अप्रैल 2016
अंक - 13 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
विभाजन त्रासदी ‘मन माटी’ उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में: निशा कुमारी
 
 
असगर वजाहत आधुनिक उपन्यासकारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उन्होंने कुल पाँच उपन्यासों की रचना की है और लगभग सभी उपन्यासों में मुस्लिम समाज के अन्तर्विरोधों को दर्शाया है। ‘मन-माटी’ (2010) ई. में प्रकाशित उपन्यास है, जिसमें लेखक ने भारत-पाक विभाजन के परिणामस्वरूप अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी से उखड़े मानसिक प्रताड़ना झेल रहे लोगों की व्यथा का चित्रण किया है। इस उपन्यास में अपनी जन्मभूमि से बिछुड़न की एक तड़प उजागर होती है। ‘मन-माटी’ उपन्यास की कथा में भले ही थोड़ा बिखराव हो लेकिन विभाजन की त्रासदी के 60 साल बाद भी लोगों के मन के खौफ एवं व्यथा को लेखक ने इतने संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है कि मानों यह उनका भोगा हुआ सत्य हो।
 
भारत सालों तक अंग्रेजो के अधीन रहा। स्वतन्त्रता सेनानियों के अथक प्रयत्नों से 1947 को भारत आजाद तो हुआ लेकिन आजादी के तुरन्त बाद देश के सामने विभाजन का बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ। इस विभाजन का मुख्य कारण था साम्प्रदायिकता। लोग अपने-अपने धर्म, संस्कृति और सम्प्रदाय को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए नाना प्रयत्न करते हैं। भारत में साम्प्रदायिकता हिन्दू और मुस्लिम धर्मो को लेकर है। कहीं-कहीं सिखों और ईसाइयों पर हमले हुए है लेकिन ये बहुत कम हैं। हिन्दुओं और मुसलमानों ने अनेक दलों और संगठनों को स्थापित कर रखा है जिन्हें कानून, जज, न्यायपालिका जैसी फालतू चीजों की भी चिन्ता नहीं है।
 
धार्मिक तालिबानी तय कर रहे है कि इस देश में हिन्दू रहें या मुसलमान। ये तालिबानी हिन्दू एंव मुस्लिम दोनों ही धर्मो में समान रूप से विद्यमान है। इसी धार्मिक अराजकता की ओर संकेत करते हुए राजेन्द्र यादव लिखते हैं - ”साहित्य, संस्कृति, कला, धर्म इन जुनूनियों के हाथों क्या रूप लेंगे या इनमें क्या बचा रह जाएगा - सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं क्योंकि देश का शासन करने में अक्षम, असमर्थ और अयोग्य बी.जे.पी. अपनी बेवकूफी में जो अराजकता ला रही है उससे ध्यान बंटाने का एक ही रास्ता है - घृणा, उन्माद और उत्तेजना का नंगा नाच - धर्म, संस्कृति, इतिहास, अतीत के नाम पर दंगें।“1 राजनीति साम्प्रदायिकता में घी का काम करती है। मुस्लिम कभी अल्पसंख्यक की दुहाई देकर तो कभी ‘हमारा मजहब खतरे में है’ का नारा देकर हर रोज दंगे फसाद करते हैं। मुस्लिम धर्म के विरूद्ध बोलने की कोई हिम्मत नहीं करता और जो करता है वह मुस्लिम धर्म में नहीं होता। ‘तस्लीमा नसरीन’ और ‘सलमान रश्दी’ इसके जीवन्त उदाहरण है, जिन्हें मुसलमानों ने जहालत के नाम पर देश निकाला दे दिया।
 
ठीक इसी प्रकार हिन्दू प्रधान देशों  या राज्यों में मुसलमानों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है। मुजफ्फरपुर (भारत) में भी ऐसा ही हुआ। मुसलमानों का कत्लेआम किया और आज भी मुसलमान गाँव से बाहर तम्बुओं में रह रहें है। मुस्लिम धर्म प्रधानता वाले क्षेत्रों में हिन्दुओं पर अत्याचार किए जाते हैं। भारत-पाक विभाजन, 1984 के काण्ड, अयोध्या काण्ड आदि इसके जीवन्त उदाहरण हैं। आज पाकिस्तान में जातीय तनाव इतना गहरा हो गया है कि इतना तो विभाजन के समय पर भी नहीं था, आज बलूची पठान, पंजाबी, महाजिर एक दूसरे को शक की नजर से देखते हैं। भारत-पाक विभाजन के समय जो मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए ओर पाकिस्तान से हिन्दू भारत आए वे आज भी अजनबीपन की स्थिति से गुजर रहे हैं। एक टी.वी. चैनल पर पाकिस्तान मूल के लेखक ‘तारिक फतह’ ने अपने साक्षात्कार में हाल ही में ये स्वीकारा है कि ‘जो मुसलमान भारत से पाकिस्तान में आए वे न भारत के रहे और न ही पाकिस्तान के हो सके’।2
आज मुस्लिम देश पाकिस्तान को, आतंकी हमले करने के सिवाय कोई काम ही नहीं है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में:- ”पाकिस्तान के मुल्ला राजनीतिज्ञों को अब तक इतनी तमीज नहीं है कि कम से कम अपने ही परिवारों की महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में बराबरी का दर्जा दे दिया जाए।3
 
हिन्दी साहित्यकारों ने साम्प्रदायिकता, भारत-पाक विभाजन त्रासदी और आतंकवाद को लेकर बहुत-सी प्रभावशाली रचनाओं की रचना की है। उदाहरण के लिए भीष्म साहनी का ‘तमस’ उपन्यास सर्वाधिक चर्चित है। इसे पढ़कर हम यह अनुभव करते हैं कि बड़े लोगों के स्वार्थ की पूर्ति करने वाली नीतियाँ जन साधारण के जीवन से खिलवाड़ करके बड़े-बड़े राज्यों का इतिहास और भूगोल बदल देती है। इसके अलावा राही मासूम रजा का ‘आधा गांव’ उपन्यास भी देश के दो टुकड़ो में (भारत-पाक) में बंटने की कहानी प्रस्तुत करता है। इस दिशा में कमलेश्वर का उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ बहुत महत्वपूर्ण है। यह उपन्यास लेखक के दीर्घकालीन अंतर्मंथन का परिणाम है। इसमें लेखक ने मानव इतिहास की गहरी पड़ताल करते हुए अनुभव किया है कि इतिहास के प्रत्येक कालखण्ड में नफरत और घृणा ने इन्सान को दो भागों में बांटा है, पाकिस्तान बनते जा रहे है और आज भी यह सिलसिला जारी है। इसी की परिणति है देश का विभाजन और पाकिस्तान की सृष्टि।
 
विभाजन की त्रासदी को लेखक ने ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास के माध्यम से बयां किया है- ”कहां लै चलू अदीबे आलिया? बाहर तो शोर और भी ज्यादा है। ......... हाहाकार चीत्कार, आगजनी, सामूहिक हत्यायें, बलात्कार, चीख पुकार, अपहरण, अजन्में बच्चों के लोथड़े, कीड़े पड़ी बिजबिजाती फूली हुई लाशें, अर्धजीवित और मृत देहों का माँस खा-खाकर थके हुए लकड़बग्घे, कुत्ते, गिद्ध ..... और रक्त-प्लावन का दृश्य! यह तो सहस्त्रों साल पहले हुए जल-प्लावन से भी भंयकर दृश्य है।“4
 
इसी प्रकार असगर बजाहत द्वारा रचित उपन्यास ‘मन-माटी’ भी इसी साम्प्रदायिकता को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। लेखक ने साम्प्रदायिकता के कारण भारत-पाक विभाजन और विभाजन के 60 साल बाद भी लोगों के मन की दहशत का वर्णन किया है। इस उपन्यास की मौलिकता और विशिष्टता यह है कि लेखक ने न केवल भारत - पाक विभाजन की त्रासदी का मार्मिक चित्रण किया है अपितु ये जो लोग अत्यन्त दुख और पीड़ा के बावजूद अपनी जन्मभूमि और अपने मुल्क को छोड़कर दूसरे मुल्क जो कि उनके लिए बिल्कुल अजनबी था, में रहना और केवल वहीं का होकर रहना और विभाजन के 60 साल बाद भी अपनी जन्मभूमि से लगाव रखना उसके लिए तड़पना और वहां की यादों को संजोये रखने का बेहद मार्मिक चित्रण किया है जो हमें अन्दर तक झकझोर कर रख देता है। इस प्रसंग को प्रकट करने के लिए लेखक को उपन्यास में कई कहानियों का सहारा लेना पड़ा है।
 
लेखक ने इस बात को पहले सैयद भाइयों में अकरम के माध्यम से स्पष्ट किया है। अकरम भले ही लन्दन जाकर बहुत अमीर हो गया है लेकिन वह अपने जीवन की आखिरी सांसें अपने देश भारत में लेना चाहता है और भारत की मिट्टी से बेहद लगाव रखता है।
‘मन-माटी’ उपन्यास में ही लेखक ने एक स्वप्रंसग का वर्णन भी किया है कि भारत-पाक विभाजन के समय लेखक बारह साल का था। मुस्लिम होने कारण लेखक को भारत छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा। पाकिस्तान में साठ साल गुजारने के बाद भी लेखक वहां का नहीं हो सका। उसे तां उम्र अपनी जन्म भूमि डिबाई के सपने आते रहे। लेखक के शब्दों में ”रात को मुझे डिबाई के सपने आते थे। मैं लाख चाहता था कि रात में डिबाई के सपने न आए। लेकिन यह नामुमकिन था। सालों गुजर चुके थे लाहौर आए। शादी हो गई थी, बच्चे हो गए थे लेकिन डिबाई के सपने आना बन्द नहीं हुए। ...... मैं साठ के ऊपर का हो गया, लेकिन मुझे लगता था कि मैं डिबाई में रह रहा हूँ।“5 लेखक को अपने गांव, गांव की मस्जिद की, चमुड़ा के मन्दिर की पेड़ों पर नाचते बन्दरों की हमेशा याद आती रहती थी। लेखक अपने जीवन के इस सपने को जिन्दगी के अन्तिम क्षणों में साकार करते हैं। डिबाई आकर लेखक को लगा जैसे वह स्वर्ग में लौट आया है। ”मैं सब कुछ इस तरह देख रहा था कि जिन्दगी में दोबारा यह सब न देख पाऊँगा।“6
 
इसी भाव को लेखक ने अपने दोस्त के माध्यम से भी प्रकट किया है। लेखक का एक अन्य दोस्त अकरम जो विभाजन के समय लखनऊ से लाहौर में आकर बस गए थे। लेखक को शायराना अन्दाज में कहते हैं- ”आँखे हैं इस देश में मेरी, दिल मेरा उस देश में है। दिन में पाकिस्तानी हूँ मैं, रात में हिन्दुस्तानी।“7
 
प्रस्तुत उपन्यास के माध्यम से लेखक ने यह दर्शाया है कि मनुष्य कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए वह अपनी जड़ों से अपनी भूमि से नहीं कट सकता। इससे दूर रहने का जो कष्ट है वह असहनीय होता है। भारत-पाक विभाजन के समय पर भी हिन्दू-मुसलमानों के साथ यहीं घटित हुआ। जो जिन्दा हैं वे आज भी इस प्रताड़ना से गुजर रहे हैं। हिन्दी साहित्यकार कमलेश्वर ने भी अपने उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ के माध्यम से यह बात स्पष्ट की है। उपन्यास का पात्र तन्नु विभाजन के समय कहता है - ”मैं मुसलमान हूँ, लेकिन मुझे इस गांव से मुहब्बत है..... क्योंकि मैं खुद यह गांव हूँ मैं नील के इस गोदाम, इस तालाब और इन कच्चे रास्तों से प्यार करता हूँ....।“8
 
भारत-पाक विभाजन का लेखक ने पूरे जोर के साथ विरोध किया है क्योंकि लेखक का मानना था कि कुछ नेता जो अपने स्वार्थो की अन्धता के कारण बंटवारे के लिए तैयार तो हो गए लेकिन उनको थोड़ा-सा भी ये ख्याल नहीं आया कि सामान्य जन जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। लेखक का मानना था कि यह सोची समझी राजनीति थी, जिसने अपने लाभ के लिए यह नरसंहार कराया था। धर्म किसी भी देश का मुख्य आधार नहीं हो सकता। सबसे बडा धर्म तो इन्सानियत का है। जो धर्म मनुष्य को बाँटता हैं, उसे उसकी जन्मभूमि से अलग करता है वह धर्म, धर्म नहीं होता अन्धता है। ”धर्म मनुष्य की शक्ति और सामाजिक विश्वास के साथ-साथ आदमी को मारने का दार्शनिक हथियार भी है...... वह सम्प्रदाय, जाति, प्रांतीयता के आधार पर एक नई तरह का ‘छायायुद्ध’ शुरू करता है।“9
 
‘मजहब किसी मुल्क का आधार नहीं होता’ इस तथ्य को लेखक ने ‘मन-माटी’ उपन्यास के भाग - 2 ‘चहार-दर’ में सायमा के माध्यम से प्रकट किया है। सायमा पाकिस्तान से आयी है जो कि पत्रकार है। वह शेरअली नाम के किसी व्यक्ति की मृत्यु पर ‘स्टोरी’ करने आयी है क्योंकि शेरअली पाकिस्तान से बिना पासपोर्ट और वीजा के भारत की सीमा में घुस आया है। भारत सरकार का मानना है कि इस नाम का कोई व्यक्ति पाकिस्तान से भारत नहीं आया है और पाकिस्तानी कमीशन का भी यहीं कहना है कि शेरअली नाम के किसी व्यक्ति को वीजा नहीं दिया गया है। परन्तु शेरअली पाकिस्तान से भारत आया था और उसकी मौत गोली लगने से हुई थी, गोली किसने मारी थी ये अभी रहस्य था।
 
सायमा खान जब भारत आती है तो वह मानती है कि भारत और पाकिस्तान का बँटवारा सौ फीसदी सही हुआ था क्योंकि ये दो ‘नेशनलटीज’ है। लेकिन जैसे-जैसे वह भारत में रहती है, यहाँ की भाषा और संस्कृति से रू-ब-रू होती है तो पाती है कि इन दोनों देशों की जुबान और तहजीब एक जैसी है। इसके अलावा बँटवारे के समय पाकिस्तान से आए हुए लोगों से वह मिलती है तो पाती है कि अपनी जन्मभूमि अपनी मिट्टी के प्रति इनका जो लगाव है और अपनी जड़ों से बिछुडने से उनकी मानसिकता कितनी खण्डित हुई है। यहाँ नयी जगह आकर अपना नया आशियाना बनाना कितना कठिन रहा होगा, तो वह भी विचलित हो जाती है और मानती है कि भारत-पाक विभाजन कितना गलत था। बाद में वह सोचती है - ”.... सजदों में लोग कितना गिड़गिड़ाए और रोये होगें कि अल्लामियां ऐसा कर दें कि हम अपने खेतों से जुदा न हों ...... हम अपने घरों में रहें ...... हमारी जाने बच जाएं चीखों की आवाजें ...... जलते गाँव बहता हुआ खून ..... नंगी औरतों का जुलूस ...... बेकफन पड़ी लाशें ........ सायमा की आँखों में आँसू आ गए।“10
 
भारत में सायमा खान अलका की दादी से भी मिलती है जो विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आई थी। दादी को जब यह पता चलता है कि सायमा लाहौर से आई है तो वह भी अपनी मिट्टी के लिए तड़प उठती है। उसकी बूढी आँखों में आँसू आ जाते हैं और सायमा के गले लगकर कहती है - ”लै चल मैनू लहौर ....... इक बार बस इक बार ....... मरनों पहलां।“11
 
अतः हम पाते हैं कि ‘मन-माटी’ उपन्यास में लेखन ने विभाजन की त्रासदी से भी एक कदम आगे की सोची है, लोगों के मन की गहराई तक गए है क्योंकि हर मनुष्य को अपनी मिट्टी, अपना मुल्क प्यारा होता है तभी तो लेखक ने कहा है कि कभी मन माटी हो जाता है तो कभी माटी मन हो जाती है। यहीं कारण है कि सायमा जैसी लड़की जो कि एक कट्टरवादी मुस्लिम है उसका मन भी बदल जाता है। यहां हम यह कहना चाहेंगें कि लेखन ने सायमा खान के माध्यम से दर्शाया है कि इन दोनों देशों के दिलों की दूरी को कम करने का काम सिर्फ युवा वर्ग ही कर सकता है। क्योंकि आज का युवा वर्ग शिक्षित है और एक शिक्षित व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह पृथ्वी को ही अपना राज समझे। सायमा के माध्यम से लेखक लिखते हैं ”इन मुल्कों में रहने वाले दुश्मन नहीं है ...... इनको दुश्मन क्यों बना दिया गया है? ...... इतना तय है कि इन्सानी रिश्तों, जज्बातों को कुचलकर सरहदे नहीं बनाई जानी चाहिए.......“12
 
सायमा जो ‘टू नेशन थ्योरी’ में विश्वास  रखती थी वह भी लोगों के जज्बात देखकर बदल गई। जब वह शेरअली नामक व्यक्ति की मृत्यु पर तहकीकात करते हुए पाती है कि वह भारत में केवल अपनी पूर्व प्रेमिका अमृता कौर से किया वादा कि ‘एक दिन मैं जरूर मिलने आऊँगा’ को पूरा करने रात को रावी नदी पार करके भारत की सीमा में आया था। लोगों ने उसे इसलिए मार दिया कि कहीं वह यहीं न रहने लगे। यह प्रसंग सुनकर सायमा का दिल और भी बैठ जाता है। एक शिक्षित युवा होने के नाते वह फैसला करती है कि बहुत हो लिया ये सरहदों का चक्र। हम युवा वर्ग मिलकर इन सारी सरहदों को तोड़कर दोनों मुल्कों के बीच की दूरी को कम करेंगे। वह न केवल भारत के विधार्थियों को बल्कि पाकिस्तान के विद्यार्थियों को सीमा पर एकत्र कर संगीत प्रोग्राम रखती है।
 
अतः हम देखते है कि असगर बजाहत ने अपने उपन्यास ‘मन-माटी’ के माध्यम से न केवल भारत-पाक विभाजन की त्रासदी को उजागर किया है परन्तु इतने सालों बाद भी लोगों के मन में बसे अजनबीपन का भी वर्णन किया है। उपन्यास का हर प्रसंग संवेदनशील है। लेखक का पूर्ण जोर इस बात पर रहा है कि मातृभूमि, जन्मभूमि अपने देश की मिट्टी से बढ़कर कुछ नहीं है और इससे अलग या दूर रहने के दुःख से बड़ा दुःख कोई नहीं है। आज चारों तरफ साम्प्रदायिकता, आतंकवाद का बोलबाला है, लेकिन, लेखक ने ‘मन-माटी’ उपन्यास के माध्यम से हमें सन्देश दिया है कि दोनों देशों को इन फालतू की बातों को छोड़कर अपना पूरा ध्यान देश के विकास की ओर लगाना चाहिए।
सन्दर्भ सूची:- 
1. कांटे की बात-10, राजेन्द्र यादव, संचयनकर्ता- विद्यानिधि पृ0.21
2. टी.वी. चैनल आई.बी.एन.7 पर 7 अगस्त 2015 को रात 8 बजे पाकिस्तानी लेखक तारिक फतह से वीडि़यों काॅन्फ्रेन्सिंग के द्वारा बातचीत से उद्द्यृत 
3. कांटे की बात-10, राजेन्द्र यादव, संचयनकर्ता-विधानिधि, पृ0 22
4. ‘कितने पाकिस्तान’, कमलेश्वर, पृ0 47
5. मन-माटी, असगर बजाहत, पृ0 30
6. वहीं, पृ0 34
7. वहीं, पृ0 41
8. कितने पाकिस्तान, कमलेश्वर, पृ0 60
9. कांटे की बात -3, भूमिका, विद्यानिधि।
10. मन-माटी, असगर वजाहत,पृ0 90
11. वहीं पृ0 97
12. वहीं पृ0 114-115
 

- निशा कुमारी

रचनाकार परिचय
निशा कुमारी

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