँव (2)