मई 2016
अंक - 14 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

लोक कथा पर आधारित बाल कहानी- ऐसे बदली तकदीर

किसी नगर में एक गांव था। गांव बहुत ही खुशहाल व अमीर था। सारे गांव में एक केशव का ही परिवार था, जो बहुत ही गरीब था। ऐसा भी नहीं था कि वह सदा से ही गरीब था। वह भी अपनी जवानी के दिनों में बहुत धनी हुआ करता था लेकिन धीरे-धीरे उसकी दौलत उसके तीनों पुत्रों राम, श्याम और घनश्याम के कारण समाप्त होती गयी। वे तीनों बहुत ही आलसी और निठल्ले थे। पूरा-पूरा दिन वे गांव में यहां-वहां आवारा घूमते व शैतानियाँ करते। उन्हे बस अच्छा-अच्छा खाने व पहनने से मतलब था।

केशव को चिंता सताने लगी थी कि ऐसा ही हाल रहा तो एक दिन पुरखों के खेत व घर भी नीलाम हो जायेंगे। अतः उसे एक तरकीब सूझी। उसने तीनों लड़कों की शादी कर दी। उसने सोचा जब इनकी पत्नियां घर में आएंगी तो उन्हें थोड़ा-बहुत अपनी जिम्मेदारियों का एहसास भी हो जाएगा और वे धीरे-धीरे काम करना भी शुरू कर देंगें। लेकिन जैसा केशव ने सोचा था ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शादी के बाद तो वे और भी निकम्मे हो गए। अपना छोटा-मोटा कार्य जो वे पहले कर भी लेते थे, वह सब वे अब अपनी पत्नियों से करवाने लगे थे।

यह सब देखकर केशव और भी दुखी हो गया। घर में जो थोड़े बहुत रुपए थे, वो तो उसने इन तीनों की शादी में खर्च कर दिए थे। केशव को अब यह डर सताने लग गया था कि अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा सब कुछ नीलाम हो जाएगा और हम भीख मांगते नजर आएंगे। एक दिन उसने तीनों लड़कों को आने वाले खतरे से सावधान करवाया तथा उनसे मेहनत करने के लिए कहा। लेकिन केशव की बातों का तीनों पर कोई असर नहीं पड़ा।

स्थिति को देखते हुए अब केशव के पास एक ही चारा बचा था। उसने तीनों बहुओं को आने वाले खतरे से अवगत कराया। बहुएँ समझदार थीं और सब भला बुरा समझती थीं। इस स्थिति से निपटने के लिए सबने एक योजना बनाई। अब सबके पास इन आलसियों को सही राह पर लाने के लिए यह अंतिम योजना थी।
एक दिन केशव ने भरी पंचायत में यह घोषणा कर दी कि मैं अपने तीनों पुत्रों को अपनी जायदाद से बेदखल करता हूं और इन्हें मैं अपने घर में तब तक नहीं आने दूंगा, जब तक ये तीनों मुझे कुछ न कुछ कमा कर नहीं ला देते। इसके लिए केशव ने तीनों को छह महीने का समय दिया।


एक दो दिन तो इन तीनों ने यहां-वहां गुजारा कर लिया। लेकिन जब कोई भी गांव वाला इन आलसियों को अपने घर में मुफ्त की रोटियां खाने के लिए रखने को तैयार न हुआ तो उन्होने गांव में ही छोटा-मोटा कार्य करना शुरू कर दिया। लेकिन इन तीनों को कोई भी कार्य ढंग से न आने के कारण किसी ने भी इनको ज्यादा देर तक काम में न रखा। तीनों भाईयों को अब रुपए की कीमत का एहसास हो चुका था। वे अब अपनी गलती पर पछता रहे थे। अतः तीनों ने अब ठान लिया था कि वे गांव वालों तथा अपने घर वालों को कुछ कमाकर दिखाएंगे। इसके लिए उन्होने गांव छोड़कर शहर जाने का निश्चय कर लिया था।

राम और श्याम तो शहर चले गए लेकिन घनश्याम शहर की सीमा पर स्थित एक दरिया किनारे वाले गांव में ही रह गया। किस्मत से राम और श्याम को शहर में अच्छी जगह पर काम मिल गया। अतः उन्होंने दिन-रात जी-तोड़ मेहनत से काम करना शुरू कर दिया। घनश्याम दरिया के किनारे बैठ बांसुरी बजाता। गांव से आटा मांगता और उसकी छोटी-छोटी गोलियां बना के दरिया में मछलियों के लिए डालता। उसकी बांसुरी की आवाज को सुनकर अब रोज मछलियां आना शुरू हो गयी थीं। छह महीने बीतने को थे। जहां राम और श्याम दिन-रात एक करके अपने कार्य में जुटे थे, वहीं घनश्याम अभी भी मछलियों को ही आटा खिलाए जा रहा था।

एक दिन मछलियों के राजा ने मछलियों से कहा, "तुम उस घनश्याम का दिया हुआ आटा यूं ही डकार जाती हो। क्या तुम्हें इसके बदले उसे कुछ देना नहीं चाहिए?" सभी ने हां में सर हिलाया, पर साथ में अपनी यह असमर्थता भी प्रकट कर दी कि हम उसे भला क्या दे सकती हैं? इस पर राजा ने दरिया में मौजूद हीरे-मोतियों को उसे देने को कहा। सभी ने राजा की बात मानी। सैकड़ों मछलियों ने मुंह भर कर हीरे-मोती घनश्याम के पास किनारे पर उंडेल दिए। घनश्याम बहुत खुश हुआ।

घनश्याम के लिए इतने सारे हीरे-मोती यूं खुले में ले जाना सही नहीं था। अतः उसने इन हीरे-मोतियों को गोबर के उपले बनाकर उनमें छिपा दिया। छह महीने बीत गए थे। घर वाले तीनों भाइयों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। राम और श्याम शहर से बैलगाड़ी भरकर जरुरत का सामान तथा ढेर सारा रुपया लेकर आए। उन्हें देखकर केशव बहुत प्रसन्न हुआ। उनके पीछे-पीछे घनश्याम भी गधों में गोबर के उपले लादे हुए आ रहा था। सभी गांव वाले उस पर हंस रहे थे। केशव उसे देखकर बहुत नाराज हुआ, घनश्याम अपने पिता के पास गया और धीरे से उनके कान में कहा, "पिताजी, आप मुझ पर व्यर्थ में नाराज न हों। ये उपले सिर्फ गोबर नहीं हैं। इनके अंदर मैंने हीरे-मोतियों को छुपाया है। अतः आप इन्हें चुपचाप मुझे अंदर ले जाने दें।"
केशव ने देखा, उपलों के अंदर सचमुच हीरे-मोती थे। आज केशव को अपने तीनों पुत्रों पर गर्व महसूस हो रहा था। आज वह बहुत खुश था क्योंकि अब उसके तीनों पुत्र मेहनत करना सीख गये थे तथा वह अब गांव का पहले जैसा सबसे धनवान व्यक्ति भी बन चुका था। उसकी योजना ने उसकी तकदीर बदल दी थी।


- पवन चौहान

रचनाकार परिचय
पवन चौहान

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