मई 2016
अंक - 14 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- भ्रम

“हॅलो...हॅलो...। कौन प्रतिमा?”
“जी माँ जी चरण स्पर्श।”    
“सौभाग्यवती रहो। सब कैसे हैं?”
“जी सब ठीक हैं।”
“पप्पू, सोनी ठीक है?”
“जी ठीक हैं। स्कूल गए हैं।”
“रामचन्द्र कैसा है?”
“जी वे भी ठीक हैं।”
“बात कराओ।”
“वो माँजी अभी घर ढूढ़ने निकल गए हैं। दो महीने से मकान मालिक ने बहुत आफत कर दी है। रोज घंटो घूमते हैं। कोई ठीक घर मिल ही नहीं रहा है।”
“अरे मूर्ख है। कितनी बार कहा है एक घर खरीद ले। नहीं तो जमीन लेकर बना ही ले। इसको समझ में कुछ नहीं आता। अभी आए तो मेरी बात करवाना।”
“जी ठीक है माँजी। चरण स्पर्श।”
“ठीक है, ठीक है, खुश रहो।”


अट्ठावन साल की पुनिया ने अट्ठारह की उम्र में नौकरी शुरू की थी। अब उसका शरीर सूख गया था, आँखे धंसने लगी थीं, थोड़ा ऊँचा भी सुनती थी। बहुतों ने समझाया रिटायरमेंट ले लो। पर पैसे का मोह बड़ी चीज है। सेवानिवृत्ति तो दूर की बात, उसे तो उस नियम के आने का इंतजार था जिसमें अध्यापकों की सेवानिवृत्ति उम्र पैसठ साल होने वाली थी। उसने जबसे इस नियम के बारे में सुना था तब से पोता-पोती को हर फोन पर कहती-खूब मन लगाकर पढ़ो। मैं सारा खर्चा दूंगी।”

 
पुनिया सुबह शाम फोन का इंतजार करती रही। बेटे को फोन करने की फुर्सत चार दिन बाद मिली। पुनिया को बेटा मोबाइल तो खरीदकर दे गया था पर उसकी समस्या थी कि अभी खुद नम्बर मिलाकर बात करना नहीं आया था और किसी गैर के सामने घर के मसलों पर चर्चा करना उसे पसंद नहीं था। बेटे का फोन आता तो घर बाहर की ढेरों बातें कर लेती। मन हल्का हो जाता। यहाँ देहात में छोटा-सा पुस्तैनी घर था और थी उसकी नौकरी। इन्हीं दो के लिए वह रह रही थी। रामचन्द्र उसका इकलौता बेटा था जो नौकरी की खातिर दूर जाकर बस गया था। पति का साया बहुत पहले ही उठ गया। पुनिया अकेली हो गई। अड़ौस-पड़ौस में कामचलाऊ बोल-चाल भर थी। बाकी उसका एकमात्र सहारा स्कूल का चपरासी बंतू था। निहायत कंजूस होते हुए भी पुनिया लम्बे समय से न जाने किस ममता के वशीभूत बंतू की भूरपूर मदद करती थी। सबको आश्चर्य होता था। बंतू का पिता भी पुनिया के स्कूल में चपरासी था। अधिक दारू पीने से उसकी असमय मृत्यु हो गई। बंतू उस समय बारह साल का था। माँ बेटे असहाय हो गए। तब पुनिया ही उनका सहारा बनी। बंतू की माँ पुनिया के घर में काम करती और पुनिया उनके खाने-पहनने का खर्च उठाती। फिर पुनिया की मदद से ही बंतू को यह नौकरी मिली। हालांकि अब बंतू को पैसे का अभाव नहीं था। पर पुनिया का संरक्षण आज भी उसके लिए महत्त्व रखता था। बंतू की माँ अनपढ़ तो थी ही फिर बुढ़ापे ने उसे और असहाय बना दिया। उसका अधिकांश समय अब घर में कटता था। बंतू को जब भी कोई समस्या होती, वह पुनिया के पास दौड़ता। वह पुनिया की सलाह के बगैर कोई निर्णय नहीं ले सकता था। नौकरी के बाद अब बंतू को घर बनाने और घर बसाने की चिंता थी। पुनिया भी उसके लिए काफी फिक्रमंद थी। वह घर के लिए बंतू को आर्थिक मदद कर रही थी और साथ ही ऐसी लड़की की तलाश में थी जो बंतू से अच्छे से निभा सके व उसके सम्पर्क में भी बनी रहे।

समय यूं ही कट रहा था। पुनिया की पगार अब उसकी उम्मीद से कई गुना अधिक थी। उसकी बचत, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाला पैसा लाखों में था। यहाँ तक की जर्जर पुराना यह खानदानी मकान, इसकी भी कीमत अब लोग लाखों में आँक रहे थे। पुनिया को लगता आज उसके पास इतना पैसा है कि वह अपने परिवार के लिए हर खुशी खरीद सकती है। इसी विचार ने उसे विगत तीन साल से बेचैन कर दिया था। बेटे के हर फोन पर वह उससे एक ही बात कहती कि वह एक अच्छा-सा मकान खरीद ले। जितना भी लगेगा मैं दूंगी। जब से बंतू का नदी किनारे की बस्ती में दो कमरे का पक्का मकान बन गया था तब से पुनिया की बेचैनी और बढ़ गई थी। उसे लगता कि जब उसकी सलाह और सहायता से बंतू का घर बन गया है तब उसके अपने बेटे का क्यों नहीं? बंतू को पुनिया ने जो आर्थिक मदद दी थी, वह भले ही बंतू के लिए बहुत बड़ी बात हो पर पुनिया के लिए तो मामूली-सी रकम ही थी। जिसे उसने इस भाव से दे दिया था कि कभी खाता कमाता लौटा देगा और यदि न भी लौटाए तो मुझे कोई खास फर्क न पड़ेगा। कम से कम इस बहाने बंतू का आना जाना बना रहेगा। जिंदगी में एक गरीब की मदद हो गई। पुनिया जब ऐसा सोचती तो उसका हौसला और बढ़ जाता उसे लगता कि अपने बेटे के लिए तो वह इससे बहुत अधिक कर सकती है। तब भला वह किराए के घरों में मारा-मारा क्यों फिरता है। कितनी बार कहा है एक अच्छा-सा घर खरीद ले। सुनता ही नहीं। पिछली बार गई थी तो दो-तीन घर पसंद कर आई थी। उस समय तो रामचन्द्र ने खूब हाँ में हाँ मिलाई और बाद में सब भूल गया। पुनिया अपने आप से ही बातें करती हुई कहती- “इस बार जाऊँ तो घर खरीदवाकर ही लौटूं। बहुत हो गया भटकाना।”

कड़क ठण्ड का समय था। तराई क्षेत्र में इसका एहसास पहाड़ों से भी अधिक होता है। हफ्तों सूर्यदेव के दर्शन मुश्किल हो जाते हैं। घने कोहरे में वाहन चलते नहीं रेंगते हैं। घर से बाहर निकले नहीं कि हवा कपड़ों की पर्तों को पार कर सीधी बदन में चुभती है। इसी कारण स्कूल, कालेजों का शीतकालीन अवकाश भी अच्छा-खासा होता है। छुट्टियाँ शुरू हुईं तो पुनिया बेटे के पास चली गई। पहुँचकर उसने पहले ही दिन ऐलान कर दिया कि वह घर खरीदवाने ही आई है।
पुनिया जब जिद्द  पर अड़ती तो रामचन्द्र उसे अपने मिलने वालों के यहाँ ले जाता। उनके निजी या किराए के मकानों को पुनिया देखती। किसी को पसंद और किसी को नापसंद करती। कुछ बिकाऊ मकानों को भी देखा। पुनिया को जो पसंद आए उन्हें खरीदना रामचन्द्र के वश की बात नहीं थी। वह पुनिया की जमा पूंजी और अपनी हैसियत को अच्छी तरह जानता था। जमीन मकान की खरीददारी घंटो या दिनों में नहीं की जाती है, उसमें महीनों और सालों लग जाते हैं। पुनिया को मुश्किल से एक माह रूकना था। रामचन्द्र अपनी असमर्थता उजागर कर माँ को दुःखी करना नहीं चाहता था। वह पुनिया का मन रखने को कह देता- “आप पसंद कर लो। जो भी अच्छा लगेगा उसी की बात कर लेंगे।” एक महीना बीत गया पुनिया अपनी ड्यूटी पर लौट आई। मकान का मामला अटका ही रहा।


पुनिया की उम्र और शारीरिक कमजोरी बढ़ने के साथ-साथ उसकी बेटे, पोतों के प्रति चिंताएं भी बढ़ रही थी। हर बार फोन पर बात करते हुए वह बेटे-बहू से घर खरीद लेने का आग्रह करती। माँ की अधीरता ने रामचन्द्र को मकान खरीदने के निर्णय तक पहुँचा दिया। उसने पैतृक घर, माँ के पैसे और अपनी जमा पूँजी का हिसाब लगाया। इसमें वह या तो जमीन खरीद सकता था या किसी अनधिकृत बस्ती में कोई छोटा घर। बहुत कोशिश के बाद रामचन्द्र ने नाले के किनारे बसी एक घनी बस्ती में एक घर खोज लिया। मकान अधिक पुराना नहीं था। मकान मालिक किसी कारणवश मकान बेचकर किसी दूसरे शहर में जाना चाहता था। तीन मंजिलों में रामचन्द्र को बीच की मंजिल लेना तय हुआ। रामचन्द्र ने माँ को खुशखबरी दी- “माँ एक घर मिल गया है। मैं जल्दी ही ले लूंगा। तुम पैसे का हिसाब लगा लेना।”
अगले ही दिन पुनिया ने काॅपी, पेंसिल लेकर हिसाब लगाना शुरू कर दिया। उसने स्कूल के क्लर्क को भी अपने फंड आदि का हिसाब लगाने को कहा। उसने अपने गहनों आदि का भी हिसाब लगाया। यदि जरूरत पड़ी तो दे देगी। वैसे ईश्वर ने चाहा तो इतने से ही काम बन जाएगा।
एक दिन रामचन्द्र आया और पैसा लेकर अगले ही दिन लौट गया। पुनिया की स्कूल में व्यस्तता थी। वह उसके साथ न जा सकी। खुशी व व्यस्तता में वह यह भी पूछना भूल गई कि रामचन्द्र ने उसके देखे घरों में से कौनसा लिया है।


“रामचन्द्र का शहर में अपना मकान हो गया है।” पुनिया चहककर सबको बताती। जैसे ही छुट्टियाँ शुरू हुई पुनिया ने शहर का टिकट कटवाया और बेटे के पास जा पहुँची। स्टेशन से घर तक वह रामचन्द्र से घर के बारे में सैकड़ों सवाल करती रही और रामचन्द्र उसे हाँ हूँ कहकर टालता रहा। पुनिया घर पहुँची। बहू उसका स्वागत करने को घर के बाहर ही खड़ी थी। बच्चे घर के सामने खेल रहे थे। पुनिया आनंद से भर गई। घर देखकर उसकी आँखे चमकने लगीं। यह तो उससे भी बढ़कर था जैसा घर वह अपने बेटे को दिलवाना चाहती थी। उसकी जीवन भर की मेहनत सार्थक हो गई। बेटा वास्तव में उतना नासमझ नहीं था जैसा वह समझती थी। पुनिया ने बेटे बहू के सिर पर हाथ रखकर ढेरों आशीष दिए। बच्चों को जी भरकर पुचकारा। फिर वह सुस्ताने के लिए कुर्सी पर बैठ गई। कुछ देर बाद बहू बोली- “आओ माँजी अन्दर चलें।”
पुनिया उठी और बहू के साथ चल पड़ी। बहू उसका हाथ पकड़े सीढि़याँ चढ़ने लगी। पुनिया को लगा बहू पूरा घर घुमाना चाहती है। अतः थकी होकर भी उसने विरोध न किया और हाथ टेकती हुई सीढि़याँ चढ़ने लगी। घर खोलकर बहू ने पुनिया को पलंग पर बैठा दिया। पुनिया की आव-भगत होने लगी। ढेरों बातें, हँसना-बोलना। खाना खाते निबटते तक पुनिया बुरी तरह थक गई। वह वहीं पलंग पर पैर फैलाकर लेट गई।


अगले दिन पुनिया देर से उठी। वह भी थकी-थकी सी। बहू ने तब तक सारा काम निबटा लिया। पुनिया भी नित्य क्रिया से निवृत्त हुई। खा-पीकर फिर बातें। शाम को बहू काम से लगी और बालक खेलने निकल गए। पुनिया बालकनी में बैठी खेलते बालकों को देखती रही। आस-पास दुमंजले, तिमंजले सुन्दर रंगे पुते घर, साफ गली और दूर तक दिखती सड़क पुनिया को खूब भाया। वह बुदबुदाती हुई बेटे को आशीर्वाद देने लगी। तभी उसे ख्याल आया-‘नीचे घर में कौन रह रहा है?’ इसी के मिनट भर बाद वह अपनी नासमझी पर खुद को धिक्कारती-सी बुद-बुदाई-‘अरे शहर में तो एक-एक घर में चार-चार परिवार रहते ही हैं। यहाँ भी किराएदार होंगे।’ फिर उसे ऊपरी मंजिल का ख्याल आया ‘वहाँ भी किराएदार होगा।’ सोचकर पुनिया संतुष्ट हो गई।


कुछ दिन में पुनिया को एहसास हुआ घर के पीछे बड़ा गंदा नाला है। सुबह तेज दुर्गंध उठती है। अगर उधर के खिड़की दरवाजे बंद न रखे जाय तो सांस लेना मुश्किल हो जाय। मौका मिलते ही उसने रामचन्द्र को डपटा- “नाले किनारे घर क्यों लिया। इतना नहीं जानते सुबह ताजी हवा घर में आनी चाहिए। यहाँ तो सांस लेना दूभर है।”
रामचन्द्र ने हँसकर बेटे से कहा- “जा दादी को पार्क में घुमा ला। ताजी हवा मिल जाएगी।” पोता दादी का हाथ पकड़कर सड़क पार ले गया। कुछ दूर पर पार्क था। पुनिया काफी देर तक वहाँ टहलती रही। लौटते में मन्दिर दर्शन भी हो गया।


पुनिया नित्य नियम से सुबह पाँच बजे उठती, नहाती और कपड़े बालकनी में लटका देती। फिर घंटा भर हरी भजन। नीचे के मंजिल वाले एतराज करते। बहू कपड़े ऊपर समेट लेती। पुनिया के कपड़े मुस जाते। वह झुझलाती। बहू छुट्टी के दिन ढेरों कपड़े धोती। बालकनी में एक के ऊपर एक फैला देती। पुनिया उसकी नासमझी पर तरस खाती- “अरी इन्हें एक-एक कर फैला।”
बहू- “कपड़े ज्यादा हैं माँजी।”
पुनिया- “तो छत पर फैला।”
बहू जवाब न देती। पुनिया को लगता आलसन है। एक दिन का काम चार दिन फैला रहे बस।
एक सुबह पुनिया बालकनी में कपड़े फैला रही थी। नीचे से आवाज आई- “माँजी इन्हें ऊपर ही रखो। पानी टपकता है।”
पुनिया- “तो क्या थोड़ी देर में सूख जाएंगे।” तभी रामचन्द्र ने आकर माँ के कपड़े ऊपर समेट लिए। पुनिया ने उसे नाराजगी से देखा। रामचन्द्र ने आहिस्ता से समझाया- “नीचे बैठकर वे लोग चाय पीते और बात करते हैं। ऊपर से पानी टपकेगा तो खराब लगेगा। तुम यहीं तार पर अपने कपड़े फैला लिया करो।”
पुनिया बड़बड़ाती कमरे में आ गई- “किराएदार का इतना रौब सहना अच्छा नहीं है।”
पोता हँसता हुआ बोला- “दादी वे भी मकान मालिक हैं हमारे जैसे।”
पुनिया ने उसे डपटा- “चल चुपकर। सुबह-सुबह दूसरे को मालिक बनाने चला।” बहू कुछ कहना चाहती थी पर रामचन्द्र ने मुँह पर उँगली रखकर उसे चुप रहने का इशारा कर दिया। पुनिया कुछ देर में शांत हो गई।


बच्चे घर के सामने खेलते। जरा शोर होता तो नीचे वाले खिड़की से झाँक कर मना कर देते। साइकिल, स्कूटर फौरन हटवा देते। पुनिया को बुरा लगता। पुनिया बहू पर बिगड़ती- “कैसे को घर दे दिया है। हर समय दादागिरी दिखाते हैं। तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?”
बहू धीरे से जवाब देती- “पड़ौस में निभाना पड़ता है माँजी।”
पुनिया देर तक देहाती भाषा में बड़बड़ाती रहती। बहू को आधी बात समझ में न आती। बाकी वह अनसुना कर देती।


रामचन्द्र के छोटे बेटे को प्यार से सब छुटकू कहते थे। थोड़ा जिद्दी था। अब महीने भर दादी के दुलार ने उसे और मनमौजी बना दिया था। एक सुबह बहू उसे पढ़ने को कह रही थी। वह खेलने की जिद्द कर रहा था। पुनिया ने समझौता करवाते हुए कहा- “सुबह से पढ़ तो लिया है बहू। कुछ देर खेलने दे। फिर पढ़ लेगा।”
सहारा पाते ही छुटकू नीचे भागा। पुनिया पलंग पर अधलेटी-सी बैठ गई। थोड़ी देर में उसे झपकी आ गई। अचानक छुटकू के रोने से वह जागी। छुटकू रोता हुआ कह रहा था- “नीचे वाली आण्टी ने मेरे सारे दोस्तों को डाँटकर भगा दिया और मुझसे भी कह रही थी शाम पाँच बजे से पहले खेलने मत आना।”


पुनिया उठ बैठी। गुस्से में बोली- “बालक अपने घर के सामने खेल भी न सके। यह क्या बात।” वह उठकर बालकनी की ओर चली। बहू समझ गई आज ये नीचे वालों को जरूर भला-बुरा कहेंगी। उसने बढ़कर पुनिया को रोक लिया और बोली- “माँजी जरा-सी बात के पीछे पड़ौस में झगड़ा ठीक नहीं है। सुख-दुःख में पड़ौसी ही काम आते हैं।”
पुनिया को बात समझ में आ गई- “ठीक ही कहती है। मैं तो चार छः दिन में चली जाऊंगी। इन्हें तो हमेशा रहना है। बैर करने से क्या फायदा। पर बालक खेलने को मचल रहा है। उसके लिए कुछ तो उपाय सोचना चाहिए।” वह छुटकू का हाथ पकड़कर चुपचाप छत की ओर चली। छुटकू बूझता ही रहा- “दादी ऊपर क्यों ले जा रही हो?”
पुनिया सीढि़याँ चढ़ती हुई बोली- “चल तू मैं छत पर खेलेंगे।”
जब तक छुटकू उसे बताता छत पर नहीं खेल सकते। तब तक पुनिया छत के दरवाजे पर पहुँच गई। वहाँ ताला लगा था। पुनिया बोली- “यहाँ तो ताला है। जा अपनी माँ से चाबी ले आ।”
छुटकू बोला- “चाबी हमारे यहाँ नहीं है दादी। छत की चाबी तो ऊपर की मंजिल वाली आण्टी के पास रहती है।”


अब पुनिया के लिए बर्दाश्त के बाहर हो गया। वह सीढि़याँ उतरकर नीचे आई। इत्तेफाक से रामचन्द्र उसके सामने पड़ गया। पुनिया उसे डपटते हुए बोली- “तेरे घर में तू मकान मालिक है या तेरे किराएदार। एक बालकों को नीचे नहीं खेलने देती और दूसरी छत पर ताला लटकाए है।”
रामचन्द्र चुप रहा। बहू बोली- “माँजी हम न मकान मालिक हैं न किरायेदार। हमारा तो बस इतना ही घर है जिसमें हम रह रहे हैं।”
पुनिया ने प्रश्नसूचक दृष्टि से रामचन्द्र को देखा। वह चुप खड़ा रहा। पुनिया फिर गरजी- “बोलता क्यों नहीं। तूने घर खरीदा है या किराए में लिया है?”
इसके पहले कि रामचन्द्र कोई जवाब देता छुटकू बोल पड़ा- “खरीदा है दादी। मैं इन्हें पहले ही कह रहा था आंगन वाला घर खरीदो। मैं अपने आंगन में खेल लिया करूंगा। इन्होंने मेरी बात नहीं मानी।”
बहू ने छुटकू को डांटा- “चुप कर, बड़ों के बीच में बच्चे नहीं बोलते।”


इसी बीच मौका पाकर रामचन्द्र वहाँ से खिसक गया। वह गली पार कर अपने दोस्त के घर चल पड़ा। उसके मन में ढेरों विचार आ-जा रहे थे। वह माँ को कैसे संतुष्ट करे। उसे अपनी सही हालत बताए तो कैसे? माँ तो यही समझती है कि उसने मुझे जो पैसा दिया है और मेरे वेतन की बचत एक बड़ी रकम है। मुझे उससे एक बड़ी कोठी खरीद लेनी चाहिए थी। पर असलियत तो यह है कि यह फ्लैट लेने में भी कर्ज में दब गया हूँ। वह यह कहाँ जानती है कि जिस हिसाब से उसका वेतन बढ़ा है उससे कई गुना तेजी से पैसे की कीमत गिरी है। अब माँ से यह सब कहने बैठे तो वह तो यही कहेगी कि मैंने गाँव का घर क्यों न बेच दिया या उसके गहने क्यों न ले लिए। पर मुझमें इतना साहस नहीं है कि मैं उन गहनों को बेच दूं, जिन्हें माँ ने तंगी के दिनों में भी अपने से अलग न होने दिया था या जीते जी माँ को उसके पुरखों के दिए घर से निकालकर बेघर कर सकूँ। इसीलिए दस बार सोच-विचार कर ही यह फ्लैट खरीदा है। न हो खेल की जगह न सही। कहने को घर तो अपना है। हर दो-चार साल पर कोई यह तो न कहेगा- “हमारा घर खाली करो।” रामचन्द्र विचारों को मथता कदम दर कदम आगे बढ़ता रहा। दो चार घंटे अभी उसमें घर लौटकर माँ का सामना करने का साहस नहीं था।
उधर पुनिया बहू से उलझ रही थी- “यह रामचन्द्र तो सदा मुझे बहकाता ही रहा। बहू आज तुम मुझे पूरी बात साफ-साफ बताओ। सच क्या है?”


बहू धीरे से बोली- “सच यही है माँजी। हमने इस घर की यही एक मंजिल खरीदी है। निचली मंजिल नीचे वालों की और ऊपर की मंजिल ऊपर वालों की है। इस शहर में भी अब घर बड़े शहरों जैसे बिकने लगे हैं। पूरा घर खरीदने के बहुत पैसे लगते हैं।”
पुनिया बोली- “यह कैसा घर हुआ? न जमीन अपनी न छत। बालक जाय तो जाय कहाँ?”
कुछ देर में बहू अपने काम में लग गई और पुनिया चुपचाप आँखें बंद कर लेट गई।


चार छः दिन बाद पुनिया अपनी नौकरी पर लौट गई। घर से स्टेशन आते और शहर छोड़ते पुनिया उससे कई गुना दुःखी थी जितनी आते समय आनंदित थी। सब कुछ जानने के बाद अब वह रामचन्द्र को दोष नहीं दे सकती थी। उसके बेटे के घर की समस्या ज्यौं की त्यौं थी। गाड़ी चली। रामचन्द्र ने हाथ जोड़ दिए। पुनिया ने दोनों हाथ उठाकर बेटे को आशीर्वाद दिया। दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए।


- डॉ. अपर्णा शर्मा

रचनाकार परिचय
डॉ. अपर्णा शर्मा

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कथा-कुसुम (1)