मई 2016
अंक - 14 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पाठकीय

नई ऊॅंचाईयां छूती ‘हस्ताक्षर’: पवन चौहान


आज ई-पत्रिकाओं की धूम है। इन्हीं ई पत्रिकाओं में एक नाम उभरता है साहित्यिक पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ का। हस्ताक्षर को लगभग एक वर्ष से पढ़ता आ रहा हूॅं। इस पत्रिका में साहित्य की हर विधा का समावेश है। बाल साहित्य को अमूमन पत्रिकाएं स्थान देने से बचती रहती हैं लेकिन पत्रिका ने अपने शुरुआती दो अंकों के पश्चात ही मई 2015 में बाल साहित्य को भी अपनी पत्रिका में स्थान देकर बाल साहित्य और बाल साहित्यकारों के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है। यह पत्रिका एक संपूर्ण पत्रिका के रुप में हमारे सामने मौजूद है।

मार्च 2016 में पत्रिका ने अपना एक वर्ष सफलतापूर्वक पूरा किया है। पत्रिका ने अपने इस सफर में नए पाठकों को जोड़ा है और बहुत सारे नए व पुराने साहित्यकारों तक अपनी पहुॅंच बनाई है। पत्रिका वैसे भी हर अंक में नए व पुराने लेखकों को अपने साथ लेकर चली है। बहुत से नए रचनाकारों की लेखन के प्रति रुचि, उनकी रचनाओं में निखार लाने तथा उनमें आत्मविश्वास को बनाए रखने की एक सकारात्मक सोच को पत्रिका के प्रधान संपादक के. पी. अनमोल जी ने हमेशा ही बनाए रखा है। वे पत्रिका में हमेशा ही नवोदित रचनाकारों को स्थान देने के लिए आगे रहते हैं। पत्रिका ने अपने एक वर्ष के इस सफर में नई ऊॅंचाईयों को छुआ है और रचनाओं के चयन के साथ-साथ अपने स्तर को भी हर अंक के साथ सुधारा है। वेब पत्रिकाओं के क्षेत्र में ‘हस्ताक्षर’ ने अपनी एक खास पहचान बनाई है। पत्रिका का संपादकीय हर बार पठनीय रहता है। इसके लिए पत्रिका की संस्थापक व संपादक प्रीति अज्ञात जी बधाई की पात्र हैं। पत्रिका के नए अंक का इंतजार हमेशा बना रहता है। इस अहसास को मैं पत्रिका की सफलता के साथ जोड़कर देखता हॅूं।

अप्रैल अंक के ‘हस्ताक्षर’ काॅलम के अंतर्गत प्रीति अज्ञात जी जहां शराबबंदी, पानी की समस्या तथा आई. पी. एल. के रोमांच की बात की है वहीं संपादकीय के ‘चलते-चलते’ हिस्से में पत्रिका की सफलता के एक वर्ष के लिए सभी साहित्यकारों व पाठकों का तहे-दिल से शुक्रिया अदा किया है। यह संपादक का बड़प्पन है जो ऐसा कहकर सभी को अपने साथ जोड़े रखने की मुहीम का एक हिस्सा है। संपादकीय हमेशा की तरह इस बार भी पठनीय है। ‘कविता कानन’ स्तंभ में इस बार चार कवियों को पढ़ने का मौका मिला। जिसमें सुशांत सुप्रिय जी की नियति, अंतर, विनम्र अनुरोध; लीलाकांत नाईक की एक भगत था, खबरी, यदि; निशा चैधरी की छोटे शहर की कुछ ठरकी लड़कियां, अंतिम इच्छा तथा राहुल तिवारी की यादें व रोटी कविताएं अच्छी लगीं। इस पत्रिका के लिए एक बात जो मुझे हमेशा ही विशेष और अन्य पत्रिकाओं से अलग लगी, वह यह कि यहां हर अंक में के. पी. अनमोल जी किसी न किसी रचनाकार की किसी एक रचना पर अपनी बेबाक टिप्पणी देते हैं जो निश्चय ही एक नई बात है। यह नए रचनाकारों में एक नई ऊर्जा का संचार करती है और उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करती है।

 

अप्रैल के इस अंक से जहां दो नए काॅलम ‘अच्छा भी होता है’ और ‘पाठकीय’ शुरु हुए हैं, वहीं इस अंक से ‘खास मुलाकात’ तथा फरवरी अंक से ‘संदेश पत्र’ और ‘जरा सोचिए’ गायब मिले। ‘अच्छा भी होता है’ में उन घटनाओं/बातों को शामिल किया गया है, जो सकारात्मक अभिव्यिक्ति की बात करती है। इस बार इसमें शशांक शेखर जी ने अपने संस्मरण को साझा करते हुए कबूतर को बचाने की घटना का जिक्र किया है। पत्रिका में यह बदलाव अच्छा लगा। यह निश्चय ही नए पाठकों को भी पत्रिका के साथ जोड़ेगा और अपने अनुभवों से आगे रु-ब-रु करवाएगा। ‘पाठकीय’ में पत्रिका के पिछले अंक पर चेन्नई से रोचिका शर्मा जी द्वारा समीक्षात्मक टिप्पणी को स्थान दिया गया है।


‘कथा-कुसुम’ काॅलम के अंतर्गत वंदना गुप्ता की कहानी ‘ब्याह’, डाॅ. लवलेश दत की ‘वीजा’ और सुरेश वाहने की लघुकथा ‘नई पृथ्वी’ को शामिल किया गया है। ‘ब्याह’ में एक औरत दूसरी औरत को एक बार फिर निशाने पर ले आती है और झूठे इल्जाम लगाकर अपने गुनाह को छुपाती है। यह कहानी औरत की निम्नतम सोच और गंदे इरादों को दर्शाती है, जिसके कारण उसे अपने बेटे तक को खोना पड़ जाता है। ‘वीजा’ कहानी में लेखक ने माॅं-बाप के बूढे़ हो जाने पर अपने बच्चों द्वारा उन्हे न अपनाने की तकलीफ को बखूबी दर्शाया है।

‘आलेख’ काॅलम में निशा कुमारी का असगर वजाहत के उपन्यास ‘मन माटी’, शिप्रा किरण द्वारा हरिशंकर परसाई की वैचारिकी और रचना प्रकिया, कैलाश चंद्र की मीडिया और समाज पर बात, धीरेन्द्र सिंह की आदिवासी समाज पर बात तथा प्रेम नारायण का पुरुष बनाम नारी अस्मिता आदि के अंतर्गत बहुत से महत्वपूर्ण पहलुओं को छुआ है। ‘छंद संसार’ में इस बार युवा रचनाकार मानस मिश्रा के सुंदर दोहों को स्थान मिला है। ‘स्मृति’ स्तंभ में इस बार राहुल सांकृत्यायन और फणीश्वर नाथ रेणु के संस्मरण हैं, जो निश्चय ही पढ़ने योग्य हैं। हमेशा की तरह ‘मूल्यांकन’ में इस बार के. पी. अनमोल युवा शायर शिज्जु शकूर के गजल संग्रह ‘जिन्दगी के साथ चलकर देखिए’ की विस्तृत समीक्षा के साथ विद्यमान हैं। ‘गजल की बात’ के अंतर्गत खुर्शीद खैराड़ी की यह तीसरी किस्त है, जिनमें खुर्शीद जी गजल को रचने की विधा को सीखा रहे हैं। गजलकारों के लिए यह बेहद ही महत्वपूर्ण है। उन्हे इसे जरुर वांचना चाहिए। ‘खबरनामा’ में इस बार डाॅ. सीता शर्मा ‘शीताभ’, के. पी. अनमोल तथा सुरेन विश्नोई ने विभिन्न स्थानों में हुए साहित्यिक कार्यक्रमों की खबर पेश की है। ‘व्यंग्य’ में आरिफा एविस का राजनीति पर करारी चोट करता हुआ व्यंग्य ‘शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार’ बहुत कुछ कह जाता है।

 

हायकु’ काॅलम में प्रियंवदा जी के हायकु हमारा ध्यान खींचते हैं। ‘उभरते स्वर’ पत्रिका का वह स्तंभ है, जिसके अंतर्गत साहित्य के क्षेत्र में कदम रख रहे रचनाकारों को अपनी अभिव्यक्ति का मौका प्रदान किया जाता है। इस बार युवा गजलकार मोईन खरादी ऐजाज की दो गजलें इसमें प्रकाशित हुई हैं। ‘बाल-वाटिका’ में इस बार डाॅ. भारती वर्मा बौड़ाई के दो बालगीतों को स्थान मिला है। जो एक नयापन लिए हुए हैं। ‘रचना समीक्षा’  के अंतर्गत इस बार के. पी. अनमोल जी ने युवा बाल साहित्यकार शादाब आलम की रचनाशीलता तथा के. डी. चारण जी ने हस्ताक्षर के महिला विशेषांक में प्रकाशित कहानीकार रजनी मोरवाल जी की कहानी ‘रिंग-अ-रिंग’ पर अपने समीक्षात्मक लेख प्रस्तुत किए हैं।

पत्रिका जिस गति से सबको साथ लेकर आगे बढ़ रही है, उसके लिए पूरी संपादकीय टीम बधाई की पात्र है। इस गति को देखते हुए भविष्य में पत्रिका का ई-पत्रिका से निकलकर हार्ड काॅपी में आने का इंतजार रहेगा।



- पवन चौहान
गांव व डा.- महादेव,
तहसील- सुंदर नगर, जिला-मण्डी (हि.प्र.)- 175018


- पवन चौहान

रचनाकार परिचय
पवन चौहान

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (1)कविता-कानन (1)कथा-कुसुम (1)ख़ास-मुलाक़ात (1)बाल-वाटिका (2)पाठकीय (1)यात्रा वृत्तांत (1)