सितम्बर 2016
अंक - 18 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

मिले हस्ती को मा'ना चाहते हैं
हम उनके पास आना चाहते हैं

ग़ज़ल सा तुमको गाना चाहते हैं
वही मौसम सुहाना चाहते हैं

ज़ियादा तो न पाना चाहते हैं
तेरी नज़रों में आना चाहते हैं

निगह तेरी पड़े इतनी तलब है
कहाँ कोई ख़ज़ाना चाहते हैं

परिंदों को क़फ़स मत दीजिये वो
ज़रा-सा आबो-दाना चाहते हैं

रवानी है हवा सी सोच लीजे
किसे क़ैदी बनाना चाहते हैं

मुक़र्रर अफ़सरी अपनी हुई तो
तअल्लुक़ वो बनाना चाहते हैं

तमन्ना कर न दे बेसब्र हमको
तुझे हम भूल जाना चाहते हैं

बड़ी आहंग है ये बह्र वाहिद
ग़ज़ल हम गुनगुनाना चाहते हैं


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ग़ज़ल-

सुख़न को अदब का पता दीजिए
ग़ज़ल, शे'र मत्ला बना दीजिए

रहम कीजिए या सज़ा दीजिए
किया फ़ैसला जो बता दीजिए

न तारीफ़ तो बद्दुआ दीजिए
मगर मुह्र अपनी लगा दीजिए

जला दें न घर ही बुझा दीजिए
शरारों को अब मत हवा दीजिए

मेरे सब्र को और क्या दीजिए?
मेरी मुश्किलों को बढ़ा दीजिए


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ग़ज़ल-

फ़लक पर कहीं भी सितारा न था
हसीं जो लगे वो नज़ारा न था

हर इक ज़ख़्म मंज़ूर था बा-ख़ुशी
मगर तल्ख़ तेवर गवारा न था

उन्हीं गुलशनों में हैं ग़ुंचे खिले
जिन्हें बाग़बाँ ने सँवारा न था

तरफ़दारी उड़ते परों को मिली
मगर डूबते को सहारा न था

लगा क्यूँ हवा सी है छू कर गई
किसी ने भी मुझको पुकारा न था

बदर हो गए हैं वतन से हम्हीं
रही जब न ग़ैरत गुज़ारा न था

मरा जब वो क्यूँ लोग कहने लगे?
अजी हमने वाहिद को मारा न था


- वाहिद काशीवासी

रचनाकार परिचय
वाहिद काशीवासी

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ग़ज़ल-गाँव (1)