अप्रैल 2015
अंक - 2 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी- कठपुतलियाँ
दीवार पर टंगी तीन कठपुतलियों में से दो कठपुतलियाँ बड़ी देर से किसी बात पर बहस कर रही थीं। पहली- "इतना न इतराओ खुद पर ,तुम कोई हमसे अलग नहीं हो, 5 साल से यूँ ही हमारे साथ दीवार पर ही तो टंगी हो..और कमरा भी ऐसा जो कभी खुलता ही नहीं, हमारी किस्मत की तरह बंद पड़ा है।
दूसरी कठपुतली- "इतराऊँ क्यूँ नहीं। तुमसे ज्यादा लोगों ने हमेशा मुझे प्यार किया है। जब मेरा मालिक मेरी डोर को अपने हाथ में लिए अपनी  उँगलियों में फँसाकर मुझे नचाता था तो तमाशा देखने आये लोग खूब तालियां बजाते थे। तुम..और तुम बस बीन बजाते ही  रह जाते। याद है कुछ? कठपुतली ने बड़े नाज़ से अपनी कमर से पहली कठपुतली को झटका दिया।
दूसरी कठपुतली के झटका देने से खीझकर, पहली कठपुतली ने तीसरी कठपुतली की ओर देखा।
तुम इतने समय से चुप क्यूँ हो? तुम कभी भी कुछ क्यूँ नहीं कहती? आज तो कुछ बोलो?
 
तीसरी कठपुतली दिखने में थोड़ी छोटी थी बिलकुल जैसे एक बालक। वो 5 साल से उन कठपुतलियों के साथ थी, लेकिन उसे कभी किसी तमाशे में जाने  का मौका नहीं मिला था। उसने इतने वर्षों तक  दुनिया को उन्हीं दो कठपुतलियों के अनुभवों और बातों के आधार पर जाना था। वो उन्हें सुनती लेकिन बोलती कुछ नहीं।
आज दूसरी कठपुतली के उससे बहुत बार आग्रह करने के बाद वो धीरे से बोली- मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि वक्त से पहले और क़िस्मत से ज़्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता, इसलिए हमें अपनी किस्मत पर भरोसा होना चाहिए और उसे आज़माने के लिए सही समय का इंतज़ार करना चाहिए।
उस छोटी-सी बालक कठपुतली कि बात सुन दोनों कठपुतलियां दंग रह गयीं।
 
हो भी क्यूँ न मित्रों, उसने बात ही इतनी गहरी कि थी। इतने में खटक-खटक की आवाज़ से उस बंद कमरे का दरवाज़ा खुला और एक लड़का कमरे में दाखिल हुआ।
अरे वाह कठपुतलियाँ, उम्म .....हाँ ....ये वाली छोटी कठपुतली अच्छी है (लड़के ने छोटी कठपुतली को साफ़ करते हुए कहा ) आज के मेरे पहले  तमाशे में मैं इसे ही  अपनी उँगलियों पर नचाऊँगा।
 वो लड़का उन कठपुतलियों के मालिक का बेटा  था। जो अपने पिता के अनुभवों से सीख कर अपने जीवन का पहला कठपुतलियों का तमाशा दुनिया को दिखाना चाहता था।
मित्रों ,सही तो कहा है किसी ने "वक्त से पहले और किस्मत से ज़्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता।" हम सब भी तो इस दुनिया में कठपुतलियों की तरह  ही तो हैं, जिन्हें अपने जीवन में किसी न किसी अच्छे तमाशे (अवसर) की आशा रहती है। लेकिन हम सब की डोर उस मालिक (ईश्वर) के हाथ में होती है, जो हमारे जीवन का हर क्षण तय करता है।

- श्रुति शर्मा

रचनाकार परिचय
श्रुति शर्मा

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