जून 2016
अंक - 15 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बदलता मौसम और बदलते लोग
"मौसम बदल रहा है दोस्तो अपना खयाल रखिए
क्योंकि बदलता मौसम और बदलते लोग बहुत तकलीफ देते हैं"
 
आप सोच रहे होंगे इसमें ऐसा क्या नया कह दिया मैंने। ये तो बहुत पुरानी मिसाल है। लोगों की अक़्सर बदलते मौसम से तुलना की ही जाती है। आज ये सन्देश पढ़कर अचानक से कई बातें दिमाग की नसों में दौड़ गयीं, इसलिए मैं इस तुलना के साथ-साथ कुछ और भी कहना चाहती हूँ।
ये तो शाश्वत सत्य है कि बदलता मौसम तकलीफ देता है क्योंकि अचानक सर्दी से गरमी और गरमी से बारिश में शरीर को सामंजस्य बैठाने में समय लगता है।
 
मनुष्य एक समझदार प्राणी है, वो इन सारे मौसमों के लिए पहले ही तैयारी करके रखता है। सरदी के लिए गरम कपड़े, गरम तासीर का खाद्य और पेय पदार्थ भी। उसके साथ आज के आधुनिक युग में तापमान को सामान्य रखने में ए.सी.ने काफी मदद की है ताकि आधुनिक मानव हर मौसम में सुख से रह सके। आधुनिक तकनीकी ने मानव के काम इतने आसान कर दिए कि ए.सी. रुम में बैठकर ही पढाई, शॉपिंग, बिजनेस, जॉब के साथ रिश्ते-नाते भी निभा लेता है। गरमी के आने से पहले ही गरमी के कपड़े, कोल्ड ड्रिंक्स, आइस्क्रीम से घर का कोल्ड स्टोरेज भर लिया जाता है ताकि घर से बाहर निकलना ही न पड़े और निकलना भी पड़े तो गरीब नागरिकों की तरह गाड़ी से बाहर न निकलना पड़े। बारिश में रंगबिरंगे छाते और रेनकोट भी तैयार रहते हैंऔर सिर्फ संपन्न वर्ग ही नहीं गरीब तबका भी पूरी तैयारी करके रखता है। फर्क बस चादर का होता है। आजकल जितनी जिसकी चादर वाला फार्मूला नहीं चलता बल्कि लोग चादरों में जोड़ लगा लेते हैं कर्ज़ का। पर चादर आर्थिक स्तर के बढ़ने के हिसाब से पतली होती जाती है आजकल जितनी पतली चादर दिखावे का सामान उतना ही ज्यादा और दिखावे के इस माहौल में रिश्ते और भावनाएं ताक पर रख दिए गए हैं। 
 
लेकिन मौसम के नियमों के खिलाफ जब मानव ने अपने तौर तरीके बदल लिए तो मानव को बनाने वाली कुदरत ने भी मानव स्वभाव को अपना लिया। पहले कहा जाता था कि मानव गिरगिट की तरह रंग बदलता है पर अब तो मौसम ने भी ये गुण सीख लिया है.पूरे साल झेला है मौसम का ये रूप, कभी बारिश,कभी ठण्ड, कभी तूफान, कभी उमस..सारे बदलाव होते हैं आकस्मिक और अनिश्चतकालीन। यही वजह है कि मानव हर वक़्त हर मौसम के लिए तैयार रहता है। अब मानव ने बदलते मौसम से होने वाली तकलीफों से छुटकारा पाने के सारे इंतजाम कर लिए, मानसिक तौर पर तैयार हो गया, इसलिये अब लोगों के बदलने से होने वाली तकलीफों के लिए भी तैयार ही रहता है। इसकी वजह ये है कि आज आधुनिक युग में रिश्ते अपनी सुविधाओं से, अपनी सुविधाओं के लिए, भावनाओं के परिधानों को अपनी पसंद के परिवर्तनशील रंगों में रंग कर निभाए जाते हैं।
 
बस अब यही एक रास्ता बचा है हमारे पास कि बदलते हुए मौसम और बदलते हुए लोगों से होने वाली तकलीफों से बचने के लिए नहीं बल्कि उस बदलाव को सहन करने के लिए जन,अन्न,तन, मन और धन से खुद को हमेशा तैयार रखे क्योंकि मौसम और मानव दोनों ही कब, कैसे और कितना बदलेंगे इसका अनुमान लगाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन होता जा रहा है।
 
अब मौसम और मानव ये दोनों 'ऊंट किस करवट बैठेंगे', ये तो मुझे नही पता पर ये बताना अपना फ़र्ज़ समझती हूं कि ये मन बावरा है और मौसम बेईमान है। 
इसलिए संभलकर रहिएगा, हर बदलाव के लिए तैयार रहिएगा और अपना ख्याल रखियेगा। 
 
   "क्या हुआ जो रोज बदलते हैं मौसम
   बदलाव तो है ही नियति का नियम
   पर ये वादा करें चलो मिलकर आज
   मानवता को मिटने न देंगे आप और हम"
 

- प्रीति सुराना