जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री ओम प्रकाश नौटियाल से ख़ास मुलाक़ात
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री ओम प्रकाश नौटियाल से ख़ास मुलाक़ात
 
 
 
 
ओ.एन.जी.सी. से महाप्रबंधक (इलैक्ट्रोनिक्स एवं कम्यूनिकेशन्स) के पद से सेवा निवृत होने के बाद साहित्य सेवा, शिक्षण, परामर्श एवं समाज सेवा में समर्पित श्री ओम प्रकाश नौटियाल का जन्म उत्तराखंड के देहरादून जिले के कौलागढ ग्राम में 16 जनवरी 1947  को एक साधारण सौम्य परिवार में हुआ। मूलतः उत्तराखण्ड वासी,  किंतु कुछ वर्षों से बड़ौदा इनका निवास-स्थान है। 
सहज भाव से, गहरी बात कह जाना इनकी रचनाओं की मुख्य विशेषता है। नौटियाल जी की अधिकांश रचनाएँ आम आदमी के संघर्ष, सामाजिक विसंगतियों, समस्याओं, बिगडते हुए राजनीतिक परिवेश, मानवीय रिश्तों, भारतीय संस्कृति के बदलते मूल्यों पर केन्द्रित हैं। दोहे, नवगीत, छंद और छंदमुक्त शैली पर आधारित इनकी  यथार्थवादी कविताओं को पाठकों और साहित्यविदों से भरपूर स्नेह और प्रशंसा मिली है।
 
साहित्य से गहन जुड़ाव के साथ-साथ, सेवानिवृति के बाद कक्षा बारह तक के बच्चों को गणित और भौतिकी तथा प्रबंधन के विद्यार्थियों को प्रबंधन पढ़ाना इन्हें बहुत प्रसन्नता देता है। बचपन से ही खेलकूद में विशेष रूचि लेने वाले नौटियाल जी, उत्तराखंड के निर्माण से पूर्व शतरंज में  उत्तर प्रदेश राज्य की अंतर-जिला प्रतियोगिताओं में देहरादून जिले का कई बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इन दिनों वह गुजरात व देश की बहुत सी साहित्यिक, तकनीकी एवं सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से अपना सतत योगदान दे रहे हैं। सरल स्वभाव, मृदुभाषी, संवेदनशील और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री ओम प्रकाश नौटियाल जी से प्रीति 'अज्ञात' के वार्तालाप के दौरान उनके जीवन के विविध पहलुओं और कृतित्व पर खुलकर चर्चा हुई।
 
प्रीति 'अज्ञात'- 'पीपल बिछोह में' के प्रकाशन के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई! सुन्दर मुखपृष्ठ, आपकी काव्य-रचनाओं और विविध शैली से सुसज्जित यह पुस्तक पाठकों का ध्यान आकर्षित कर पाने में सफल रही है। अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के बारे में जानकारी देकर हमारे पाठकों को लाभान्वित करें।
नौटियाल जी- 'पीपल बिछोह में' से पहले मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं,'साँस साँस जीवन' (काव्य संग्रह ) एवं 'पावन धार गंगा है'। 'साँस साँस जीवन' में मेरी 83 और मेरी पत्नी अर्चना नौटियाल जी की 5 कविताएं हैं। सामाजिक सरोकार और आम आदमी के जीवन से जुड़ी इन कविताओं में जीवन के सभी रंग हैं। इस पुस्तक की भूमिका डा. सरोजिनी प्रीतम जी ने लिखी है।
'पावन धार गंगा है' में मेरी 56 कविताएं हैं। इन कविताओं में अधिकांश के विषय सामाजिक हैं और हम सबके जीवन से जुड़े हैं। इस पुस्तक की भूमिका डा. सुनीता ’यदुवंशी’ जी ने लिखी है। इसके अतिरिक्त संयुक्त संकलन में सात पुस्तकें निकली हैं। इन पुस्तकों की सभी रचनाएँ उपरोक्त तीन पुस्तकों में उपलब्ध हैं।
 
प्रीति 'अज्ञात'- रचनाएँ लिखते समय आपके मस्तिष्क में प्रस्तुतीकरण को लेकर किस प्रकार के विचार घुमड़ते हैं? आप कविता के मुख्य अवयव किन्हें मानते हैं?
नौटियाल जी- मेरी अधिकतर रचनाएँ सामाजिक विसंगतियों, बदलते सामाजिक मूल्यों, व्याप्त भ्रष्टाचार, मानवीय रिश्तों, प्रकृति आदि पर आधारित होती हैं । लिखते समय मेरे मष्तिष्क में सदैव यह बात रहती है कि कविता आम आदमी तक पहुंच सके और वह उनके कथ्य का अर्थ आत्मसात कर सके। कोई भी रचना केवल साहित्यकारों व भाषा विशेषज्ञों के पढने समझने और विश्लेषण करने  के लिए ही नहीं होती, उसका असली उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब उसे आम पाठक समझ सके। हाँ रचना, यदि कविता है तो उसमें काव्यत्मकता अवश्य होनी चाहिए । पाठक को समझ आने के साथ-साथ उसमें रसानुभुति भी होनी चाहिए, तभी कविता दिल में उतर सकती है और अपनी छाप छोड़ सकती है । लावण्य ,लयात्मकता और गेयता भी कविता के वांछित अवयय हैं।
 
प्रीति 'अज्ञात'- आपकी साहित्यिक यात्रा के प्रारम्भ का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
नौटियाल जी- गर्मी की छुट्टियों में पिता जी शहर के पुस्तकालय से प्रेमचंद, वृंदावन लाल वर्मा, बंकिम चन्द्र, शरत चंद्र, दिनकर, जय शंकर प्रसाद जी आदि की पुस्तकें लाकर देते थे। मैं पुस्तक एक दिन में ही पढकर अगले दिन उनसे दूसरी लाने का आग्रह करता था। कभी कभी उन्हें कुछ संदेह भी होने लगता था कि मैं पुस्तकें पढता भी हूँ या नहीं। कई बार शायद यही परखने के लिए वह मुझसे पुस्तक का निचोड़ सुनाने के लिए भी कहते थे। दरअसल मैं पुस्तक उसी दिन रात में या फिर अगले दिन सुबह तक उनके कार्यालय जाने से पहले समाप्त कर उन्हें लौटा देता था, नई पुस्तक लाने की विनती के साथ। पिताजी सोचते थे कि मैं छुट्टियों में कहीं इधर-उधर आवारागर्दी में समय न बिताऊं इसलिए याद से वह शाम को मेरे लिए एक पुस्तक ले आते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि मैंने दसवी तक ही हिंदी के बहुत से प्रतिष्ठित लेखकों की पुस्तकें पढ ली थी। प्रेमचंद के तो लगभग सभी उपन्यास और कहानियाँ मैं तब तक पढ़ चुका था। पिताजी और माताजी सदैव ही मेरे प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं और साहित्य के प्रति बचपन से ही इतनी गहरी रूचि शायद उन्हीं की कृपा से पैदा हुई है। मेरी माताजी शिक्षिका थी और पढने की बेहद शौकीन। छ्न्दों का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। कभी-कभी अपने जीवन के  कुछ रोचक संस्मरण लिखती और सुनाती थीं । उनकी स्मरण शक्ति भी कमाल की थी ।
मुझे याद है मैंने अपने आप पुरानी नोटबुक्स के कोरे पृष्ठ निकाल कर एक डायरी बनाई थी और उसमें अपनी कविताएं लिखता था । मुझे बेहद दुख हुआ, जब वह डायरी कहीं खो गई। मुझे अब भी उन कविताओं को पढने की बडी इच्छा है। मेरी साहित्यिक यात्रा शायद तभी स्कूल जीवन से शुरू हो गई थी । 
 
प्रीति 'अज्ञात'- ओह, काश आपकी डायरी मिल जाए! आजकल लिखने से अधिक दुरूह किसी अच्छे प्रकाशन से प्रकाशित करवाना है। लेकिन आपका इस सन्दर्भ में अत्यन्त सुखद एवं रोचक अनुभव रहा है। 
नौटियाल जी- हाँ, सचमुच! यादगार अनुभव रहा है। मेरे प्रकाशक कानपुर के शुभांजलि प्रकाशन के डा. सुभाष चन्द्र हैं जिनके लिए प्रकाशन मात्र व्यवसाय ही नही है बल्कि उन्हें  हिंदी साहित्य से सचमुच दिल से प्रेम है। कुछ वर्ष पूर्व फ़ेसबुक और किसी पत्रिका में मेरी कविताएं पढकर उन्होंने मुझे बधाई दी और न जाने क्यों मेरे प्रशंसक बन गए और तब से लगातार मेरे संपर्क में हैं । मेरी दूसरी पुस्तक 'पावन धार गंगा है' का विमोचन तीन वर्ष पूर्व बड़ौदा की प्रेमानंद साहित्य सभा के सभागार में हुआ था। डा. सुभाष से मैं कभी मिला नहीं था । विमोचन में भी मैंने उन्हे यह सोचकर नहीं बुलाया कि कानपुर से इतनी लम्बी यात्रा करके छोटे से कार्यक्रम के लिए इतने कम नोटिस पर उनका आना संभव नही होगा, फ़िर व्यर्थ की औपचारिकता क्यों की जाए। कार्यक्रम छः बजे प्रारंभ होना था। मैं एक घन्टा पहले तैयारी का जायजा लेने पहुंच गया। हॉल में सब आवश्यक तैयारी लगभग हो चुकी थी, इस वक्त भीतर कोई नहीं था । एक युवक सबसे अगली कतार में अकेला बैठा था। मुझे देखते ही उठ खडा हुआ और बोला 'सर मुझे पहचाना?" मुझे स्टेज का बारीकी से निरीक्षण करते देख कर शायद वह मुझे पहचान गया था किंतु मैंने उसे नहीं पहचाना इसलिए इंकार में सिर हिला दिया। वह बोला, 'मैं शुभांजलि प्रकाशन से सुभाष हूँ।' मुझे उनके अचानक पहुंच जाने से खुशी तो बहुत हुई, साथ ही बड़ा ताज्जुब हुआ कि इन्हें कैसे जानकारी मिली! इतनी दूर से कैसे आज अचानक आ गए। इसी जिज्ञासा में मन में कई प्रश्न कौंध गए जो मैंने एक साथ उन पर दाग दिए। सुभाष ने कहा , 'सर, आपने कुछ दिन पूर्व फ़ेस बुक पर कहीं अपने कमेन्ट में इसकी चर्चा की थी, मैंने तभी बड़ौदा जाने की ठान ली थी। इतने कम समय में आरक्षण तो नहीं मिला। आज ही दिन में पहुँचा हूँ। रात 11बजे एक ट्रेन है, उससे वापस चला जाऊँगा।और हाँ, मैं 25 हार्ड बाउन्ड पुस्तकें गिफ्ट रैप करके लाया हूँ, विमोचन में पेपर बैक से मजा नहीं आता। ' सुभाष जी का यह जज्बा मुझे कहीं गहरे तक छू गया। विमोचन के बाद 10 बजे मैं उन्हें घर लाया और भोजन आदि के पश्चात स्टेशन छोड दिया। 
 
प्रीति 'अज्ञात'- आपकी लेखनी की गति को देखते हुए आशा है कि निकट भविष्य में आपकी नई पुस्तक पाठकों के समक्ष होगी। 
नौटियाल जी- जी, प्रीति जी। आगामी वर्ष में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित करने की योजना है। एक में तो मेरे दोहों, मुक्तक कुण्डलियों और घनाक्षरी का संकलन होगा और दूसरी में मेरी व्यंग्य तथा हास्य कविताएं संकलित होंगी।
 
प्रीति 'अज्ञात'- प्रारम्भ से ही आपकी खेलकूद में रूचि रही है। साहित्य से इतर, अन्य कोई गतिविधि, शौक़ या संस्मरण भी जरूर होगा; जो अब भी चेहरे पर मुस्कान ला देता है। 
नौटियाल जी- खेल कूद का शौक बचपन से ही था। माँ सरस्वती की सदैव कृपा रही, इसलिए पाठशाला की पढ़ाई के अतिरिक्त घर में पढ़ाई करने की विशेष आवश्यकता महसूस नहीं होती थी। खेल कूद में अधिकांश समय निकलता था। हम लोग क्रिकेट, फुटबाल, बैड़मिंटन, गुल्ली डंडा, शतरंज, कैरम आदि सभी खेल खेलते थे। उस जमाने में सभी बच्चों का पाठशाला के बाद का समय खेल के मैदान या किसी के घर के चौक या आँगन में ही बीतता था।
गर्मी की छुट्टियों में जब पिताजी ऑफिस चले जाते थे, तो पूरा दिन मस्ती में गुजरता था। नहर में नहाना, बागों में लीची, आम, जामुन, आड़ू आदि फलों  की तलाश में घूमना और फल चुराना हमारे प्रिय शौक थे। फल चुराने और फल मालिकों की गाली खाने का रोमांच फल खाने से भी अधिक  मजेदार लगता था। कच्चे पक्के आडू, अमरूद, प्लम खाकर दाँत खट्टे हो जाते थे, जिससे शाम को रोटी चबाने में तकलीफ होती थी। 
 
वयस्क होने पर गाँव की गतिविधियों में रुचि लेने का दायरा बढ गया । हमारे गाँव में हर साल दशहरे के अवसर पर रामलीला होती थी, जिसे हम सब सभी भाई बहन बिना नागा हर दिन देखते थे । बडा होने पर रामलीला की अन्य गतिविधियों जैसे समिति का गठन, चंदा वसूली, रिहर्सल आदि में भी मेरी रुचि और कुछ भागेदारी रहने लगी। कुछ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पिताजी को यह सब विशेष पसंद नहीं था, फिर रामलीला अक्टूबर में होती थी इसलिए पढाई का भी हर्ज होता था। फिर भी मैं चोरी छुपे कुछ समय निकाल कर रिहर्सल में बैठ जाता था। गाँव में रामलीला के दौरान बडे किस्से होते थे। एक साल किसी लडके श्याम( असली नाम नहीं है) को उसकी इच्छानुसार पार्ट नहीं मिला, उस पात्र के अभिनय के लिए किसी दूसरे का चयन कर लिया गया। दो दिन बाद पता चला कि राम नाटक के संवादों की हस्तलिखित मोटी नोट बुक गायब है। सभी को संदेह था कि यह श्याम का काम है, पर वह साफ मुकर गया। अब बहुत मुश्किल हो गई। रिहर्सल का काम रुक गया। वह पुस्तक कहीं उपलब्ध नहीं हुई क्योकिं शायद कई पुस्तकॊं का सहारा लेकर और अन्य जगहों के लोक प्रिय संवाद घुसा कर इस हस्तलिखित पुस्तक का जन्म हुआ था। मैंने समिति के सदस्यों  से कहा कि सात दिन आप लोग केवल गानों की रिहर्सल करो मैं दूसरी पुस्तक तैयार करता हूँ । किसी को इस बात पर भरोसा तो नहीं हुआ पर और कोई उपाय न होने के कारण अनमने मन से सब तैयार हो गए। सात दिन मैंने अपनी बहनों, मित्रों और अपनी याददाश्त के बूते पर हाथ से लिखकर पुस्तक तैयार कर दी। हर साल बिना नागा रामलीला देखना और फिर महीनों तक घर में वही संवाद बोलना, गाने गाना इसमें बहुत सहायक सिद्ध हुआ। यह शायद मेरी  साहित्यिक यात्रा का एक बडा पड़ाव था, जिससे मुझे बहुत आत्मविश्वास मिला। पुस्तक देखकर और पढकर सबके चेहरे खिल गए, सबने अपनी याद से छोटे-मोटे सुझाव दिए, जिससे संवादोंं में और दम आ गया। रामलीला संपन्न होने के बाद श्याम ही एक ऐसा शख्स था जो सबसे कह रहा था कि संवादों में मजा नहीं आया, बिल्कुल ही बदले हुए थे। उसकी इस हरकत से उस पर लगे पुस्तक चुराने के आरोप को और मजबूती मिली।
 
प्रीति 'अज्ञात'- हा,हा,हा...! लेकिन श्याम जी की इस करनी से एक उदीयमान लेखक की प्रतिभा पहली बार निखरकर आई। उनके प्रति धन्यवाद तो बनता है। 
नौटियाल जी- हा,हा,हा...! चलिए, आपकी पत्रिका के माध्यम से उनका हार्दिक धन्यवाद!
 

प्रीति 'अज्ञात'- अपने छोटे भाई के प्रति आपका अगाध स्नेह है एवं उनके बारे में आपने कई बार चर्चा भी की है। कुछ बताना चाहेंगे?अपने परिवार के बारे में भी कहें।नौटियाल जी- हम लोग छ बहनें और दो भाई हैं। मेरे माता- पिता अब इस संसार में नही हैं। माता जी शिक्षिका थीं, उन्हें पढने लिखने में अत्यधिक रुचि थी एवं उनका साहित्यिक ज्ञान सराहनीय था । पिता जी को हिंदी, इंगलिश के अतिरिक्त उर्दु का भी अच्छा ज्ञान था। मेरी पत्नी अर्चना नौटियाल शिमला से हैं। शालीन, मिलनसार, अटूट सेवाभाव और सदैव प्रसन्नचित्त रहने वाली अर्चना जी एक कुशल  गृहिणी हैं, पाक कला में निपुण हैं । शादी के बाद हमारे बड़े परिवार को एकजुट रखने के साथ उन्होंने सभी सामाजिक दायित्व खुशी खुशी निभाये हैं। उन्हें भी हिंदी साहित्य से विशेष प्रेम है और समय मिलने पर वह कविताओं और कहानियों के माध्यम से अपने उद्गार व्यक्त करती रहती हैं । मेरा एक पुत्र है जो PDPU  से MBA करने के पश्चात एक निजी कम्पनी में कार्यरत है। विनम्र , मृदुभाषी और प्रसन्न चित्त अनुभव एक संवेदनशील और आज्ञाकारी युवक है, जिसे खेलों विशेषकर शतरंज, क्रिकेट, फुटबाल में बेहद रुचि है

मेरा छोटा भाई ,जो मुझसे लगभग 14 वर्ष छोटा है ,ONGC,अहमदाबाद में  उपमहाप्रबंधक के पद पर कार्यरत है। अपने कार्य में महारथ हासिल होने के साथ-साथ उसे फोटोग्राफी, पाक कला और लिखने का भी शौक है। यद्यपि कार्यालय की व्यस्तता के कारण वह अपने इन शौक पर अभी समय मुश्किल से ही दे पाता है। हर विषय जो उसे रुचिकर लगता है उसके विषय का वह गहन अध्ययन करता है। यह बात मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ  कि उसके जैसे तकनीकी ज्ञान वाले लोग मुझे विरले ही मिले हैं । विशेषता यह है कि अपने ज्ञान को औरों के साथ बहुत ही रोचक और सरल अंदाज में साझा करने की उसमें  बेजोड़ प्रतिभा है। किंतु इन सबसे उपर जो एक गुण उसमें है वह है मुश्किल के वक्त अपने मित्रों, रिश्तेदारों की सहायता करना। मेरी पिछले चार वर्षॊ में अपोलो अस्पताल, अहमदाबाद में दो न्यूरो सर्जरी हुई। मेरे भाई ने मेरी सर्जरी से पूर्व, उस दौरान और तत्पश्चात मेरी बडी जिम्मेदारी और आत्मीयता से पूरी देखभाल की। मेरे छोटे भाई की पत्नी, मेरी पत्नी  की छोटी बहन भी है। शांत स्वभाव की मृदुभाषी और संतोषी शालिनी नौटियाल में अपनी बड़ी बहन के भी सभी गुण हैं। भाई के परिवार में एक लड़की और एक लड़का है। लड़की  NIT सूरत से B.E.करने के बाद आजकल  USA में M.S. कर रही है और वहाँ अपनी अतुल्य प्रतिभा के बल पर वह सभी को प्रभावित करने में सफल रही है परिणाम स्वरूप उन्हें वहाँ छात्रवृति के साथ साथ बहुत ही चुनौतीपूर्ण प्रोजैक्ट्स पर काम करने का अवसर मिल रहा है। सातवीं कक्षा में पढने वाला दिव्यांशु नौटियाल भी अपने पिता, माता और बहन की तरह बेहद प्रतिभासंपन्न है।
 
 
प्रीति 'अज्ञात'- आपने कई डिग्रियाँ अर्जित की हैं तथा विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य भी किया। शिक्षा के प्रति इतनी रूचि एवं कार्य के प्रति आपका समर्पण युवाओं के लिए प्रेरणा है। 
नौटियाल जी- पिताजी शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। सभी भाई- बहनों को उन्होंने उच्च शिक्षा दिलवाई। लडकियों की शिक्षा के भी वह पक्षधर थे, नतीजतन मेरी सभी बहनों ने भी शिक्षा प्राप्ति के बाद अध्यापन कार्य किया और कर रही हैं। मेरे ऊपर प्रभु की विशेष कृपा रही और अव्वल रहने के कारण मुझे हमेशा शिक्षा विभाग से अच्छी खासी रकम छात्रवृति के रूप में मिलती रही । डी ए वी कालेज से भौतिक विज्ञान में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर परीक्षा उतीर्ण करने के पश्चात मैंने नौकरी के लिये साक्षात्कार दिये और कई जगहॊं से नियुक्ति पत्र भी मिला। ओ ऐन जी सी में भी मैंने लिखित परीक्षा में सफलता प्राप्त की और तत्पश्चात हुए साक्षात्कार के बाद मुझे नियुक्ति पत्र मिल गया। बहुत सोचने- विचारने और मित्रों, संबंधिंयों से विचार विमर्श के बाद मैंने विभाग में सर्विस करना तय किया । उसका कारण एक तो यह था कि वहाँ वेतन अपेक्षाकृत कुछ अधिक था और बहनों की शादी वगैरह की जिम्मेदारी को समझते हुए यह एक कारंण निश्चय ही महत्वपूर्ण था। दूसरे नये क्षेत्र की चुनौतियों और विकास की संभावनाओं ने भी इस नए विभाग की ओर आकर्षित किया। ओ ऐन जी सी में मुझे पाँच वर्ष का बौण्ड देना था, जिसकी रकम लौटाना मेरे लिये संभव नही था। इसलिये इस दौरान एक दो बहुत अच्छी नियुक्ति होने पर भी मैं यहीं स्थायी होकर रह गया। इसका मुझे कोई अफ़सोस नही है बल्कि यदि अतीत की ओर नजर करता हूँ तो पाता हूँ कि ओ ऐन जी सी ने केवल आर्थिक संबल ही प्रदान नहीं  किया बल्कि मेरे व्यक्तित्व को भी बहुआयामी और मजबूत बनाया। इस संस्थान में रहते हुए मैंने पार्ट टाइम कक्षाओं द्वारा गणित में भी स्नाकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की और तत्पश्चात मैनेजमैंट में भी स्नाकोत्तर डीग्री हासिल की। ओ ऐन जी सी में मैं महा प्रबंधक (इलैक्ट्रोनिक्स और टेलीकम्यूनिकेशंस) के पद से सेवा निवृत हुआ।यहाँ के कार्यकाल में बहुत से बडॆ प्रोजेक्ट्स कार्यान्वित किये। समुद्र सर्वेक्षण में पार्टी चीफ़ की भूमिका निभाई, अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों के कई महत्वपूर्ण दौरे किये। असम, गुजरात, महाराष्ट्र समेत कई स्थानों पर नियुक्ति रही। विभिन्न संस्कृतियों को देखने-समझने का अवसर मिला। मैनें  कुछ अवधि के लिये कम्पूटर सोसायटी ऑफ इन्डिया के देहरादून चैप्टर के चेयरमैन का पदभार भी संभाला। इंडियन इन्सटिट्‍यूट ऑफ इलेक्ट्रोनिक्स एण्ड टेलीकम्यूनिकेशन्स इंजीनियर्स, बड़ौदा केन्द्र का भी चेयरमैन रहा। इसके आतिरिक्त शिक्षा के क्षेत्र में केन्द्रीय विद्यालय नजीरा, असम के चेयरमैन पद का कार्यभार भी संपन्न किया। यह सब इसलिये संभव हुआ क्योंकि शायद मैं लोगों का विश्वास जीतने में सफल रहा जो कि किसी भी क्षेत्र में आगे बढने के लिये अत्यंत आवश्यक है ।अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण, साथियों के प्रति सीधा सच्चा और ईमानदार व्यवहार, सतत ज्ञान अर्जित करने की जिज्ञासा के माध्यम से मैं अपने को औरों से कुछ अलग रखने में सदैव प्रयत्नशील रहा और बहुत हद तक सफल भी रहा।
 
प्रीति 'अज्ञात'- अधिकांशत: यह होता है कि हम सब व्यवस्था को दोष देते हैं। जो लोग समय का रोना रोते रहते हैं, ये वही लोग हैं जो हर माह छह उपलब्ध छुट्टियों के अलावा चार और लेते हैं। आपका जीवन सदैव अनुशासित रहा है, इसलिए इस मुद्दे पर आपकी राय जानना चाहूंगी।  
नौटियाल जी-  कुछ खास बातें जिन्होंने जीवन संघर्ष में मेरी बहुत सहायता की है, वह है समय की पाबन्दी, कार्य के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी तथा हर कार्य में व्यक्तिगत रूप से डूब जाने की प्रवृति। काम, व्यक्ति को बहुत कुछ सिखाता है। मैंने अकसर सरकारी कर्मियों को कहते सुना है कि अमुक काम उनका नहीं है वह क्यों करें! उन्हें उसे करने का वेतन नहीं मिलता है। कर्मचारियों को यह तो बिल्कुल स्पष्ट रहता है कि कौन सा कार्य उनका नहीं है किंतु उन्हें क्या करना है इस बारे मे वह हमेशा अनभिज्ञ पाये गये हैं । वास्तव में कार्य केवल इसलिये ही नहीं करना चाहिये कि उसकी एवज में पैसे मिलते हैं । काम करने में न केवल हमॆं अति संतोष की अनुभुति होती है बल्कि हर कार्य हमें अधिक आत्मविश्वासी, सुद्दढ बनाता है तथा बहुत कुछ सिखाता है व हमारे व्यक्तितव में निखार लाता है। सर वाल्टर ने कहा है -"परिश्रम हमें तीन आदतों से उबारता है ऊब, खराब आदत और जरूरत।" मैंने सदैव  इसी सिद्धांत का पालन किया है और इससे मुझे जीवन पथ पर चलना काफी सुगम हुआ है। अपने कार्यसंबंधी बातों की संपूर्ण और विस्तृत जानकारी , पहल करने का साहस और इच्छाशक्ति ऐसे गुण हैं, जिन्हें हर कोई सराहता है तथा जब भी कोई चुनौतीपूर्ण काम आता है आप उसका सामना करने वालों की कतार में अग्रणी होते हैं।  
 
प्रीति 'अज्ञात'- जी, सहमत हूँ। आत्मसंतुष्टि भी इसी से प्राप्त होती है। हस्ताक्षर के पाठकों के लिए आपका सन्देश। 
नौटियाल जी- अपनी एक कविता 'पीछे वाली पहाडी' से उद्धृत अंश द्वारा मैं पाठकों से यही कहना चाहूँगा -
"...धूप को पाना है 
तो पहाडी के पीछे से
स्वयं आना होगा बाहर,
तुम्हारे लिए 
कोई वहाँ धूप लेकर आयेगा,
मुझे शंका है!"
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संक्षिप्त परिचय
 
ओंम प्रकाश नौटियाल
जन्म स्थान देहरादून ,उत्तराखण्ड
जन्म 16 जनवरी 1947
M.Sc (Phy.) ,M.Sc.(Maths), MBA
FIETE, SM-CSI, M-ISTD, SM-IEEE, SM-EMS
EX. General Manager (ONGC)
EX. Chairman ,IETE ,Vadodara Centre
EX. Chairman, CSI  , Dehra Dun Chapter
 
संप्रति: साहित्य सेवा, शिक्षण, परामर्श एवं समाज सेवा
साहित्य सेवा: लगभग 600 कविताएं, विभिन्न विषयों पर अनेकों लेख, कहानी, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें: साँस साँस जीवन (काव्य संग्रह ), पावन धार गंगा है ( काव्य संग्रह ),पीपल बिछोह में ( काव्य संग्रह ) 
शीघ्र प्रकाश्य: दुक्के, चौके, छक्के (काव्य संग्रह )
संयुक्त संकलन: त्रिसुगंधि ( काव्य संग्रह ),अंजुरी (काव्य संग्रह ), तेरी यादें, काव्यमाल आदि 
 
संपर्क-सूत्र: 301, मारुति फ्लैट्स, गायकवाड कम्पाउन्ड
ओ.एन.जी.सी के सामने, मकरपुरा रोड, वडोदरा
गुजरात-390009 
दूरभाष: 0265-2635266
मोबाइल: 9427345810

 


- ओंम प्रकाश नौटियाल

रचनाकार परिचय
ओंम प्रकाश नौटियाल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)गीत-गंगा (1)विमर्श (1)ख़ास-मुलाक़ात (1)