अप्रैल 2015
अंक - 2 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गुंचे यादों के , मुमकिन है कि
गुंचे यादों के 
 
जमीं में दबी हुई जड़ें !
खुली हवा में ना जी पाने का 
 
बादलों के जब मर्जी आये 
बरस जाने का 
 
पत्तियों के बूँदें ढुलका देने का 
शिकवा नही करती कभी 
 
आँखें मूंदे वे जब भी याद करती हैं
गए दिनों की बारिशें 
 
हौले से टांक देती है 
अपनी शाख पर
एक और शोख नरम पत्ती 
 
यादों के गुंचे हरी पत्तियों की शक्ल में
नज़र आते हैं शाखों पर
 
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मुमकिन है कि 
 
जब तक नम हूँ मैं 
गूंधते रहो 
चाक पर घुमाते रहो 
और अबा में तपाते रहो
 
जो किसी दुपहरी 
अपनी सारी नमी 
उडा दूंगी मैं
 
उड़कर 
आँखों को 
धुंधला दूंगी मैं 
 
किरकिराती कोरें 
मुमकिन है
तुम्हे दो घड़ी 
सोचने को मजबूर कर दें

 


- नीता पोरवाल

रचनाकार परिचय
नीता पोरवाल

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