जुलाई 2016
अंक - 16 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

कहानी- ठगी

(साहित्य अकादमी से सम्मानित पंजाबी कहानी का हिंदी अनुवाद)
मूल रचनाकार- गुरबचन सिंह भुल्लर
 
ज़माना बदल सकता है पर वह किसी को बदलने के लिए मजबूर तो नहीं कर सकता। ज़मीन के हक की सीमा निश्चित हो सकती है, पर दिल की धरती में दबे हुए समय के बीजों को बार-बार अंकुरित होने से रोका नहीं जा सकता। सरदार लक्खा सिंह अब भी सवा सात गज की पगड़ी बांधते, लम्बा कुर्ता पहनते जिसके ऊपर सर्दियों में बंद गले का लम्बा कोट अच्छा लगता, चूड़ीदार पायजामा पहनते और हिरण की चमड़ी के साथ सजे हुए मुहड़े पर बैठते, जिस के सहारे चांदी के मुठ्ठे वाली छड़ी रखी होती।
किसी समय अपने गांव में ही नहीं, आसपास के गांवों में भी उनका सम्मान था। लोग सांझे कार्यों के लिए उनसे विचार-विमर्श करते अथवा सलाह लेते और निजी समस्याओं को सुलझाने के लिए उनकी सहायता की उम्मीद करते।
 
सरदार लक्खा सिंह जितने वफ़ादार राजा के थे, उतने ही अंग्रेजों के। लोग राजाओं व अंग्रेजों का जितना सम्मान करते थे, उतना सम्मान लक्खा सिंह को भी देते थे। यह उनके मान-सम्मान का ही प्रमाण था कि लोगों ने स्वयं उनको न्याय करने के अधिकार दिए हुए थे। छोटे-छोटे मसले उनके पास लाए जाते। उनके द्वारा किया गया फैसला दोनों पक्षों द्वारा मान लिया जाता। वह गांव में निकलते तो पास से गुजरते आदमी रूककर और झुककर फ़तह कहते और स्त्रियाँ पहले से निकाले गए घूँघट को और लम्बा खींचती हुई दीवारों के साथ सटकर खड़ी हो जाती और पाँव लगना कहती।
फिर एक ऐसा भूचाल आया कि यह शान-शौकत का शीश-महल उनके देखते-देखते गिरकर ढेर हो गया। पहले मुंडेर गिरी, अंग्रेज बोरिया-बिस्तर लेकर अपने देश भाग गए। फिर दीवारें गिरी, रियासतें टूटी और खुशी में चिल्लाते लोग कहने लगे, "अब रानियाँ, राजे पैदा करने की जगह आदमी पैदा करेंगी।" अन्त में नींव भी उखड़ गईं, जागीरदारी समाप्त हो गई और सरदार लक्खा सिंह जैसे जागीरदारों की जद्दी पुश्तैनी जमीन पर सीमा लगा दी गई। सरदार लक्खा सिंह काफी परेशानी में पड़ गए और उनको भी इस घट चुकी घटना की समझ नहीं आ रही थी।  अंग्रेज तो सात समुद्र पार से आए थे और चालाकियों व जबरदस्ती से मालिक बन बैठे थे पर राजाओं-जागीरदारों की मालकियत तो जद्दी-पुश्तैनी थी, तब यह कैसे हो सकता है कि पुश्तैनी हिस्सा छीन लिया जाए और ऐसी कोई भी अदालत न हो जहाँ शिकायत की जा सके।
 
इससे भी बड़ा दुख सरदार लक्खा सिंह को यह था कि वह सारा जीवन सरकार की वफादारी में लगे रहे। बल्कि सरकार भक्ति तो उनके खून में थी पर अब सरकार ने ही उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा था। चाहे सरकार के बताए हुए तरीकों के साथ, भावार्थ कुछ खेतों को बगीचा लिखवाकर और जमीन को सीमानुसार परिवार के सभी सदस्यों के नाम लगवाकर, वह जमीन काफी हद तक बचाने में सफल हो गए थे, पर यह तो चोरी का सामान छिपाने जैसा था। कहाँ वह खानदानी गौरव के साथ इस सब कुछ के मालिक थे, कहाँ सब की नजरों में वह कई तरह के झूठे सच्चे तरीके अपनाकर हाथ से निकल रही सम्पति को बचाने वाले बनकर रह गए थे।
अकेले किसी के साथ यह घटना घटी होती, तो वे सिर्फ अपनी छाती पीटकर रह जाते। यह न सही जा सकने वाली घटना सरदार लक्खा सिंह केवल इस लिए सह गए थे कि इस तूफान में सिर्फ उनकी ही जड़ें नहीं उखड़ी थीं। अंग्रेजों के जिस शासन में कभी सूर्य नहीं डूबता था, वह शासन स्वयं ही शाम के सूरज की तरह डूब गया था और जिन राजाओं के मुँह से निकले शब्द ही कानून होते थे, जिनको पलटने वाला कोई नहीं होता था। उन शासकों को नए कानून ने उलट के रख दिया था।
अंग्रेजों और राजाओं के इतने बड़े दर्द के सामने सरदार लक्खा सिंह जैसों के दर्द और उनके साथ घटी घटना का क्या महत्त्व था। बस यही सोच सरदार लक्खा सिंह के डूबते दिल को तिनके का सहारा थी। वह गांव में निकलते तो बहुत से लोग अब भी आदत अनुसार नमस्कार करते। कुछ पहले की तरह उठ कर खड़े हो जाते। औरतें अब भी घूँघट खींच कर एक तरफ़ खड़ी हो जाती और पांव पड़ना कहती। पर वे इतने भोले या अनजान तो नहीं थे कि लोगों के व्यवहार में आए सूक्ष्म बदलाव न देख पाते। उन्होंने बाहर जाना कम कर दिया और धीरे-धीरे अपनी हवेली एवं अपने दिल को ही अपनी जागीर बना लिया।
अगर हवेली से बाहर निकलने का मन करता, वह आमतौर पर अखबार पढ़ने के बहाने घर के द्वार के बाहर चबूतरे पर कुर्सी रखवा कर बैठ जाते। कोई नमस्कार कर के आगे चला जाता और कोई चबूतरे पर बैठकर बातचीत करने लग जाता। धीरे-धीरे अच्छी खासी चहल-पहल हो जाती। सरदार लक्खा सिंह को लगता जैसे पुराने दिन लौट आए हों, पर जल्दी ही यह अहसास उनको यथार्थ के समक्ष खड़ा कर देता कि बीत चुका समय और बह गया पानी फिर कभी नहीं लौटते। वह कोई बहाना बनाकर उठ खड़े हो जाते और नौकर को कुर्सी उठा लाने के लिए कह देते।
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पंडित हरी किशन आए तो सरदार लक्खा सिंह पिछले पहर की चाय पी रहे थे। नमस्कार के बाद उन्होंने आवाज़ दी, "भाई पंडित जी को बिठाओ।" पर इससे पहले कि अन्दर से कोई कुर्सी या मुहड़ा लेकर आता, पंडित हरि किशन ने दूर दूसरी तरफ़ पड़ी चारपाई खींचकर स्वयं ही उनके नज़दीक कर ली। चाय संयोग से बेटी ही लेकर आई। उसने चाचा जी की और सारे परिवार की कुशल-क्षेम पूछी। चाय स्टूल पर रखकर वह तो चली गई, पर पंडित जी के आशीर्वाद की लड़ी लम्बी होती गई। फिर वह सरदार लक्खा सिंह को कहने लगे, "क्या भाग्य है बिटिया का। बड़ा उज्ज्वल नसीब लेकर आई है। न इसे किसी से कभी कुछ मांगने की जरूरत, न इसके लिए किसी को कभी किसी यत्न की ज़रूरत। दोनों हाथों से दान करेगी और वाहेगुरु स्वयं इसके कार्य पूर्ण करेंगे।"
सरदार लक्खा सिंह बेटी को बहुत प्यार करते थे। इतना प्यार की उसकी कोई सीमा नहीं थी। माँ-बाप को सभी बच्चे एक जैसे प्यारे होने की कहावत को वह झूठला देते। बुराई उनके किसी पुत्र-पुत्री में नहीं थी, पर बेटी उनको सबसे प्यारी लगती। उसे देखते तो सरदार लक्खा सिंह की नजरें झुक जाती, कौन सा पिता कभी अपनी बेटी की भरी जवानी की तरफ़ सीधा देख सका है। वह जैसे चन्दन के टुकड़े में से तरासी गई हो। उसका सहनिम्र स्वभाव भी चन्दन की तरह सुगन्धी छोड़ता। एक पल के लिए वे चाहते ऐसी बेटी को अपने घर की तिज़ोरी में संभालकर रखें, पर दूसरे पल स्वयं अपने ऊपर हंस पड़ते। बेटी ने बी.ए. कर ली थी। सीखने के लिए इतना बहुत था। उनकी बेटी को कौन-सा साधारण घरों की लड़कियों जैसे नौकरी करनी थी। राजघराने में पैदा हुई थी। इसे किसी राजघर के आंगन का ही सौभाग्य बनना था। अब यह मोती घर की तिजोरी में सुशोभित नहीं होता।
 
पंडित जी से बेटी व उसके भाग्य की प्रशंसा सुनकर सरदार लक्खा सिंह बोले, ”हरी किशन, तुझे एक बात बताऊँ? और किसी को यह बताते हुए झिझकता हूँ। कुछ तो कहते हुए शर्म आती है और कुछ इस कारण कि मेरी यह बात कोई और समझेगा भी नहीं। पर आप ज्ञानी पुरुष हो। शायद आप समझ सकते हो। कभी-कभी लगता है, जैसे यह लड़की मेरी पुत्री न हो, माँ हो। मैंने कभी किसी को बड़ा नहीं समझा। और तो और, कई बार तो मैं सरदारनी की बात भी टाल जाता हूँ जो पूरा जीवन मुझसे ज़्यादा इस घर-परिवार की शक्ति बनी रही है। बेटों को मना कर देता हूँ। पर इस लड़की के आगे जैसे मैं उम्र में भी छोटा हूँ और अक्ल में भी। कई बार तो घर वाले मेरी इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं। अगर उनको किसी कारण यह लगे कि मैं उनकी बात नहीं मानूंगा तो वे इसे आगे कर देते हैं।" सरदार लक्खा सिंह हंस पड़े, "इसकी बात को मैं टाल नहीं पाता। ऐसा क्यों है, हरी किशन?"
पंडित जी मुस्कुराए, "होता है, सरदार लक्खा सिंह जी, होता है। यह जो सांसारिक रिश्ते-नाते हैं, जो हमारे बंधनों के कारण बनते हैं, यह मेरी बेटी है, यह मेरा बेटा है, यह मेरी माता है, यह मेरा पिता है, यह मेरा भाई है, यह मेरी बहन है, यह तो दिखने वाले रिश्ते हैं। इस संसार में बहुत कुछ ऐसा दिखता है जो माया है। बेटा होता है, पर वह बेटा नहीं होता। पिता होता है, पर वह पिता वाले फ़र्ज नहीं निभाता। बेटी होती है पर वह बेटी बनती नहीं। भाई होता है, पर वह दायीं बाजू नहीं बन सकता, पर कुछ रिश्ते सर्वकालिक होते हैं। लक्ष्मण के लिए राम बड़ा भाई भी था, पिता समान भी था। माता-पिता के लिए भी राम कोई साधारण बेटा नहीं था। वह उसकी महिमा के आगे बाकी सारे लोगों की तरह ही नत-मस्तक होते थे। माँ भागो को ही देख लो। किसी कमजोर घड़ी में भटके चालीस योद्धों के लिए वह बहु-पुत्री नहीं थी, मां थी, जिसने भटके हुए बालकों को डांट-डपट कर फिर रास्ते पर ला दिया। इस कन्या ने पुत्री बनकर आपके घर जन्म ज़रूर लिया है, पर हमारे पूर्वजों की परछाई बनकर आई है। रिश्ता पुत्री का है, पर लक्षण माता वाले भी है, बहन वाले भी।"
सरदार लक्खा सिंह ने ठण्डी सांस ली, "पर यह हवेली की ईंट है, पंडित जी किसी कोठरी में तो नहीं लगाई जा सकती, किसी महल-अटारी में ही लग सकती है। इस अमृत को संभालने के लिए सोने का बर्तन कहाँ से ढूँढू? सारी उम्र तो, किशन बेटियाँ राजा-महाराजाओं से भी घर में नहीं रखी जाती।"
"आज सोने के कटोरे के बारे में ही बताने आया हूँ, सरदार जी।" पंडित जी ने थोड़ा और पास आकर अपने आने का मनोरथ बता दिया। "इस ब्राह्मण के लिए सारी उम्र मीठे शब्द बोला करोगे व कन्या के भाग देखकर धरती को नमस्कार किया करोगे।"
 
लड़का सुन्दर था, लम्बा व सुडौल, पुराने जागीरदार। बहुत ज़्यादा ज़मीन थी। इज़्ज़तदार खानदान। किसी की क्या हिम्मत की कोई किसी तरफ़ से उंगली उठा सका। पढ़ा-लिखा और सब से बड़ी बात यह कि वह स्वभाव से विनम्र था- न कोई नशा न कोई बुरी आदत।
सरदार लक्खा सिंह की आधी तसल्ली तो लड़के का जागीरदार खानदान सुनकर ही हो गई। किसी गैर-जमींदार की इससे ज़्यादा भी शायद उनको स्वीकार न होती। वह पंडित जी को छेड़ने के लिए हंसकर बोले, "बाकी सब बातें तो ठीक है हरी किशन, तेरे विनम्र स्वभाव का हमारे विनम्र स्वभाव से कुछ तो अन्तर होगा। आप तो उसे अच्छा समझते हैं जो प्याज भी न खाता हो, पर सरदारों के बेटा अगर कभी-कभी प्याज खा भी लें, विनम्र स्वभाव कम नहीं होता।"
पंडित हरी-किशन ने सरदार लक्खा सिंह के व्यंग्य के पीछे की वह लोक-कथा पहचान ली जिसमें लड़का कभी-कभी प्याज खाता है, पर केवल उस दिन जब वह दो घूँट शराब पी ले और शराब उस दिन पीता है जिस दिन ताश की खेल हो जाए और ताश ...! कार्य करने की इस लम्बी-लड़ी वाली इस लोक कथा की तरफ़ से ध्यान हटाकर वे बोले, "सरदारजी आपकी बात ठीक है भी.... और नहीं भी। आप भी, देख लेना, पहले कभी-कभी प्याज खाते रहे हो, तो भी अपना खानदानी विनम्र-स्वभाव कभी नहीं छोड़ा। पर, छोटा मुँह बड़ी बात, शराब है तो आखिर राक्षसवृत्ति की चीज़ ही। लड़का हाथ तक नहीं लगाता।" 
"घर में सलाह करते हैं।", सरदार लक्खा सिंह ने अपनी छड़ी का चांदी का मुट्ठा पलोसते हुए कहा।
"सोने जैसी अच्छी है आपकी यह बात। सब से पहले सरदारनी की राय लो। बेटी को जितना माँ जानती है, पिता तो सात जन्म में नहीं जान सकता। बुजर्गो का कहना है, मां-बेटी का एक पर्दा होता है और फिर बाकी परिवार के साथ भी बात सांझी करो।", पंडित जी ने ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाई।
"पर सब से पहले और सब से ज़्यादा लड़की की सहमति की जरूरत है। बात तो उसकी सहमति से ही पूरी होनी है।", सरदार लक्खा सिंह ने स्पष्ट किया।
"सलाह एक बार नहीं, सौ बार करो।", पंडित जी पारिवारिक विचार-विमर्श का महत्त्व अच्छी तरह समझते हैं। "पर अगर सच पूछो, सरदार लक्खा सिंह जी, ठगी पंडित हरी किशन करवाएगा या होने देगा? वह भी आपके साथ? गांव का कोई आदमी मेरे बारे...."
सरदार लक्खा सिंह ने उनकी बात बीच में ही काट दी, "नहीं-नहीं हरी किशन, आप गलत समझ गए। आपकी अच्छाई के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। मेरे से ज़्यादा भला आपको कौन जानता है? मेरा मतलब यह नहीं कि ठगी हमारे साथ आप करवाओगे! बस यही चिन्ता है कि बर्तन वस्तु के योग्य हो और मोती उसी माला में पिरोया जाए जिसके लिए बना है।"
"सत्य है, आपका वचन सत्य है शत प्रतिशत। पर आदमी को कहीं तो दिल मनाना ही पड़ता है।" पंडित जी ने दांया हाथ अपनी छाती पर रख लिया, "मेरे ऊपर विश्वास रखो।"
"आपके ऊपर भरोसे में कोई कमी नहीं हरी किशन, पर नया रिश्ता जोड़ते हुए डर तो लगता ही है। आदमी का असली पता तो, पंडित जी, रिश्ता जुड़ने पर ही लगता है। किसी के दिल में झाँक कर किसने देखा है। अन्दर का रंग तो रिश्ते के बंधन में बंधने के बाद ही सामने आता है। पहले तो इधर-उधर की जांच-पड़ताल से ही सन्तुष्ट होना पड़ता है।"
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पूछ-पड़ताल और दिखलाने के बाद दोनों तरफ़ से तसल्ली हो गई! बात, बारात, लेन-देन आदि पर पहुँच गई। उधर विधवा माँ ने सब कुछ सुखजीत के ऊपर ही छोड़ रखा था। और सुखजीत की बातें कुछ अलग तरह की थीं। सरदार लक्खा सिंह इन बातों के अच्छी-बुरी होने का कोई स्पष्ट निर्णय न कर सके, पर उनको वह नयी और अनोखी ज़रूर लगी।
सुखजीत के पीछे-पीछे जब पण्डित हरी किशन के साथ सरदार लक्खा सिंह ने बैठक में प्रवेश किया, उनकी नज़र अलमारियों में रखी पुस्तकों पर पड़ी तो थी, पर उनका कोई विशेष ध्यान न खींच सकी।
अब उन्होंने अलमारियों के शीशों के पीछे ऐसे गौर से देखा, जैसे सुखजीत की बातों के पीछे की जड़ें ढूँढ़ रहे हों। उनका आना-जाना, उनकी रिश्तेदारियाँ और मित्रता जिन घरों के साथ थी, उनकी बैठकों में दीवारों के साथ टंगी बंदूकें, शिकार किए जानवरों की खाल ही देखीं थी। उनकी नज़र में किताबें पढ़ना विद्यार्थियों का काम था और ग्रंथ पढ़ना धार्मिक लोगों का।
 
सरदार लक्खा सिंह स्वयं कभी-कभी कोई अखबार पलट लेते थे। उन्होंने एक बार किसी अखबार में ही कंवर नौनिहाल सिंह के विवाह के बारे में पढ़ा था। वे स्वप्न देखते, बेटी की बारात आए तो हाथी-घोड़ों की लम्बी कतार हो। स्वप्न से बाहर निकल कर भी वह सोचते, चलो हाथी-घोड़े न सही, बैंड-बाजा, धूम-धमाका तो होना ही चाहिए। पर सुखजीत का फैसला था कि दो कारों में केवल घर के सदस्य ही आएँगे। ज़्यादा हल्ले-गुल्ले से क्या लाभ! यह सरदार लक्खा सिंह की जिद्द के ऊपर ही था कि वह नज़दीक के रिश्तेदार मिलाकर बारातियों की संख्या बढ़ाने के लिए तैयार हुआ था। कुछ तो रौनक हो।
सरदार लक्खा सिंह के पास भगवान का दिया हुआ इतना कुछ था कि दामाद का घर भरकर भी उनका अपना घर भरा-भरा रहना था। हथेली में पानी भरने से इस नदी का पानी खत्म होने वाला नहीं था। ठीक है, समय उनके बचपन वाला नहीं रह गया था जब उनके दादा, सरदार खुशहाल सिंह के सात हल जुता करते थे, आगे पीछे निकले हाथियों जैसे चौदह बैलों की घंटियों की मिली हुई आवाज़ पूरे गांव में सरदारी का शंख बनकर सुनाई देती थी। फिर जमीन उनके चाचा-ताऊ में बंट गई। पर फिर भी उनके चिकने बर्तन में चिकनाहट उतनी ज़रूर रच बस गई थी कि उसने, अगर जाना भी था तो जाते-जाते ही जाती। यह समय कम से कम उनके जीवन काल में तो आने वाला नहीं था। जमीन की सीमाएँ भी इस चिकनाहट को कम नहीं कर सकी थी। पर दामाद के घर में भी उसी परमात्मा का दिया हुआ सब कुछ था। सुखजीत का कहना था कि वह उनका घर अन्दर-बाहर से देख लें और वह चीजें दे दें जो इस घर में उनकी पुत्री के लायक नहीं है।
 
यह बात कहकर लड़के ने मामला बड़ा टेढ़ा कर दिया। माना कि सरदार लक्खा सिंह की हैसियत बड़ी ऊँची थी, पर यहाँ पर वह बेटी वाला था। और बेटी वाला भला, बेटे-वालों के घर के लिए ऐसी बात कैसे कह सकता था।
सरदार लक्खा सिंह पहले तो कुछ दिन दुविधा में रहे। विवाह की जैसी तस्वीर सुखजीत खींचता था, वह साधारण घरों के विवाहों से भी कुछ बहुत ही साधारण थी।
सरदार लक्खा सिंह, स्वाभाविक ही, बेटी का विवाह कुछ ज़्यादा ही ठाठ-बाठ के साथ करने के इच्छुक थे। जब डोली विदा हो, साथ में बहुत सा सामान भी हो। पर पंडित हरी-किशन के साथ ही सरदारनी के विचारों ने उनको उलझन में से निकाल दिया। कहाँ मिलते हैं लोभ लालच से परे आदमी आज-कल के जमाने में! साथ में लड़का ही घर का अकेला मालिक था। समधिन ने तो सरदार के गुज़र जाने के बाद उसे और लड़कों के विपरीत घर का सहारा देख, माला के साथ ही रिश्ता जोड़ लिया था। हमारी बेटी के जाते ही इसके अच्छे स्वभाव के कारण उसकी सास का माला के साथ यह रिश्ता और गहरा जोड़ देना था। बेटी मालकिन होनी थी, जो करना करे। उनका उद्देश्य तो बेटी का सुख था, बाकी बातें तो इससे बाहर की थीं।
"बेटी से पूछ लिया?" सरदार लक्खा सिंह ने पंडित हरी-किशन की उपस्थिति में ही सरदारनी से सवाल किया।
"पूछ लिया, अच्छी तरह पूछ लिया।", सरदारनी ने तसल्ली दी, "बेटी सहमत है।"
"क्या कहती है?" उन्होंने उतावले होकर पूछा। "वह क्या कहेगी।", सरदारनी मुस्कराई, "वह बोलकर थोड़ी बताएगी उसकी राय क्या है।"
"और फिर?" सरदार लक्खा सिंह ने स्वयं को मूर्ख जैसा बना महसूस किया।
यह विद्या हमारे-तुम्हारे वश में नहीं।", पंडित हरी किशन हंस पड़े। "ऐसी बातें लड़कियाँ मुंह से बोलकर तो माँ को भी नहीं बताती, माँ को बेटियों की आँखों में पढ़नी पड़ती है। यह बिना शब्दों की भाषा होती है, सरदार साहब, जो चेहरे का रंग और आंखों में पढ़नी पढ़ती है। यह सुनने की न होकर देखने की है।"
किसी भी भाषा में हो, बेटी ने अपनी इच्छा बता दी, सरदार लक्खा सिंह के लिए बात खत्म हुई।
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विवाह खूब धूम-धाम से हुआ। बारात और लेन-देन में सरदार लक्खा सिंह ने कुछ बातें सुखजीत की मान ली और कुछ बातें उससे मनवा लीं। पर अपने घर के ठाठ-बाठ और आए हुओं का स्वागत उन्होंने अपनी इच्छानुसार कर के अपने मन की इच्छाएँ पूरी कर ली।
बेटी कुछ दिन सुखजीत के साथ घूमने-फिरने और कुछ दिन ससुराल में बिता कर मायके चक्कर लगाने आई। उसके पहली बार ससुराल से लौटने तक के यह दिन परिवार के लिए बड़ी मुश्किल से बीते थे। वे सारे मिलने के लिए ही उतावले नहीं थे, बल्कि उसके नए घर का सच जानने के लिए भी उत्सुक थे। पर बेटी का खिलता हुआ चेहरा देखकर कुछ पूछने की ज़रूरत ही नहीं रही। उनके सब प्रश्नों के उत्तर मिल गए और सारी चिन्ताए दूर हो गई।
सुबह सुखजीत ने बेटी को साथ ही ले जाना था। सबने उसे छोड़ जाने के लिए जोर डाला तो वह हँसा, "इक्कीस साल आपने रखी है, इक्कीस साल हम रखेंगे। बाकी हिसाब उसके बाद सोचगें।"
सरदार लक्खा सिंह ने अन्दर जाकर कुछ गुस्से व कुछ शिकायत से सरदारनी को कहा, ”भला यह क्या बात हुई?"
सरदारनी हँसी, "आप तो बस....किस्मत वालों की लड़कियाँ ससुराल में ही अच्छी लगती हैं। हमें बस उधर से ठण्डी हवा आती रहनी चाहिए। लड़का, घर, परिवार, जायदाद सब कुछ हमारी इच्छा का मिल गया। अब बच्चों की तरह दिल छोटा मत करो।"
"यह तो सरासर अन्याय हुआ।" सरदार लक्खा सिंह ने बेबसी से आह भरी।
"इसके बदले पंडित जी का धन्यवाद करो व बेटी के साथ अपने मोह के बन्धन कुछ-कुछ ढीले करना सीखो।"
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सरदार लक्खा सिंह जलपान के बाद सुखजीत को आराम के लिए चुब्बारे पर ले गए। सामने गुरु नानक देव की बड़ी तस्वीर थी। सरदार लक्खा सिंह ने माथा टेक कर शीश नवाया। सुखजीत ने भी माथा टेका और पास पड़ी धूप जला दी। दायीं दीवार के ऊपर रियासत के राजा की तस्वीर थी। खूबसूरत बंधी हुई पगड़ी के ऊपर कलगी। पगड़ी के चारों ओर गले में हीरे-मोतियों की मालाएँ, शाही कुर्सी पर बैठकर पाँव चांदी के पायदान ऊपर रखे हुए। दाएँ हाथ में हीरो जड़ी मुठठे वाली तलवार और बायाँ हाथ कुर्सी की बायीं बाजू के आगे बने हुए सोने के शेर ऊपर टिका हुआ। सरदार लक्खा सिंह राजा की तस्वीर के आगे जा खड़े हुए। उनका हाथ-अपनी छड़ी के चांदी के मुठ्ठे ऊपर पहले से ज़्यादा कस गया, जिसके सोने का पानी अब घिस कर लगभग उतर ही चुका था।
सुखजीत हैरान था कि कितने साल हुए, रियासतें टूट गई, शासन खत्म हो गया, पर वे उस तस्वीर की तरफ़ अभी भी कितनी श्रद्धा के साथ देख रहे थे।
वह कुछ बोले तो सुखजीत का ध्यान उनकी तरफ़ हुआ। वह इस घर के साथ राज-घराने की पीढि़यों पुरानी सांझ के बारे में बता रहे थे। इस राजा की इनके पिता जी के साथ, इससे पहले राजा की इनके दादा जी के साथ व इस तरह इनसे भी कई पीढि़यों पहले रियासत को आरंभ करने वाले की इस परिवार के पूर्वजों के साथ। सरदार लक्खा सिंह के एक पूर्वज ने अपने योद्धाओं की अगवाई करते आरंभ के राजा के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते हुए युद्ध क्षेत्र में जान कुरबान कर दी थी। तब से ही राज-परिवार ने इस परिवार के साथ अपनापन बना रखा था। अपने दादा-परदादा से सुनी हुई यह गाथा उन्होंने बड़े गौरव के साथ अपने नए बने दामाद को सुना दी। उन्होंने इस पुरानी सांझ की एक उदाहरण देनी ही उचित समझी, "पुत्र जब भी राजा साहब इस गांव में आते स्वयं किले में ठहरते, पर घोड़े हमेशा हमारी नाद पर बांधते।"
सुखजीत चुप रहा।
"उनको दाल-दाना भी अपने बर्तनों में से डलता था।"
सुखजीत ने अब भी चुप रहना ही ठीक समझा। उन्होंने सुखजीत का विचार जानने के लिए नज़रें तस्वीर की तरफ़ से हटाकर उसके चेहरे की तरफ़ घुमाई। उनकी नि:शब्द नज़र सुखजीत से जैसे अपनी बातों की हामी भरवाने की प्रतीक्षा कर रही थी।
वह धीरे से मुस्कुराया, "पिता जी, हमारे घर से चने खाकर राजा के घोड़े पीछे से बस लिद्द ही छोड़ जाते होंगे?" सरदार लक्खा सिंह को अचनाक सदमा लगा और उनके चेहरे से एक परछाई तेज़ी के साथ गुजर गई। उनको समझ में नहीं आया कि वह क्या कहें और क्या न कहें। पर वे जल्दी ही संभल गए और सुखजीत के कंधे पर हाथ रखा, "बेटा जी, आप आराम करो, मैं भोजन-पानी का पता करता हूँ।" सीढि़याँ उतरते वे सोच रहे थे कि पंडित हरी-किशन की बताई सब बातें तो शत-प्रतिशत सही निकली। ऐसा दामाद दीया पकड़कर ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता। घर-परिवार व जमीन जायदाद में भी कोई कमी नहीं। बेटी भी सुखी है। फिर भी उनके साथ कहीं न कहीं ठगी हुई है।

- अनिता देवी कौंडल

रचनाकार परिचय
अनिता देवी कौंडल

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